futuredलोक-संस्कृति

भारतीय चिंतन की त्रिवेणी : एक पेड़ माँ के नाम – विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

आचार्य ललित मुनि

भारतीय संस्कृति में माँ, प्रकृति और जीवन तीन ऐसे शब्द हैं जो अलग अलग होते हुए भी अपनी आत्मा में एक ही हैं। जब हम माँ कहते हैं तो उसमें माटी की महक है, नदी की निर्मलता है और वृक्ष की छाया है। जब हम प्रकृति को देखते हैं तो उसमें माँ का चेहरा दिखता है। यही वह त्रिवेणी है जिसे भारतीय चिंतन ने हजारों वर्षों से अपने हृदय में सँजो कर रखा है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने “एक पेड़ माँ के नाम” की संकल्पना देश के सामने रखी, तो वह कोई नई बात नहीं थी, वह हमारी उसी प्राचीन चेतना को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करने का एक सार्थक प्रयास था।

भारत के वेदों में पृथ्वी को “माता” कहा गया है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ऋषि ने लिखा है: “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। इस श्लोक में वृक्ष, भूमि और माँ की अवधारणा परस्पर जुड़ी हुई है क्योंकि धरती माँ की सबसे सजीव अभिव्यक्ति उसके वन और वृक्ष ही हैं। पेड़ केवल काठ और पत्तियों का समूह नहीं है, वह धरती की साँस है, उसका हृदयस्पंदन है।

वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि जब राम वन को जाते हैं तो वह वन केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, वह एक जीती जागती चेतना है। वृक्षों को राम की पीड़ा का बोध होता है, पंछी उनका स्वागत करते हैं, नदियाँ उन्हें पहचानती हैं। यह दृष्टि बताती है कि भारत ने कभी प्रकृति को निर्जीव नहीं माना। वृक्ष हमारे लिए सदैव एक जीवंत सत्ता रहे हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि

अश्वत्थमेकं चम्पकं, न्यग्रोधमेकं तथैव च। दश पुष्पफलोपेतान् वृक्षान् रोपयते यदि॥ अनेन पुत्राः पुत्रैश्च त्वया स्वर्गे महीयते। (महाभारत, अनुशासन पर्व 58.25)

अर्थात जो मनुष्य एक अश्वत्थ (पीपल), एक चंपा, एक बरगद और दस फलदार वृक्ष लगाता है, वह पुत्र पौत्रों सहित स्वर्ग में सम्मानित होता है।

पेड़ और माँ में अद्भुत समानता है। माँ जन्म देती है, पेड़ जीवन देता है। माँ छाँव देती है, पेड़ भी छाँव देता है। माँ बिना माँगे सब कुछ दे देती है, पेड़ भी अपने फल, छाल, जड़, पत्तियाँ, ऑक्सीजन सब कुछ बिना प्रतिदान की अपेक्षा के देता है। माँ की गोद में बच्चा निर्भय होता है, वैसे ही वृक्ष की छाया में थका हुआ पथिक निर्भय होकर विश्राम करता है।

यह भी पढ़ें  नैरेटिव, नेटवर्क और राष्ट्र के विरुद्ध मानसिक युद्ध

संस्कृत में एक सुभाषित है: “वृक्षो रक्षति रक्षितः” अर्थात वृक्ष उसी की रक्षा करता है जो उसकी रक्षा करता है। माँ के बारे में भी यही सच है। जो समाज अपनी माताओं का सम्मान करता है, वह समाज सुदृढ़ और समृद्ध होता है। जो समाज अपने वृक्षों की रक्षा करता है, वह समाज प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहता है।

माँ बिना माँगे सब कुछ दे देती है, पेड़ भी अपने फल, छाल, जड़, पत्तियाँ, ऑक्सीजन सब कुछ बिना प्रतिदान की अपेक्षा के देता है। इस भाव को व्यक्त करता भर्तृहरि का यह सुप्रसिद्ध श्लोक है:

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥ (नीतिशतकम्, भर्तृहरि)

अर्थात: वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल भी परोपकार के लिए ही रखते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे सज्जन पुरुष करते हैं।

भारत में वृक्षों के प्रति माँ जैसा भाव केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रहा, यह लोकजीवन में भी प्रवाहित होता रहा। सन 1730 में राजस्थान के खेजड़ली गाँव में अमृता देवी बिश्नोई ने अपने प्राण देकर खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा की। उनके साथ उनकी तीन बेटियाँ और तीन सौ तिरासी अन्य बिश्नोई स्त्री पुरुष भी वृक्षों से लिपट गए और राजा के सैनिकों के कुल्हाड़ों के सामने छाती थाम कर खड़े रहे। यह घटना बताती है कि भारत में स्त्री और वृक्ष का रिश्ता सदैव आत्मीय और मातृवत रहा है।

