निराशा के अंधेरे में सूरज की तलाश : पुस्तक-चर्चा

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )
दुनिया में इंसानों के साथ-साथ पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों और तमाम जीव-जंतुओं के बीच प्यार और जीवन की रौशनी बिखेरने वाला और सबको राह दिखाने वाला सूरज आज कहाँ है? छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कवि श्री जी. आर. राना को भी उस छिपे हुए सूरज की तलाश है। वर्तमान युग में हमारे चारों तरफ दूर-दूर तक तमाम तरह की गंभीर समस्याओं के बीच निराशा का गहरा अंधेरा फैला हुआ है। ऐसे कठिन समय में सबको रौशनी के लिए किसी सूरज का इंतज़ार है, लेकिन लगता है कि वह कहीं छिप गया है। कवि भी व्यथित और विचलित होकर अपने दिल से और देश और दुनिया से पूछ रहा है—कहाँ छिपा है सूरज? श्री राना के इस कविता-संग्रह का शीर्षक भी यही है। उनकी कविता की पंक्तियाँ देखिए—
कहाँ छुपा है सूरज, कोई पता बताए,
अंधियारा बहुत डराए, कोई चिराग ला दे!
मन भ्रम में भटक रहा है, जीने की राह न सूझे,
बीहड़ रह-रह भरमाए, कोई पगडंडी दिखा दे!
प्यासा भटक रहा हूँ मैं मरीचिका में अब तक,
कोई स्वाति बूँद पिला दे!
ऐ मेरे सूरज की किरणें, तुझसे ही तो जीवन है,
ऊर्जा भरना रग-रग में, महकाना जीवन उपवन।
श्री जी. आर. राना देश और समाज तथा प्रकृति और पर्यावरण के बारे में बहुत ख़ामोशी से चिंता और चिंतन करने वाले और अपनी भावनाओं को चुपचाप कागज पर उतारने वाले कवि हैं। संग्रह में शामिल उनकी हर कविता समाज को राह दिखाने की कोशिश करती है।
एक तरफ तो कवि को छिपे हुए सूरज की तलाश है, वहीं दूसरी तरफ वे यह भी मानते हैं कि सूरज, धरती और चाँद अकेले ही सबकी भलाई के लिए लगातार समर्पित रहते हैं। संग्रह में प्रकाशित ‘सूरज अकेला, धरती अकेली’ शीर्षक कविता में कवि की भावनाएँ कुछ इस तरह प्रकट हुई हैं—
सूरज अकेला कभी न रुका है,
पूरब से पश्चिम तक किरण बाँटता है,
महल, झोपड़ी, न गुफा छाँटता है,
गगन से धरा तक किरण बाँटता है।
धरती अकेली सभी भार सहती,
सारे जहाँ के सितम झेलती है,
ममता का आँचल सदा ही बिछाए,
भेद छोटे-बड़े का नहीं मानती है।
चंदा अकेला, सितारे कई हैं,
गगन एक आँगन, जहाँ खेलते हैं,
बादल के टुकड़े नहीं बाँट पाए,
सौर मंडल समूचा इनके लिए है।
संग्रह की रचनाएँ प्रकृति के साथ-साथ देश और समाज की वर्तमान परिस्थितियों से भी हमें जोड़ती हैं। श्री जी. आर. राना की 22 कविताओं के इस संग्रह में न सिर्फ सूरज और धरती के प्रति कवि की भावनाएँ प्रकट होती हैं, बल्कि इसमें माटी, पानी और पत्थर के साथ दरख्तों की आवाज़ भी है और मानव जीवन को लेकर एक दार्शनिक अभिव्यक्ति भी। संग्रह की पहली कविता ‘जीवन’ में कवि कहते हैं—
जीवन एक नदी है, साँसों की बहती धारा,
मन-मछली तैरे, ढूँढे, पाए नहीं किनारा।
जीवन है गहरा सागर, भावों की उठती लहरें,
पतवार ज्ञान की थामे, तब कहीं पार हम उतरें।
इस रचना में कवि ने जीवन की तुलना नदी और सागर के साथ-साथ फूलों की बगिया से, कर्मों की खेती से और फिसलन तथा काँटों भरी डगर से भी की है। श्री राना की इस कविता में जीवन के कई रंग खिलते नज़र आते हैं।
दूसरी रचना ‘दरख्तों की आवाज़’ में प्रकृति, मानव जीवन और जीव-जगत पर वृक्षों के उपकार को लेकर कवि की भावनाएँ गूँजती हैं—
तनिक ठहर कर सुनो पथिक तुम,
पेड़ व टहनी बोल रहे हैं,
सारी थकान मिट जाएगी,
लोरी-सा रस घोल रहे हैं।
जीव-जंतु-सरीसृप सारे
