समय के तराजू पर हर सत्ता को एक दिन है तौला जाना

समय के तराजू पर हर सत्ता को एक दिन तौला जाना है, यही बंगाल में हुआ, जब समय ने तोला तो ममता का मजबूत किला धराशाई हो गया। जब तक सत्ता का दवाब रहता है तब तक आम इंसान चुपचाप अन्याय सहता रहता है, क्योंकि सत्ता के पास हजार हथकंडे होते हैं प्रताड़ित करने के। लेकिन जब यह दवाब और प्रताड़ना सहनशक्ति की अंतिम सीमा को पार कर जाती है तो वर्षों का दबा हुआ आक्रोश एक भयंकर ज्वालामुखी की तरह फट पड़ता है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति इसी उबलते हुए ज्वालामुखी का सजीव और ज्वलंत उदाहरण बन गई है। आज राज्य की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं वे किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए गहरे चिंतन का विषय हैं।
जनता का गुस्सा इस कदर भड़क चुका है कि हार के बाद टीएमसी के नेताओं को सार्वजनिक स्थानों पर भारी विरोध और अपमान का सामना करना पड़ रहा है। अभिषेक बनर्जी पर अंडे और पत्थर फ़ेंके गये, कल्याण बनर्जी पर भी पत्थर फ़ेंके गये। उनको गालियां दी जा रही है, पीसी चोर, भाइपो चोर के नारे लग रहे हैं। इनके प्रति कोध्र घृणा के स्तर तक बढ चुका है जिसके फ़लस्वरुप इन्हें सरेआम बेइज्जत किया जा रहा है। शहरों और गांव से इनके अधिकांश गुंडेनुमा नेता भाग चुके हैं, जो बचे हुए हैं वे जगह जगह कूटे जा रहे हैं। यह दृश्य अचानक एक दिन में उत्पन्न नहीं हुआ है बल्कि इसके पीछे वर्षों की पीड़ा, भ्रष्टाचार और प्रताड़ना का एक लंबा इतिहास छिपा हुआ है।
जिन्होंने ममता बनर्जी के कार्यकाल में मलाई चाटी वे अब टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थामने के लिए लालायित हैं। लेकिन जिस आम जनता ने इस व्यवस्था का सबसे काला रूप देखा है, वह नहीं चाहती कि ये भाजपा में आएं। यह वही आम जनता है जिससे इन नेताओं ने कटमनी लिया, जिनके साथ लगातार भ्रष्टाचार हुआ और जिनको इन्होंने सत्ता में रहते हुए बुरी तरह प्रताड़ित किया। जिन पर हमेशा एक मनोवैज्ञानिक दवाब बना रहा और जिन्हें सत्ता की हनक दिखाकर भयभीत करते रहे। आज उसी का परिणाम सबके सामने आ रहा है। जब किसी इंसान को लगातार डरा कर रखा जाता है तो एक दिन ऐसा आता है जब उसके भीतर का सारा डर खत्म हो जाता है और यह आक्रोश तो फूटना ही था।
टीएमसी के राज में बंगाल के कई हिस्सों में निरीह और निर्दोष लोगों के घरों में टीएमसी के गुंडों द्वारा आगजनी करने की भयावह घटनाएं सामने आईं। लोगों ने अपनी ही आंखों के सामने अपना जीवन भर का आशियाना जलते देखा। इसके अतिरिक्त संदेशखाली जैसी हृदयविदारक घटनाओं ने तो पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। वहां महिलाओं के साथ हुए अमानवीय अत्याचार और बलात्कार के जो गंभीर आरोप सामने आए उसने एक सभ्य समाज की आत्मा पर बहुत गहरा घाव किया है।
इसी कड़ी में कोलकाता के आर जी कर अस्पताल में एक महिला डॉक्टर के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या की घटना ने इस उबलते हुए आक्रोश में बारूद का काम किया है। जो अस्पताल जीवनदान देने का पवित्र स्थान माना जाता है वहां ड्यूटी पर तैनात एक डॉक्टर के साथ ऐसी दरिंदगी ने पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया है। इस घटना के बाद जिस तरह प्रशासन की प्रारंभिक लापरवाही और मामले की लीपापोती करने के आरोप सामने आए उसने जनता के विश्वास को पूरी तरह से तोड़ दिया।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और सत्ताधारी दल के प्रभावशाली लोगों पर ऐसे घिनौने अपराधों के आरोप लगें तो आम जनता का धैर्य एक न एक दिन जवाब दे ही देता है। महिलाओं के सम्मान को पहुंची इस गहरी ठेस ने जनता के अंदर सुलग रही आग को और भड़का दिया। इन्ही सब घटनाओं से बचने के लिए और जनता के इस रौद्र रूप को देखकर टीएमसी में फूट पड़ गई। अठावन विधायकों ने अलग दल के रुप में स्पीकर को पत्र सौंपा। इसके साथ ही 20 सांसदों द्वारा लोकसभा में अलग गुट बनाने की खबर गलियारों में गुंज रही है।
यह कदम केवल राजनीतिक अवसरवादिता नहीं है बल्कि इसका मूल कारण वह गहरा डर है जो अब इन नेताओं के मन में बैठ गया है। वे भली भांति समझ चुके हैं कि जिस नाव पर वे सवार हैं वह अब जनता के आक्रोश के उफनते समंदर में डूबने वाली है। इसलिए वे समय रहते खुद को उस भ्रष्ट व्यवस्था से अलग कर लेना चाहते हैं जिसने यह सारा पाप ममता के सिर पर डालना चाहते हैं।
इसके साथ ही एक वीडियो आया है जिसमें ममता बनर्जी काली मंदिर में दर्शन करने गई थी। वहां पर किसी दर्शनार्थी ने उनकी तरफ देखा ही नहीं और न अभिवादन किया। एक समय था जब उनके आस पास लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती थी लोग उनकी एक झलक पाने को आतुर रहते थे। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के कर्म उसके सामने आते हैं। जो अपने को सर्व शक्तिमान समझता है उसके दुर्दिन भी आते हैं। मंदिर का वह दृश्य इसी बात का जीता जागता प्रमाण है कि सत्ता का गुरूर एक न एक दिन जरूर टूटता है। जब जनता अपने मन से किसी को सम्मान देना बंद कर देती है तो बड़ी से बड़ी राजनीतिक हस्ती भी एक बेबस इंसान नजर आती है।
बंगाल के घटनाक्रम इस बात की गवाही देते है कि राजनीति में शक्ति और पद कभी भी स्थायी नहीं होते। जिन लोगों ने अपने राजनीतिक जीवन के चरम पर आम जनता की चीखों को अनसुना किया, जिन्होंने भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी को बढ़ावा दिया, आज उन्हें उसी जनता के तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है। अंडे जूते फेंकना या पत्थर मारना किसी भी दृष्टि से कानून सम्मत नहीं है, लेकिन हमें उस मानवीय मनोविज्ञान को भी गहराई से समझना होगा जो एक सीधे सादे नागरिक को इस हद तक हिंसक और उग्र बना देता है।
यह उस पूरी व्यवस्था की भयानक विफलता है जिसने न्याय के सभी दरवाजे आम आदमी के लिए बंद कर दिए थे। सत्ता का भव्य सिंहासन लोकतंत्र में हमेशा जनता के मजबूत कंधों पर ही टिका होता है और जब वे कंधे अपना समर्थन वापस ले लेते हैं तो बड़े बड़े महल और अहंकार के पहाड़ ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं, ममता बनर्जी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उसका किला भी ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह जाएगा। अन्य नेताओं को इससे सबक लेना चाहिए।

