जमीनी साहित्यकार थे बाबा नागार्जुन : आज उनकी जयंती

वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर
बाबा नागार्जुन आम जनता के जीवन के सुख-दुःख से जुड़े जमीनी साहित्यकार थे। देश और समाज में व्याप्त विसंगतियों पर उन्होंने जनमानस को विचलित और जाग्रत करने वाली, एक से बढ़कर एक, हृदयस्पर्शी रचनाओं का सृजन किया। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि सहित प्रस्तुत है उनकी वर्ष 1958 की एक कविता—
दो हज़ार मन गेहूँ आया दस गाँवों के नाम
राधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम।
सौदा पटा बड़ी मुश्किल से, पिघले नेताराम।
पूजा पाकर साध गए चुप्पी हाकिम-हुक्काम।
भारत-सेवक जी को था अपनी सेवा से काम।
खुला चोर-बाज़ार, बढ़ा चोकर-चूनी का दाम।
भीतर झुरा गई ठठरी, बाहर झुलसी चाम।
भूखी जनता की ख़ातिर आज़ादी हुई हराम।
इस रचना में बाबा नागार्जुन ने 68 साल पहले की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण किया है। समाज में ऐसे हालात किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद हैं।
बाबा नागार्जुन को आज उनकी जयंती पर शत-शत नमन। उनका जन्म 30 जून, 1911 को बिहार के मधुबनी जिले के ग्राम सतलखा में हुआ था। बाबा का पैतृक गाँव दरभंगा जिले का तरौनी है।
हालांकि, ‘कविता कोश’ के अनुसार उनका जन्म वर्ष 1911 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था और वह 11 जून की तारीख थी। इसलिए हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक बाबा का जन्मदिन ज्येष्ठ पूर्णिमा को भी माना जाता है। जन्म-तारीख चाहे जो भी हो, महान विभूतियों की जीवन-गाथाएँ हमेशा प्रेरणा देने वाली और प्रासंगिक होती हैं। उनका निधन 5 नवम्बर, 1998 को दरभंगा में हुआ। उन्होंने अपनी लेखनी को जनता की ज्वलंत समस्याओं से जोड़ा। गरीब किसानों और मजदूरों की ज़िन्दगी सूखे और अकाल के दिनों में कैसी होती है, और जब कई दिनों के बाद अनाज के दाने घर में आते हैं, तब कैसा माहौल होता है, बाबा नागार्जुन की इस कविता में महसूस किया जा सकता है—
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास,
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास।
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त,
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद,
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद।
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद,
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।
बाबा नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। अपने साहित्यिक जीवन के प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने ‘यात्री’ और ‘वैदेह’ उपनामों से भी कविताएँ लिखीं। बाबा नागार्जुन मैथिली, हिन्दी, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं के विद्वान थे। उनकी साहित्य-साधना लगभग 68 वर्षों की है। वर्ष 1929 से 1997 तक उनका लेखन लगातार चलता रहा। उनके हिन्दी काव्य-संग्रहों में वर्ष 1953 में प्रकाशित ‘युगधारा’ और वर्ष 1994 में प्रकाशित ‘भूल जाओ पुराने सपने’ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन्हें मिलाकर उनके कुल 14 काव्य-संग्रह हैं।
वे उपन्यासकार भी थे
बाबा नागार्जुन उपन्यासकार भी थे। वर्ष 1948 में प्रकाशित ‘रतिनाथ की चाची’ और वर्ष 1990 में प्रकाशित ‘गरीब दास’ सहित उनके कुल 11 प्रकाशित उपन्यास हैं। उनका कहानी-संग्रह ‘आसमान में चंदा तैरे’ वर्ष 1982 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा। उनके बाल साहित्य में वर्ष 1958 में प्रकाशित ‘कथा मंजरी’ भी काफी चर्चित है। बाद में इसके दूसरे भाग का भी प्रकाशन हुआ। मैथिली कविताओं का उनका संग्रह ‘चित्रा’ वर्ष 1949 में प्रकाशित हुआ था। उनका आलेख-संग्रह ‘अन्नहीनम्-क्रियाहीनम्’ वर्ष 1983 में छपा। उनकी विभिन्न रचनाओं के विशाल भण्डार में से कई संकलन समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। इनमें विजयबहादुर सिंह द्वारा सम्पादित और वर्ष 1982 में प्रकाशित ‘बाबा नागार्जुन का रचना संसार’ तथा भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा वर्ष 2013 में प्रकाशित खगेन्द्र ठाकुर की पुस्तक ‘नागार्जुन का कवि-कर्म’ भी शामिल है।
बाबा नागार्जुन को वर्ष 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। उन्हें यह पुरस्कार उनकी मैथिली कृति ‘पत्रहीन गाछ’ के लिए दिया गया। इसके अलावा, उन्हें सुदीर्घ साहित्य-साधना के लिए समय-समय पर कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इनमें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘भारत भारती सम्मान’, मध्यप्रदेश सरकार का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ तथा पश्चिम बंगाल सरकार का ‘राहुल सांकृत्यायन सम्मान’ भी उल्लेखनीय हैं।