आश्रय आदिकाल से पाए,
प्रेत-पितर व ग्राम देवता
इनमें बसेरा करते आए।
इसी कविता में रचनाकार ने वृक्ष को प्रतीक बनाकर आज के मनुष्य की स्वार्थ-भावना की ओर भी संकेत किया है। जैसे वृक्ष जब तक हरे-भरे रहते हैं, सबको छाया देते हैं, उसकी सक्षमता तक सब उसके पास रहते हैं, लेकिन जैसे ही उसके पत्ते सूखने लगते हैं, वह अक्षम हो जाता है, तब शाखाएँ भी उसका साथ नहीं देतीं। कुछ इसी तरह का मतलबी स्वभाव मनुष्य का भी रहता है।
जब तक पत्ते घने, घनेरे छाया देते,
पंथी, पक्षी, पावस, पवन पास में होते,
सक्षमता तक नाते-रिश्ते, दोस्त बहुतेरे,
सूखे पीले पात, शाख भी साथ न देते।
बिना स्वार्थ देव न पूजे, स्वभाव मानव का,
मतलब के सब यार—ये पत्ते बोल रहे हैं।
कविता ‘माटी है अनमोल खजाना’ में कवि मिट्टी की महिमा का बखान करते हैं—
ज्ञान ने सब कुछ बना लिया,
पर एक कण माटी बना न पाया।
‘पानी’ कविता में जीवन की सार्थकता और समता का संदेश मिलता है—
पानी है जीवन का जीवन,
बादल-धन, सरिता का यौवन,
प्यासा का भेद न माने पानी,
मज़हब कोई न माने पानी।
‘गाँव’ कविता में बदलते ग्रामीण जीवन की विडंबना उभरती है—
दाऊ का बाड़ा न पीपल की छाँव,
टी.वी. का दिखे एरियल—यह है आज का गाँव।
गाँव से पलायन, गुटबाजी और सामाजिक विघटन पर कवि का दर्द साफ झलकता है।
इसी तरह ‘यह कैसा तेरा शहर’ में शहरी जीवन की भागदौड़ और संवेदनहीनता का चित्रण है—
नहीं यहाँ सुख-चैन की साँसें,
भागम-भाग आठों पहर,
आदमी का बना है जंगल,
यह कैसा तेरा शहर!
आषाढ़ के बादलों पर लिखी कविता में पर्यावरण और राजनीति पर व्यंग्य है, जबकि ‘वसंत’ और ‘चुनावी मौसम’ में सामाजिक विसंगतियों पर तीखा कटाक्ष मिलता है।
कवि समाज के दर्द पर लिखने की भी अपील करते हैं—
रौंदे-मुरझाए फूल पूछ रहे,
कब पीड़ा पर कलम उठाओगे?
संग्रह की कुछ रचनाएँ छत्तीसगढ़ी भाषा में भी हैं, जो लोकजीवन की सजीव झलक प्रस्तुत करती हैं।
इस कविता-संग्रह की प्रस्तावना ‘प्रकृति ही सच्ची कविता है’ शीर्षक से डॉ. चित्तरंजन कर ने लिखी है।
श्री जी. आर. राना का जन्म 12 अप्रैल 1947 को छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम कोचवाही में हुआ। उन्होंने राजनीति विज्ञान और इतिहास में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की और मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सेवा के विभिन्न पदों पर कार्य किया। वर्ष 2003 में सेवानिवृत्त होने के बाद वे साहित्य और समाजसेवा में सक्रिय हैं। वे छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
उनका व्यंग्य-संग्रह ‘कुर्सीनामा’ तथा 602 पृष्ठों का महाग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ निर्वाचन सार’ भी चर्चित रहा है, जिसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान मिला।
‘सूरज कहाँ छिपा है’ कविता-संग्रह की कलात्मक प्रस्तुति भी आकर्षक है। सर्वप्रिय प्रकाशन द्वारा 2023 में प्रकाशित इस संग्रह की प्रत्येक कविता के साथ भावानुकूल चित्र भी दिए गए हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि यह कविता-संग्रह केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि वर्तमान समाज, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का दर्पण है।
श्री जी. आर. राना को इस उत्कृष्ट काव्य-संग्रह के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
—आलेख : स्वराज्य करुण

