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रामगढ़ को वैश्विक धरोहर के रूप में विकसित करने के लिए गहन शोध की आवश्यकता : डॉ. निलिम्प त्रिपाठी

उदयपुर – सरगुजा, 30 जून। रामगढ़ महोत्सव के अंतर्गत आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में प्रख्यात संस्कृतविद् एवं डॉ. भास्कराचार्य त्रिपाठी शोध संस्थान, भोपाल के अध्यक्ष आचार्य डॉ. निलिम्प त्रिपाठी ने “दक्षिणापथ का सांस्कृतिक पड़ाव रामगढ़” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि रामगढ़ केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और साहित्य का बहुआयामी केंद्र है। इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, पुरातात्विक और प्राकृतिक विशेषताओं पर समग्र एवं वैज्ञानिक शोध किया जाए तो यह विश्व स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि दण्डकारण्य को सामान्यतः केवल एक घने वन क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, जबकि भारतीय ग्रंथों में इसका स्वरूप अत्यंत समृद्ध सांस्कृतिक भूभाग के रूप में वर्णित है। वाल्मीकि रामायण, महाभारत, उत्तररामचरित, हरिवंश पुराण तथा श्रीमद्भागवत जैसे प्राचीन ग्रंथों में दण्डकारण्य का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार सूर्यवंशी सम्राट इक्ष्वाकु के पुत्र दण्ड द्वारा इस विशाल वन क्षेत्र को अपने अधीन किए जाने के कारण इसका नाम दण्डकारण्य पड़ा।

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डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार महाराजा दशरथ ने भी इस क्षेत्र में व्यवस्था स्थापित करने के लिए अभियान चलाया था और बाद में भगवान श्रीराम वनवास के दौरान दण्डकारण्य आए। उन्होंने कहा कि श्रीराम का वनगमन केवल वनवास नहीं था, बल्कि दण्डकारण्य में सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के पुनर्संयोजन का भी एक महत्वपूर्ण चरण था।

उन्होंने महामहोपाध्याय डॉ. भास्कराचार्य के शोध का उल्लेख करते हुए कहा कि अनेक विद्वान चित्रकूट से भद्राचलम् तक विस्तृत भूभाग को दण्डकारण्य मानते हैं और सरगुजा का रामगढ़ इस सांस्कृतिक परिक्षेत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है। यह स्थान उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक तथा व्यापारिक संपर्क का प्रमुख केंद्र था।

व्याख्यान में उन्होंने रामगढ़ की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि समुद्र तल से लगभग 3200 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पर्वतीय क्षेत्र प्राचीन काल में ऋषियों के तपोवन, यात्रियों के विश्राम स्थल तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि रामायण और उत्तररामचरित में वर्णित दण्डकारण्य केवल जंगल नहीं था, बल्कि आश्रमों, तीर्थों, नदियों, पर्वतों और प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण एक समृद्ध सांस्कृतिक प्रदेश था।

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आचार्य डॉ. त्रिपाठी ने रामगढ़ स्थित सीताबेंगरा गुफा को भारतीय नाट्य परंपरा की अमूल्य धरोहर बताते हुए कहा कि यह नाट्यशास्त्र में वर्णित ‘शैलगुहाकार नाट्यमण्डप’ का जीवंत उदाहरण प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि यह स्थल विश्व की प्राचीनतम नाट्य परंपराओं के अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध की आवश्यकता है।

उन्होंने रामगढ़ को महर्षि शरभंग के आश्रम से जोड़ने वाले शोधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘ब्रह्मभवनप्रख्य शरभंग आश्रम’ की विशेषताएँ रामगढ़ की प्राचीन संरचनाओं, सात परकोटों के भग्नावशेषों तथा आसपास के प्राकृतिक परिवेश से काफी हद तक मेल खाती हैं। जोगीमाड़ा के शिलालेख में वर्णित सुतनुका देवदासी तथा यहाँ की नृत्य-संगीत परंपरा भी इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि रामगढ़ ऐसा सांस्कृतिक परिसर है जहाँ पुरातत्व, इतिहास, साहित्य, धर्म, नाट्यकला और प्रकृति एक साथ दिखाई देते हैं। इस दृष्टि से यह बहुविषयक शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

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डॉ. त्रिपाठी ने जोर देकर कहा कि रामगढ़ की पुरातात्विक धरोहरों, प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता का समग्र वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। यदि इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएँ तो भविष्य में रामगढ़ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में भी सार्थक पहल की जा सकती है।

शोध संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी, विश्वविद्यालयों के शोधार्थी, इतिहासकार, पुरातत्व एवं संस्कृति के अध्येता तथा बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित थे। संगोष्ठी में रामगढ़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत के संरक्षण तथा उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया।