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विश्वशांति में भारत की भूमिका-1

-डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल

भविष्य में वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका पर युगदृष्टा ,युगऋषि, अध्यात्मवेत्ता ,वेदमूर्ति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं कि- ” इन दिनों भारत अनेक भीतरी विग्रह और बाहरी दबावों के बीच से गुजर रहा है। उनका प्रभाव प्रगति पथ में रोड़ा बन रहा है। चित्र -विचित्र प्रकार की कठिनाइयां उत्पन्न कर रहा है। इस असमंजस को देखते हुए औसत दर्जे के मनुष्य का चिंतित होना और भविष्य के लिए कठिनाइयों के बढ़ने की आशंका करना स्वाभाविक है। यों छोटी-मोटी असफलताओं भी व्यवधान उत्पन्न करती हैं वे अदूरदर्शियों को बड़ी बढ़-चढ़कर प्रतीत होती हैं और उतने भर से उनकी स्थिति घबरा जाने जैसी बन जाया करती है।

देश के सामने प्रस्तुत इन दिनों की समस्याओं को गिनाया जाए तो उनमें से राष्ट्रीय महत्व की दर्जनों विभिषिकायें सामने खड़ी दिखती हैं। स्थानीय महत्व की दूरभिसंधियों को गिना जाए तो उनकी संख्या सैकड़ो तक जा पहुंचती है। जो निराशा भरा ,असफलताओं से जुड़ा पक्ष देखने की आदि है, उनके लिए प्रस्तुत संकटों का बढ़ना की कल्पना क्षेत्र में आता है। फलत: वे स्वयं हैरान होते हैं और अपनी मान्यताएं दूसरों को बढ़ा- चढ़ा कर बताने पर उन्हें भी हैरानी में डालते हैं।

यह एक पक्ष की चर्चा है। विचारशील दूरदर्शी लोगों के लिए उज्जवल भविष्य की परिकल्पना करना न केवल स्वाभाविक ही है, वरन उनका चिंतन रचनात्मक होता है। जो अपने पुरुषार्थ और प्रयत्न पर दृष्टि डालते हैं और सत्य की जीत होने के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक है कि सुधरे हुए दृष्टिकोण से सोचें और सत्प्रेरणा का सुखद परिणाम होने की बात का अनुमान लगाए।

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हमारा स्वयं का विश्वास इतने दिनों की आराधना और दैवी सन्निकटता के आधार पर यह बन गया है कि- भारत अगले दिनों सभी क्षेत्रों में असाधारण प्रगति करेगा। इतना ही नहीं, वह दूसरे पिछड़े और पद दलित देशों को ऊंचा उठाने में कारगर भूमिका भी संपन्न करेगा। उसकी सनातन परंपरा भी ऐसी ही है। उसने उन दिनों में विश्व व्यवस्था को सुधारने संभालने में भारी काम किया था, जब संसार में सर्वत्र अंगढ़ता और पिछड़ा पन छाया हुआ था। तब यहां के मनीषी परिव्राजक विश्व के कोने-कोने में गए थे और ज्ञान- विज्ञान से अवगत कराके पिछड़े जनसमुदाय को ऊंचा उठाया था। अबकी बार उसी पुरातन प्रक्रिया की नई परिस्थितियों के अनुरूप पुनरावृत्ति करनी होगी। सफलता पूर्वकाल में भी मिलती थी और सब परिणाम इन दिनों की प्रगतिशीलता के भी निकलेंगे।

