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राजनीति में नैतिकता की जीवित मिसाल थे गुलजारी लाल नंदा

आचार्य ललित मुनि

आज जब राजनीति पर धनबल, बाहुबल, अवसरवाद और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के आरोप लगाए जाते हैं, तब हमें  गुलजारी लाल नंदा जैसा व्यक्तित्व स्मरण हो आता है जिनके जीवन मूल्य सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, सादगी और ईमानदारी केवल आदर्शवादी शब्द नहीं बल्कि व्यवहार में उतारे जा सकने वाले हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि चरित्रवान व्यक्ति बिना किसी प्रचार के भी इतिहास में अमिट स्थान प्राप्त कर सकता है।

गुलजारी लाल नंदा का जन्म चार जुलाई अठारह सौ अट्ठानवे को तत्कालीन पंजाब प्रांत के सियालकोट जिले में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में स्थित है। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। विद्यार्थी जीवन से ही उनमें समाज सुधार और श्रमिक कल्याण के प्रति विशेष रुचि थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने शोध का विषय भी श्रमिकों की स्थिति और औद्योगिक संबंधों को बनाया।

उनके जीवन में निर्णायक परिवर्तन तब आया जब वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। गांधीजी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी और श्रम सम्मान के सिद्धांतों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और अनेक बार जेल भी गए। उनके लिए स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं थी बल्कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना थी जिसमें प्रत्येक नागरिक को सम्मान, न्याय और अवसर प्राप्त हो।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने विशेष रूप से श्रमिक संगठनों के साथ कार्य किया। उनका विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसके श्रमिक सुरक्षित, सम्मानित और संतुष्ट हों। उन्होंने औद्योगिक विवादों के शांतिपूर्ण समाधान, श्रमिक अधिकारों की रक्षा तथा उद्योग और श्रमिक के बीच संतुलित संबंध स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास किए। इस कारण उन्हें भारत में श्रमिक कल्याण के प्रमुख चिंतकों में स्थान प्राप्त हुआ।

स्वतंत्रता के बाद जब देश के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ तब गुलजारी लाल नंदा को अनेक महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए। उन्होंने योजना निर्माण, सिंचाई, विद्युत, श्रम तथा गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों का सफलतापूर्वक संचालन किया। वे योजनाबद्ध विकास के समर्थक थे और मानते थे कि आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना होना चाहिए।

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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में उनका नाम दो विशेष कारणों से सदैव स्मरण किया जाएगा। वे दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। पहली बार सत्ताईस मई उन्नीस सौ चौंसठ को पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद और दूसरी बार ग्यारह जनवरी उन्नीस सौ छियासठ को लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के पश्चात उन्होंने देश की बागडोर संभाली। दोनों ही अवसर अत्यंत संवेदनशील थे। देश शोक, अनिश्चितता और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में उन्होंने अत्यंत संयम, धैर्य और संवैधानिक मर्यादा का परिचय दिया।

यह उल्लेखनीय है कि दो बार देश का सर्वोच्च पद संभालने के बावजूद उन्होंने कभी स्थायी रूप से प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई। जैसे ही संसदीय दल ने अपना नया नेता चुन लिया, उन्होंने बिना किसी विवाद, दबाव या असंतोष के पद छोड़ दिया। आज के राजनीतिक परिवेश में यह घटना असाधारण प्रतीत होती है। यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी कि उनके लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक परंपराएं और संवैधानिक मर्यादाएं थीं।

गुलजारी लाल नंदा का जीवन जितना सार्वजनिक रूप से सम्मानित था, उतना ही निजी जीवन में सादा और अनुशासित भी था। उन्होंने कभी सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग नहीं किया। सत्ता से बाहर आने के बाद उनका जीवन अत्यंत साधारण परिस्थितियों में बीता। अनेक संस्मरणों में उल्लेख मिलता है कि वे साधारण घर में रहते थे, सीमित आवश्यकताओं के साथ जीवन बिताते थे और निजी संपत्ति के रूप में उनके पास लगभग कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपने लिए धन संग्रह करने या प्रभाव का उपयोग करने का कभी प्रयास नहीं किया।

राजनीति में ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि व्यक्ति सत्ता से हटने के बाद भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। गुलजारी लाल नंदा इस कसौटी पर पूर्णतः खरे उतरते हैं। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में जो कुछ प्राप्त किया, वह अपने चरित्र, परिश्रम और निष्ठा के बल पर प्राप्त किया। उन्होंने कभी अपने पद का उपयोग निजी लाभ के लिए नहीं किया। यही कारण है कि उनके विरोधी भी उनकी सत्यनिष्ठा पर प्रश्न नहीं उठा सके।

