ढाई आखर प्रेम का : लोकमंगल के महाकवि कबीर

कबीर हिंदी साहित्य के उस अद्भुत नक्षत्र हैं जो पंद्रहवीं शताब्दी के धुंधलके में उगे और आज भी उसी दीप्ति से जगमगा रहे हैं। वे केवल एक कवि नहीं थे, वे एक युगदृष्टा थे, एक समाजसुधारक थे, एक आध्यात्मिक क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपने दोहों और साखियों के माध्यम से उस समाज को झकझोरा जो जाति, धर्म और पाखंड की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। कबीर का जन्म सन 1398 के आसपास काशी (वाराणसी) में हुआ माना जाता है और उनका निधन 1518 के करीब मगहर में हुआ। वे जुलाहे (बुनकर) परिवार में पले-बढ़े और आजीवन उसी परिश्रमी जीवन को जीते रहे। इस श्रमजीवी पृष्ठभूमि ने उनकी भाषा और उनकी संवेदना दोनों को एक विशेष धरातल दिया जो विद्वानों की पोथियों में नहीं, जनता के हृदय में मिलता है।
कबीर की भाषा को विद्वानों ने “सधुक्कड़ी” या “खिचड़ी भाषा” कहा है। इसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, पंजाबी और अरबी-फारसी के शब्द घुले-मिले हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि कबीर की भाषा साहित्यिक परिष्कार की नहीं, जीवन की भाषा है। यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। जब कबीर कहते हैं,
“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे।
एक दिन ऐसा होएगा, मैं रौंदूंगी तोहे।”
तो इसमें भाषा की कोई कृत्रिम सज्जा नहीं है। यह कुम्हार की मिट्टी बोल रही है, वह मिट्टी जो हर गाँव के चौक में, हर बाजार में मिलती है। कबीर ने संस्कृत के पांडित्य को और अरबी-फारसी के मौलवियाना अंदाज को दोनों को अस्वीकार किया क्योंकि वे भाषाएं जनता तक नहीं पहुंचती थीं। कबीर चाहते थे कि ज्ञान, भक्ति और सत्य केवल मंदिरों, मस्जिदों और पाठशालाओं तक सीमित न रहें, वे घर-घर, गली-गली तक पहुंचें। इसीलिए उनकी भाषा में वे सब लोग थे जो श्रम करते थे, जो खेत जोतते थे, जो कपड़ा बुनते थे, जो कुम्हार की तरह मिट्टी को आकार देते थे। उनकी उपमाएं और रूपक भी इसी लोकजीवन से उठाए गए हैं।
कबीर की लोकचेतना उनकी सबसे क्रांतिकारी विरासत है। वे उस समय में जी रहे थे जब भारतीय समाज धार्मिक कट्टरता के बोझ से दबा हुआ था। हिंदू समाज में सवर्णों का वर्चस्व था और मुस्लिम समाज में मुल्ला-मौलवियों का। दोनों ओर आम आदमी पिस रहा था। कबीर ने इस दोहरी व्यवस्था को ललकारा। उन्होंने कहा,
“पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।
याते तो चाकी भली, पीस खाये संसार॥”
यहाँ कबीर एक सीधा सवाल करते हैं कि अगर पत्थर पूजने से ईश्वर मिलता है तो घर की चक्की को क्यों नहीं पूजते जो रोज अन्न पीसकर जीवन देती है? यह तर्क केवल धार्मिक नहीं है, यह गहरी सामाजिक चेतना है जो श्रम और उत्पादन को सम्मान देती है।
जाति के प्रश्न पर कबीर और भी स्पष्ट और निर्भीक थे। उन्होंने कहा,
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।”
अर्थात किसी की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान और गुण देखो। तलवार का मूल्य उसकी धार में है, म्यान में नहीं। यह उस समय के लिए अत्यंत साहसी वक्तव्य था जब जन्म से जाति तय होती थी और जाति से भाग्य। कबीर ने हिंदू-मुस्लिम दोनों के पाखंड को एक साथ उठाया। उन्होंने कहा,
“काँकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।”
अर्थात पत्थर जोड़कर मस्जिद बनाई और उस पर चढ़कर मुल्ला बाँग देता है, क्या खुदा बहरा हो गया है? यह व्यंग्य बाहरी धार्मिक आडंबर पर है। कबीर का ईश्वर न मंदिर में था, न मस्जिद में, वह तो हृदय की गहराई में था।
कबीर निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख कवि हैं। निर्गुण का अर्थ है वह परमसत्ता जो किसी रूप, रंग, जाति या धर्म से परे है। कबीर की भक्ति प्रेम की भक्ति है। वे प्रेम को ही साधना मानते थे। उनकी एक प्रसिद्ध साखी है,
“पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।”
