futuredखबर राज्यों से

कार्य का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन मूल तत्व नहीं : डॉ. मोहन भागवत

संघ की शाखा व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला, स्वयंसेवक निर्माण जीवनभर चलने वाली साधना

नागपुर, 3 जुलाई 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि समय के साथ किसी भी संगठन के कार्य का स्वरूप बदल सकता है, उसका विस्तार हो सकता है और समाज में उसकी प्रतिष्ठा तथा स्वीकार्यता बढ़ सकती है, लेकिन उसके मूल विचार और तत्व नहीं बदलने चाहिए। संगठन की बढ़ती प्रतिष्ठा और समाज से मिलने वाला सम्मान आत्मसंतुष्टि का कारण नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए।

नागपुर के लक्ष्मीनगर स्थित साइंटिफिक सोसायटी सभागार में आयोजित ‘डॉ. हेडगेवार : आधुनिक युग के शालिवाहन’ यूट्यूब वीडियो के सार्वजनिक प्रसारण समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि स्वयंसेवक बनना कोई अल्पकालीन प्रक्रिया नहीं है। यह जीवनभर निरंतर चलने वाली साधना है, जिसमें व्यक्ति को केवल अपने अहंकार का ही नहीं, बल्कि अपने स्वभाव तक का समर्पण करना पड़ता है। समर्पण के बाद व्यक्ति के भीतर यह अहंकार भी नहीं आना चाहिए कि ‘मैंने समर्पण किया है।’

इस अवसर पर मिलिंद रहाटगांवकर की दृकश्रव्य श्रृंखला ‘असु आम्ही सुखाने, पत्थर पायातील’ के 101वें भाग का लोकार्पण भी सरसंघचालक ने किया। कार्यक्रम में आयोजन समिति के अध्यक्ष राजेश अवचट, सचिव श्रीराम पिंपळीकर सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

डॉ. भागवत ने कहा कि किसी भी संस्था के कार्य का विस्तार होने पर समाज में उसके प्रति विश्वास, सम्मान और प्रेम बढ़ता है। संघर्ष और उपेक्षा का दौर धीरे धीरे समाप्त होने लगता है। संसाधन उपलब्ध होने लगते हैं और कार्य की प्रशंसा भी होने लगती है। ऐसे समय में संगठन के कार्यकर्ताओं के सामने अपने मूल तत्वों और ध्येय के प्रति निष्ठा बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती होती है।

यह भी पढ़ें  राजनीति में नैतिकता की जीवित मिसाल थे गुलजारी लाल नंदा

उन्होंने कहा कि यह आत्मसंतुष्ट होकर बैठ जाने का समय नहीं होता, बल्कि निरंतर आत्ममंथन करने का अवसर होता है। प्रत्येक कार्यकर्ता को यह विचार करना चाहिए कि उसका समर्पण ध्येय के प्रति पहले की तरह दृढ़ है या नहीं और उसके प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या नहीं।

सरसंघचालक ने कहा कि विचारों और सिद्धांतों को केवल पुस्तकों को पढ़कर नहीं समझा जा सकता। उन्हें जीवन में उतारना आवश्यक है। किसी भी कार्य को सही रूप में समझने के लिए उसकी जड़ों तक जाना पड़ता है। दूसरों से अपेक्षा करने से पहले स्वयं अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य केवल सक्रिय कार्यकर्ता तैयार करना नहीं है, बल्कि ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करना है जो अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में संघ के संस्कारों को जीते हों। व्यक्ति का व्यवहार और आचरण ही उसके विचारों की वास्तविक कसौटी है।

यह भी पढ़ें  यूजरनेम आधारित व्हाट्सएप फीचर : निजता की सुविधा या साइबर अपराध का नया खतरा?

शाखा व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला

डॉ. भागवत ने संघ की शाखा को व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला बताते हुए कहा कि शाखा केवल दैनिक गतिविधियों और कार्यक्रमों का स्थान नहीं है। यहां व्यक्ति के चरित्र, अनुशासन, सामाजिक दायित्व और राष्ट्र के प्रति समर्पण का निर्माण होता है।

उन्होंने कहा कि शाखा से निकलने वाला स्वयंसेवक विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर समाज के लिए कार्य करता है। संघ को केवल पढ़ने या उसके बारे में सुनने की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से अधिक गहराई से समझा जा सकता है।

उन्होंने स्वयंसेवक निर्माण की प्रक्रिया को आजीवन साधना बताते हुए कहा कि यह किसी एक दिन या निर्धारित अवधि में पूरी होने वाली प्रक्रिया नहीं है। स्वयंसेवक को जीवनभर स्वयं को विकसित करते रहना पड़ता है। इसके लिए केवल समय और श्रम का समर्पण पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने स्वभाव और अहंकार तक को ध्येय के अनुरूप ढालना पड़ता है।

आदर्श आचरण से होता है नए स्वयंसेवकों का निर्माण

सरसंघचालक ने कहा कि स्वयंसेवक का पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन आदर्श होना चाहिए। समाज में श्रेष्ठ आचरण प्रस्तुत करते हुए अपने उदाहरण से नए स्वयंसेवकों का निर्माण करना ही वास्तविक सक्रियता है।

उन्होंने बताया कि देश और विदेश से अनेक लोग संघ के कार्य को देखने और समझने के लिए आते हैं। कई लोग यह भी पूछते हैं कि क्या संघ उनके देशों के युवाओं को भी समाज के प्रति समर्पित होकर कार्य करने का प्रशिक्षण दे सकता है। यह जिज्ञासा संघ की व्यक्ति निर्माण पद्धति के प्रति बढ़ते वैश्विक आकर्षण को दर्शाती है।

यह भी पढ़ें  उत्तराखंड की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में मदरसा शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर विचार क्यों आवश्यक है

संघ किसी संगठन का रिमोट कंट्रोल नहीं

डॉ. मोहन भागवत ने संघ को लेकर प्रचलित एक धारणा का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी संगठन या संस्था का ‘रिमोट कंट्रोल’ नहीं चलाता। विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत संगठन अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से लेते हैं और अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करते हैं।

उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण है। संघ ऐसे संस्कारित, अनुशासित और समाज के प्रति समर्पित स्वयंसेवकों का निर्माण करता है, जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी क्षमता और विवेक के अनुसार समाज तथा राष्ट्र के हित में कार्य करते हैं।

सरसंघचालक ने कहा कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और कार्यपद्धति में भी आवश्यक परिवर्तन होते हैं। संगठन के कार्य का विस्तार और स्वरूप भी बदल सकता है, लेकिन ध्येय, विचार और मूल तत्वों के प्रति निष्ठा अपरिवर्तित रहनी चाहिए। यही किसी संगठन की दीर्घकालीन शक्ति और निरंतरता का आधार है।