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गुलजारी लाल नंदा की कार्यशैली में संवाद और सहमति का विशेष महत्व था। वे किसी भी समस्या का समाधान टकराव में नहीं बल्कि बातचीत में खोजते थे। श्रमिक आंदोलन के क्षेत्र में उनके अनुभव ने उन्हें यह सिखाया था कि स्थायी समाधान वही होता है जिसमें सभी पक्षों का सम्मान बना रहे। यही दृष्टिकोण उन्होंने प्रशासन और राजनीति में भी अपनाया।

उनका मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र नागरिकों के विश्वास पर आधारित व्यवस्था है। यदि जनता का विश्वास टूट जाए तो लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमजोर हो जाती हैं। इसलिए उन्होंने सदैव सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण पर बल दिया।

आज जब सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, स्वार्थ और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर व्यापक चर्चा होती है तब गुलजारी लाल नंदा का जीवन हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। उन्होंने दिखाया कि राजनीति में सफलता का वास्तविक मापदंड पदों की संख्या नहीं बल्कि समाज का विश्वास होता है। जिस व्यक्ति को जनता उसके चरित्र के कारण याद रखे वही सच्चा जननेता कहलाने का अधिकारी है।

गुलजारी लाल नंदा ने कभी अपने व्यक्तित्व का प्रचार नहीं किया। वे भाषणों से अधिक अपने कार्यों पर विश्वास करते थे। यही कारण है कि नई पीढ़ी के अनेक लोग उनके योगदान से पर्याप्त परिचित नहीं हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के सबसे कठिन संक्रमण काल में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि उस समय नेतृत्व में धैर्य और संवैधानिक निष्ठा का अभाव होता तो देश राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर सकता था।

उनका जीवन हमें यह भी सिखाता है कि नैतिकता और प्रशासनिक दक्षता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि आदर्शवादी व्यक्ति व्यावहारिक राजनीति नहीं कर सकता। गुलजारी लाल नंदा ने इस भ्रम को अपने जीवन से गलत सिद्ध किया। उन्होंने सिद्ध किया कि ईमानदारी के साथ भी प्रभावी प्रशासन चलाया जा सकता है और कठिन परिस्थितियों में भी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन किया जा सकता है।

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उन्हें उन्नीस सौ सत्तानवे में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था बल्कि उन मूल्यों का सम्मान था जिन पर भारतीय लोकतंत्र की नींव रखी गई है। सत्य, सेवा, सादगी और नैतिकता जैसे आदर्श उनके जीवन के माध्यम से पुनः प्रतिष्ठित हुए।

पंद्रह जनवरी उन्नीस सौ अट्ठानवे को उनका निधन हुआ, किंतु उनके आदर्श आज भी जीवित हैं। उनका जीवन किसी स्मारक या प्रतिमा में सीमित नहीं है। वह प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और नैतिकता को महत्व देता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल गुलजारी लाल नंदा की जयंती मनाकर औपचारिक श्रद्धांजलि न दें बल्कि उनके जीवन मूल्यों को समझने और अपनाने का प्रयास करें। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों में उनके जीवन पर चर्चा होनी चाहिए। नई पीढ़ी को यह बताया जाना चाहिए कि लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं बल्कि उत्तरदायित्व और चरित्र से भी मजबूत होता है।

भारतीय राजनीति को आज ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो सत्ता को अधिकार नहीं बल्कि सेवा का अवसर समझे। गुलजारी लाल नंदा इसी परंपरा के प्रतिनिधि थे। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ी पूंजी धन, पद या लोकप्रियता नहीं बल्कि निष्कलंक चरित्र होता है। उनका जीवन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नैतिक मानदंड है, जो आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।

जब भी भारतीय राजनीति में नैतिकता, सादगी, संवैधानिक मर्यादा और निस्वार्थ सेवा की चर्चा होगी, तब गुलजारी लाल नंदा का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। वे केवल दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि वे उस राजनीतिक संस्कृति के प्रतिनिधि थे जिसमें सत्ता से अधिक मूल्य, पद से अधिक सिद्धांत और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अधिक राष्ट्रहित को महत्व दिया जाता था। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है और यही उन्हें भारतीय राजनीति की नैतिक चेतना का अमर प्रतीक बनाती है।