यह दोहा कबीर के पूरे दर्शन का सार है। किताबें पढ़ते-पढ़ते लोग मर गए लेकिन पंडित कोई नहीं बना। जो प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ लेता है, वही सच्चा पंडित है। यहाँ “ढाई आखर” में एक कोमल और गहरी अभिव्यक्ति है। कबीर की भक्ति में गुरु का विशेष महत्त्व है। वे कहते हैं,
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।”
यहाँ गुरु को गोविंद से भी ऊपर रखा गया है क्योंकि गुरु ने ही गोविंद का बोध कराया। यह भक्तिकाल की एक विशिष्ट परंपरा है जिसमें गुरु ज्ञान और मोक्ष के द्वार हैं।
कबीर का काव्य केवल आत्ममुक्ति की खोज नहीं है, वह लोकमंगल की साधना भी है। लोकमंगल का अर्थ है समाज के सभी लोगों का कल्याण, शोषितों का उद्धार, भेदभाव का अंत और एक ऐसे समाज की स्थापना जहाँ मनुष्य मनुष्य को उसकी जाति, धर्म या पेशे से नहीं बल्कि उसके गुण और चरित्र से जाने। कबीर ने कहा,
“सांई इतना दीजिए, जा में कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाय।”
यह प्रार्थना एक जुलाहे की है जो बहुत थोड़ा माँग रहा है। उसे धन-संपदा नहीं चाहिए, केवल इतना चाहिए कि परिवार का पेट भर सके और कोई साधु द्वार से भूखा न लौटे। इस दोहे में कबीर की सामाजिक न्याय की अवधारणा साफ दिखती है। वे अकेले मोक्ष नहीं चाहते, वे चाहते हैं कि उनके आसपास का समाज भी सुखी हो। कबीर ने अहिंसा और करुणा को भी अपने काव्य में केंद्रीय स्थान दिया। उन्होंने कहा,
“बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल।
जो नर बकरी खात है, तिनका कौन हवाल।”
अर्थात बकरी तो पत्तियां खाती है फिर भी उसकी खाल खींची जाती है तो जो लोग बकरी खाते हैं उनका क्या हाल होगा? यह एक सीधी पर गहरी करुणा है जो जीव-हत्या के विरुद्ध बोलती है।
कबीर की रचनाएं मुख्यतः तीन रूपों में मिलती हैं। साखी, सबद और रमैनी। साखी संस्कृत के “साक्षी” शब्द से बनी है जिसका अर्थ है गवाह या प्रमाण। ये छोटे दोहे जीवन के सत्य के साक्षी हैं। सबद संगीतात्मक पद हैं जो भावनात्मक अनुभूति को व्यक्त करते हैं और रमैनी चौपाई छंद में लिखी रचनाएं हैं। कबीर ग्रंथावली में इन रचनाओं का संकलन है। कबीर के दोहे इतने सटीक और अर्थगर्भित हैं कि वे आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं जितने पाँच सौ साल पहले थे।
“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।”
इस दोहे में सब्र और समय की महत्ता बताई गई है। माली चाहे सौ घड़े पानी सींचे, फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा। यह प्रकृति की एक साधारण सी बात है लेकिन इसमें जीवन की गहरी समझ है। एक और प्रसिद्ध दोहा है,
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
यह आत्मशोधन की बात है। जब हम दूसरों में बुराई खोजते हैं तो बुरा नहीं मिलता लेकिन जब अपने भीतर झाँकते हैं तो पाते हैं कि सबसे अधिक कमियां तो हम में ही हैं। यह आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा कबीर के लोकमंगल का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है।
कबीर का समय भक्तिकाल का स्वर्णयुग था। उनके समकालीन और परवर्ती कवियों में रामानंद, रैदास, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई जैसे महान व्यक्तित्व थे। कबीर रामानंद के शिष्य माने जाते हैं। स्वयं रामानंद ने जाति-भेद को नकारते हुए शिष्य स्वीकार किए थे और कबीर इसी परंपरा के सबसे दीप्तिमान उत्तराधिकारी बने। किंतु कबीर की विशिष्टता यह थी कि वे किसी एक संप्रदाय या मत के प्रतिनिधि नहीं थे।
वे हिंदू-मुस्लिम दोनों परंपराओं से जुड़े थे और दोनों की आलोचना भी करते थे। इसीलिए उनकी मृत्यु के बाद हिंदू और मुसलमान दोनों उनके शरीर पर अधिकार जताने लगे। किंवदंती है कि जब उनका शव उठाया गया तो वहाँ केवल फूल मिले जिन्हें हिंदुओं ने जलाया और मुसलमानों ने दफनाया। यह कहानी चाहे ऐतिहासिक हो या नहीं, यह कबीर के व्यक्तित्व की सच्चाई को बखूबी बयान करती है कि वे किसी एक समुदाय के नहीं थे, वे सबके थे।

