तिलचट्टों भारत कोई इंस्टाग्राम रील नहीं
दो चार दिनों से भारत में बड़ा मजाक चल रहा है। कुछ दगे हुए कारतूस पुन; जीवंत होने की फ़िराक में हैं। इन्हीं दगे हुए कारतूसों ने ‘काकरोच जनता पार्टी’ नामक एक चुटकुला शुरु किया गया और इसकी आड़ में राजनैतिक रोटी सेंकने की तैयारी शुरु कर दी। तिलचट्टों के माध्यम से सोशल मीडिया पर “तिलचट्टा क्रांति” का बड़ा शोर किया जा रहा है।
इसके पीछे अराजकतावादी शक्तियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं, वे लोग इसे नई आज़ादी की लड़ाई बता रहे हैं, कुछ इसे व्यवस्था परिवर्तन का बिगुल मान रहे हैं। मोबाइल स्क्रीन पर अंगूठा घुमाते हुए लोग ऐसे उछल रहे हैं, मानो बस अगली ही सुबह संसद भवन पर तिलचट्टों का झंडा फहराने वाला हो।
लेकिन भारत कोई इंस्टाग्राम रील नहीं है, जिसे पंद्रह सेकंड के जोश से चलाया जा सके। यह वह देश है जिसकी लोकतांत्रिक जड़ें हजारों वर्षों की सभ्यता, संवाद, सहिष्णुता और सामाजिक संतुलन में गड़ी हुई हैं। यहाँ क्रांति का अर्थ केवल शोर नहीं होता, त्याग भी होता है। यहाँ परिवर्तन केवल ट्रेंड से नहीं आता, तपस्या से आता है।
जो लोग अराजकता को क्रांति समझ बैठे हैं, वे शायद भारत की आत्मा को नहीं जानते। यह देश क्षणिक उत्तेजनाओं से नहीं चलता। यहाँ जनता बहुत धैर्य से देखती है, परखती है, और फिर निर्णय लेती है। यही कारण है कि यहाँ हर चमकती चीज़ सूरज नहीं बन जाती।
देश ने पहले भी एक बड़ा प्रयोग देखा था। “इंडिया अगेंस्ट करप्शन” के दिनों में करोड़ों लोगों की आँखों में आशा थी। लोग तन, मन, धन से जुड़े। उन्हें लगा कि शायद अब राजनीति का चरित्र बदलेगा। भ्रष्टाचार मिटेगा। आदर्शवाद सत्ता के गलियारों में प्रवेश करेगा। सड़कों पर मोमबत्तियाँ जलीं, नारे लगे, भावनाएँ उमड़ीं। लेकिन धीरे-धीरे उसी आंदोलन की कोख से निकली राजनीति ने आदर्शों को कुर्सी के पायों के नीचे कुचल दिया।
जो लोग व्यवस्था बदलने निकले थे, वे स्वयं व्यवस्था के सबसे सुविधाजनक हिस्से बन बैठे। भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेकर आए लोग सत्ता के सुख में ऐसे डूबे कि जनता केवल देखती रह गई। आकंठ तक भ्रष्टाचार में डूब गये, आम आदमी का भरोसा तार-तार हो गया। तब देश ने सीखा कि क्रांति के नारों और चरित्र की सच्चाई में बहुत अंतर होता है।
दूध का जला सचमुच छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है। इसीलिए अब वही अराजक लोग नया मुखौटा लगाकर सामने आए हैं। जब “काकरोच जनता पार्टी” जैसी डिजिटल आतिशबाजियाँ छोड़ने से तो जनता बहकने वाली नहीं है। उसे पता है कि सोशल मीडिया का शोर और राष्ट्र निर्माण की गंभीरता दो अलग चीजें हैं। देश चलाना, मीम बनाना नहीं है। इन मसखरों ने लोकतंत्र को मजाक बनाकर रख दिया है।
सब जानते हैं, तिलचट्टे गंदगी में पनपते हैं। वे अंधेरे में फलते हैं और सबसे बड़ी बात, वे सफाई से डरते हैं। शायद यही कारण है कि कुछ लोगों को यह प्रतीक इतना प्रिय लग रहा है। क्योंकि सकारात्मक निर्माण में श्रम लगता है, जबकि अराजकता फैलाने के लिए केवल शोर काफी होता है।
भारतीय लोकतंत्र ने आक्रमण देखे हैं, विभाजन देखे हैं, आपातकाल देखा है, आतंकवाद देखा है, लेकिन विचलित नहीं हुआ। कारण स्पष्ट है, यह लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में नहीं, करोड़ों भारतीयों की चेतना में बसता है। इसलिए काकरोचों की आड़ में अराजक तत्वों की दाल गलने वाली नहीं।
तिलचट्टे रात में निकलकर दीवारों पर जरूर दौड़ सकते हैं, कुछ देर लोगों को भ्रमित भी सकते हैं, लेकिन सूरज निकलते ही उन्हें फिर दरारों में लौटना पड़ता है। और भारत, अंततः, सूरज की सभ्यता है, तमराज किलबिस की नहीं। जो लोग इनकी आड़ में खेल रहे हैं, उन्हें भी मुंह की खानी पड़ेगी। ये पब्लिक है सब जानती है। बाकी जो है सो तो हैइए है।
आचार्य ललित मुनि