प्राचीनकाल के पिछड़ेपन में अभाव, दारिद्रय ,अज्ञान और अनाचारों का बाहुल्य था। तब का प्रशिक्षण भारतीय देव आत्माओं ने उसी के अनुरूप किया था। समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान थे। तब की परिस्थितियों से आज भारी अंतर हुआ है। विज्ञान और बुद्धिवाद उन्नति से सुविधा- साधन बढ़े हैं। लोगों को तर्क करना और चमत्कारी निर्माण खड़े करना भी आ गया है, किंतु भारी कमी यह हुई है कि मनुष्य असाधारण रूप से विलासी, स्वार्थी और पाखंडी बन गया है। उसकी निष्ठुर आक्रामकता और विश्व विश्वासघाती प्रपंचपरायणता ने अगणित तरीके ढूंढ निकाले हैं और मुट्ठी भर चतुर लोगों ने बहुसंख्यक असमर्थों को अपने चंगुल में कसकर उन्हें निचोड़ डालने का उपक्रम अपनाया है। प्रत्यक्ष लड़ाई का सामना किसी प्रकार किया भी जा सकता है, पर परोक्ष छ्ध्ं से जूझना किसी प्रकार भी सरल व संभव नहीं होता। विश्व इन दिनों दो हिस्सों में बट गया है- एक शोषक दूसरा शोषित; एक समर्थ दूसरा असमर्थ। दोनों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष तो जहां-तंहाँ ही चल रहा है, पर परोक्ष में इर्ष्या- द्वेष और रोष, प्रतिशोध की ऐसी आग जल रही है, जो ईंधन जैसी उपेक्षित दीखने पर भी भयानक दावानल भड़का देने के लिए अभी भी अपने अस्तित्व को दाँव पर लगा सकती है।

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स्पष्ट है कि वर्तमान परिस्थितियां इसी प्रकार चलती रही तो उनके परिणाम अणु युद्ध न होने पर भी सर्वत्र बिष बीज बो देने की प्रक्रिया अपना लिए जाने पर उतने ही भयंकर होंगे, जिन्हें विश्व- विनाश के समतुल्य समझा जा सके। सामान्य बुद्धि हथप्रभ है कि इस व्यापक विडंबना से कैसे निपटा जाए! किंतु भारत की जो देवात्मा अभी-अभी जागृत हुई है, अब विश्वास पूर्वक घोषणा कर सकती है कि प्रस्तुत परिस्थितियाँ देर तक नहीं रहेगी और देर तक नहीं रहने दी जाएँगी।

यों भारत की जनसंख्या भी इन दोनों 140 करोड़ तक जा पहुंची है। संसार के समस्त मानवों में सात के पीछे एक भारतीय सुधरता हुआ हो तो छह पिछड़ों को भी ऊंचा उठाने में सहायता कर सकता है । एक नाविक जब अपनी नाव में दिनभर सैकड़ो को इस पार से उस पार पहुंचाते रह सकता है तो कोई कारण नहीं की जिनकी नसों में ऋषियों और देवताओं का रक्त बहता है, वे उपयोगी परिवर्तन की बेला में महती भूमिका न निभा सके । देश गरीब है, फिर भी उसकी श्रद्धा बलवती है। जिसके बलबूते में साधन जुटाए जा सकते हैं, जो विश्व के कायाकल्प में महती भूमिका निभा सकें। संसार के प्रमुख तीर्थ में से अब भी तीन चौथाई भारत में ही है। संसार के महापुरुषों के इतिहास की आदि से लेकर अब तक की गणना की जाए तो प्रतीत होगा कि उठे हुए, दूसरों को कंधों पर बैठा कर उठाने वाले लोग इसी देश में हुए हैं। यह यहां की मिट्टी की विशेषता है। पूरब दिशा से ही सदा सूर्य निकलता है और उसका प्रकाश सारे संसार में फैला है।

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उषाकाल, ब्रह्ममुहूर्त और अरुणोदय का वह देश भारत ही है, जहां से दिनकर उदय होता और संसार में अपना प्रकाश फैलाता है। यह नित्य का क्रम है। अबकी बार उसे विशेष क्रम अपनाना होगा। अंधेरे को दूर कर उजाला लाने भर से काम नहीं चलेगा। इस बार बौद्धिक भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता को निरस्त करना चाहिए। यह कार्य अपने घर से आरंभ होगा और विश्व के दूसरे छोर तक निर्बाध गति से बढ़ता जाएगा। आज जिन कर्म से संसार भर का जन समुदाय खिन्न- विपन्न है, कल उसकी परिस्थितियां बदलने लगेगी और तब तक बदलने की यह प्रक्रिया चलती ही रहेगी ,जब तक की स्वाभाविक और संतोषजनक स्थिति में जा पहुंचने का समय नहीं आता।”

क्रमशः …..