1973 में उत्तराखंड में चिपको आंदोलन शुरू हुआ। गौरादेवी के नेतृत्व में रेनी गाँव की महिलाओं ने पेड़ों से लिपट कर उन्हें कटने से बचाया। वे कह रही थीं: “यह जंगल हमारी माँ की तरह है, इसे नहीं कटने देंगे।” यह वाक्य केवल एक नारा नहीं था, यह भारतीय स्त्री की उस सनातन चेतना की अभिव्यक्ति था जो वृक्ष में माँ को देखती है और माँ में वृक्ष को।

यह भी पढ़ें  रक्तरंजित थियानमेन और खूनी वामपंथी इतिहास

आज जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो आँकड़े भयावह हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले सौ वर्षों में पृथ्वी के लगभग आधे वन नष्ट हो चुके हैं। भारत में भी तेजी से होते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण वन क्षेत्र घटा है। जलवायु परिवर्तन, बाढ़, सूखा, भूस्खलन ये सब उसी पर्यावरण विनाश के परिणाम हैं जिसे हम धीरे धीरे बढ़ावा देते रहे।

5 जून 2024 को विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान की शुरुआत की। उन्होंने स्वयं दिल्ली में एक पीपल का पेड़ लगाया और देशवासियों से आग्रह किया कि वे अपनी माँ की स्मृति में, उनके सम्मान में, उनके आशीर्वाद के रूप में एक पेड़ अवश्य लगाएँ।

मोदी जी की इस संकल्पना में गहरी भारतीय आत्मा है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को एक वैज्ञानिक या सरकारी दायित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और सांस्कृतिक दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि माँ और पेड़ दोनों ही देते हैं, दोनों ही जीवन का आधार हैं। जब हम माँ के नाम पर पेड़ लगाते हैं तो हम दो जीवनदात्री शक्तियों को एक साथ सम्मानित करते हैं।

भारत में वृक्षपूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। घर के आँगन में तुलसी का पौधा माँ की तरह पूजा जाता है। प्रतिदिन उसे जल चढ़ाना, दीपक जलाना, प्रदक्षिणा करना ये सब क्रियाएँ उस भाव को जीवित रखती हैं कि वनस्पति जीवन और मानव जीवन एक ही सूत्र में बँधे हैं।

हम वृक्षो की पूजन परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म दोनों का समन्वय है। पीपल रात को भी ऑक्सीजन देता है इसलिए उसे पवित्र माना गया। नीम में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण हैं इसलिए उसे देवी का स्वरूप दिया गया ताकि लोग उसे काटें नहीं। तुलसी में रोगाणुनाशक गुण हैं इसलिए उसे घर के आँगन में पूजा जाता है।

आज के युग में हम पर्यावरण की बात करते समय अक्सर टन, किलोग्राम, प्रतिशत और करोड़ों जैसे शब्दों में बात करते हैं। लेकिन जब हम माँ के नाम पर पेड़ लगाते हैं तो यह संख्यात्मक भाषा एक व्यक्तिगत और भावनात्मक भाषा में बदल जाती है। यही “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान की मौलिक शक्ति है।

यह भी पढ़ें  क्यों जरूरी है बच्चों के लिए पर्यावरण शिक्षा?

संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम् में शकुंतला को वन की पुत्री के रूप में चित्रित किया है। संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम् में शकुंतला की विदाई के समय यह मर्मस्पर्शी श्लोक लिखा:

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्याः भवत्युत्सवः सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्॥

(अभिज्ञानशाकुंतलम्, चतुर्थ अंक, कालिदास)

अर्थात: जो शकुंतला पहले तुम्हें जल पिलाए बिना स्वयं जल नहीं पीती थी, जो तुम्हारे पल्लव को प्रेम के कारण नहीं तोड़ती थी, जिसके लिए तुम्हारे पुष्पित होने का समय उत्सव था, वही शकुंतला आज पति के घर जा रही है। तुम सब उसे विदाई दो। इस श्लोक में वृक्ष और मनुष्य के बीच माँ और पुत्री के रिश्ते की गहरी अनुभूति है।  कबीर की वाणी में माँ और वृक्ष का यही भाव इस प्रकार प्रकट होता है:

वृक्ष कबहुँ नहि फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर॥ (कबीर दोहावली)

अर्थ: वृक्ष कभी अपना फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल कभी संचित नहीं करती। परोपकार के लिए ही संत इस संसार में जन्म लेते हैं। इसी दोहे में माँ, पेड़ और नदी की एकात्मता दिखती है। तीनों का स्वभाव एक जैसा है, देते रहना और देते रहना।

“एक पेड़ माँ के नाम” अभियान ने एक वर्ष से भी कम समय में करोड़ों लोगों को प्रेरित किया। यह अभियान इसलिए सफल हो रहा है क्योंकि यह भारत की उस सनातन चेतना को छूता है जो माँ और प्रकृति में भेद नहीं करती। जब हम कोई पेड़ लगाते हैं तो हम केवल एक बीज नहीं बोते, हम एक वादा करते हैं। माँ से वादा, धरती से वादा और आने वाली पीढ़ियों से वादा। यह वादा कि हम इस जीवन को आगे बढ़ाएंगे, इस प्रकृति को बचाएंगे और माँ की ममता को इस धरती पर जीवित रखेंगे।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।