विश्वशांति में भारत की भूमिका-२
डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल
“अगले दिनों लोग आश्चर्य करेंगे की किसी समय का पिछड़ा पराधीन देश किस प्रकार ऐसा कायाकल्प कर सका कि अपनी समस्या तो सुलझाई ही, विश्व भर की समस्याओं को सुलझाने में, विपत्तियों के निराकरण में असाधारण सहायता की।
इन दिनों भारत की राजनीतिक स्थिति और शक्ति सामान्य है, पर वह दिन- प्रतिदिन आत्मबल का धनी होता जाता है। उसे ऐसी दैवी प्रेरणा और अनुकंपा हस्तगत होने जा रही है, जिसकी क्षमता शस्त्रबल, बुध्दिबल और धनबल तीनों से ही अधिक पड़ती है। इस प्रकार भारत का पलड़ा अनायास ही भारी होकर इस स्थिति में पहुंच जाता है कि वह अपने साथ-साथ दूसरों को भी उबार सके।
इस संदर्भ में फ्रांसीसी अदृश्यदृष्टा – ‘नोस्ट्राड़ेमस’ का भविष्य कथन बहुत ही विश्वावस्त और प्रमाणिक माना जाता है। उसने इस सहस्राब्दी के आदि में केवल राजनीतिक भविष्यवाणी लिखी हैं। अन्य ज्योतिषी तो व्यक्ति विशेष की ग्रह-दशा बताते हैं और इस छोटे दायरे तक सिमित रहते हैं, पर उपयुक्त अदृश्य दृष्टा ने समस्त विश्व का राजनीतिक भविष्य देखा और लिखा है। जिन देशों का उदय तक उसके जमाने में नहीं हुआ था, उनके आरंभ होने से लेकर मिट जाने तक के विवरण प्रस्तुत किए हैं। आश्चर्य यह है कि उन कथनों की सच्चाई पिछले 500 वर्षों से सही होती गई। उसकी राजनीतिक भविष्यवादिता में कहीं अंतर नहीं आया।
नोस्ट्राडेमस ने इन दिनों की परिस्थितियों का परीक्षण करते हुए लिखा है कि- भारत विश्व का नेतृत्व करेगा। उसी की दैवी शक्ति उन प्रयोजनों को पूरा करेगी, जिनके सहारे संसार की अनेकानेक समस्याएं उलझें और विपत्ति की भयंकर विभिषिकाओ से त्राण मिले। इन भविष्यवाणियों पर फ्रांस के शासन अध्यक्ष ‘मितरां’ की तरह हमारा भी अटूट विश्वास होता है कि ऐसा ही होकर रहेगा।
यह एक सुनिश्चित और विश्वास्त तथ्य है कि – युगसंधि के 20 वर्षों में लगातार देश की कुंडलीनी- जागरण के लिए प्रबल प्रयत्न हुए हैं और अब वे इस स्थिति तक पहुंच गए हैं कि अपने प्रचंड और उसके चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकें, करेंगे भी।
इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द-गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचंड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही वरिष्ठ समझता है। जो जितना संपन्न और धूर्त है वह अपनी शेखी उसी अनुपात में बाघरता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशो को डराता और फ़ुसलाता भी है।
यही क्रम इन दोनों चलता रहा है किंतु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा और स्थितियां इस प्रकार करवट लेगी की जो पिछले दिनों होता रहा है, अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैवबल जन समुदाय को आकर्षित ,प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नई शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे; तो प्राचीनकाल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।
बुद्ध ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भूभाग को नवचेतना से प्रभावित किया था। विवेकानंद विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बनाकर गए थे। कोडिंन्य और कुमार जीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधीचि, परशुराम, अगस्त, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे । चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणी बनाया था। देश को संभालने में तो अनेकों प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजरे हैं।
समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा अभी कितनी ही ऐसी समस्याएं दिखती है, जिससे आशंका होती है, कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे, चिंगारियां दावानल बन कर तो न टूट पड़ेगी; बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जाएगा । ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आस्वस्त करना चाहते हैं कि- विनाश को विकास पर हाबी न होने दिया जाएगा। मार्ग में रोड़े भले ही अड़चन उत्पन्न करते रहें,पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुंचेगा जिससे विश्व की शांति से रहने और चैन की सांस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक-एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।”
क्रमशः ….


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