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क्या जैव विविधता का नाश मानव स्वास्थ्य के लिए बन रहा है सबसे बड़ा खतरा ?

आचार्य ललित मुनि

जब कोई वन काटा जाता है, जब कोई नदी सूखती है, जब किसी प्रजाति का अन्तिम प्राणी धरती से विदा लेता है, तो उस क्षण केवल एक पेड़, एक जलधारा या एक जीव नहीं जाता बल्कि जाती है एक औषधि जो शायद किसी असाध्य रोग का उपचार थी, जाती है एक जड़ जो संजीवनी बनकर आई थी, जाती है एक कड़ी जो इस विशाल सृष्टि के संजाल को थामे हुए थी। जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य का सम्बन्ध इसी तरह का है, गहरा, अदृश्य और अटूट।

यह सम्बन्ध आज का नहीं है, जन्म जन्मातंर का है। हमारे वैदिक ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व इसे पहचाना था और अपने मन्त्रों, श्लोकों तथा कथाओं में इसे इस प्रकार बुना था कि वह जन जन के आचरण में समा जाए। वे जानते थे कि जो वन उजड़ेगा वह रोग को आमन्त्रण देगा, जो नदी मैली होगी वह मृत्यु को निमन्त्रण देगी, और जो धरती अपनी विविधता खोएगी वह मनुष्य के अस्तित्व को ही संकट में डाल देगी।

जैव विविधता का अर्थ और वैदिक दृष्टि

आधुनिक विज्ञान जैव विविधता को पृथ्वी पर उपस्थित जीवों, प्रजातियों और पारितन्त्रों की विविधता के रूप में परिभाषित करता है। परन्तु वैदिक दर्शन ने इसे कभी किसी परिभाषा में नहीं बाँधा, उसने इसे एक जीवन्त सत्य के रूप में स्वीकार किया। ऋग्वेद में सृष्टि के वर्णन में यह भाव स्पष्ट है कि इस जगत की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक वनस्पति किसी न किसी प्रयोजन से बनाई गई है।

यो रुक्मिणीं वसुधानीं वस्वीं सुमङ्गलां च। विश्वायुं च विश्वकर्माणं च तां धीमहि।
अर्थात जो पृथ्वी रत्नों से भरी है, धन देने वाली है, कल्याणकारी है और जिसमें समस्त जीव निवास करते हैं, उसका हम ध्यान करते हैं। ~ अथर्ववेद, 12.1.6

यहाँ ‘विश्वायु’ शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। विश्वायु का अर्थ है वह जिसमें समस्त जीव साँस लेते हैं, जीते हैं। यह पृथ्वी की जैव विविधता का ही एक काव्यात्मक वर्णन है। ऋषि यह कह रहे हैं कि पृथ्वी की शक्ति उसकी विविधता में है, उसके भिन्न-भिन्न जीवों में है।

वनस्पतियाँ: औषधि और जीवन

वैदिक आयुर्वेद का आधार ही जैव विविधता है। अथर्ववेद का औषधि सूक्त उन वनस्पतियों की स्तुति है जो रोगों को दूर करती हैं। इस सूक्त में ऋषि विभिन्न वनस्पतियों से प्रार्थना करते हैं कि वे रोगी को स्वास्थ्य प्रदान करें। यह सूक्त इस बात का प्रमाण है कि वैदिक समाज में वनस्पतियों की विविधता को स्वास्थ्य का आधार माना जाता था।

ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि।
अर्थात औषधीय वनस्पतियाँ देवराज सोम के साथ मिलकर बात करती हैं और कहती हैं कि जिस रोगी के लिए ब्राह्मण हमसे प्रार्थना करता है उसे हम रोगमुक्त करेंगे। ~ ऋग्वेद, 10.97.22

ऋग्वेद के वनस्पति सूक्त में तीन सौ से अधिक प्रकार की औषधियों का उल्लेख है। यह आँकड़ा बताता है कि उस समय का समाज जैव विविधता के प्रति कितना जागरूक था। हर पौधे का, हर जड़ी बूटी का, हर वृक्ष की छाल का एक चिकित्सीय प्रयोजन था। जब हम वनों को काटते हैं तो हम वास्तव में एक विशाल प्राकृतिक औषधालय को नष्ट कर रहे हैं जिसे हमारे पूर्वजों ने बड़े यत्न से पहचाना और संरक्षित किया था।

याश्च देवा बिभर्थ यूयं याश्च संचरन्ति पृथिव्यामनुस्तरित। अमीवचातना भूत यूयं माँ पात सर्वतः।
अर्थात हे वनस्पतियो, जिन्हें देवगण धारण करते हैं और जो पृथ्वी पर विचरण करती हैं, तुम रोगों को दूर करो और मेरी सब ओर से रक्षा करो। ~ अथर्ववेद, 8.7.4

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आज भी अपनी एक बड़ी संख्या में औषधियाँ वनस्पतियों से ही प्राप्त करता है। मलेरिया की दवा कुनैन एक पेड़ की छाल से बनती है, कैंसर उपचार में उपयोगी टैक्सोल एक वृक्ष से निकाला जाता है, और हृदय रोग की अनेक औषधियाँ विभिन्न जड़ी बूटियों के यौगिकों पर आधारित हैं। जब हम किसी प्रजाति को विलुप्त होने देते हैं तो हम वह अवसर खो देते हैं जो उस प्रजाति में छुपा हुआ था।

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जल की शुद्धता और जैव विविधता का सम्बन्ध

वैदिक परम्परा में नदियों, तालाबों और झरनों को जीवित देवियाँ माना गया है। परन्तु इस आस्था के पीछे एक गहरी वैज्ञानिक समझ भी है। नदी का जल तब शुद्ध रहता है जब उसके किनारों पर वृक्ष हों, जब उसके भीतर विभिन्न प्रकार के जलीय जीव हों, जब उसके आसपास का पारितन्त्र सन्तुलित हो। जैव विविधता ही जल को शुद्ध रखती है।

इमं मे गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्री स्तोमं सचता परुष्ण्या। असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमया।
अर्थात हे गंगा, यमुना, सरस्वती, सतलुज, रावी और अन्य नदियो, मेरी यह स्तुति स्वीकार करो। ~ ऋग्वेद, 10.75.5

इस मन्त्र में जो नदियों की गणना है वह केवल भक्ति का प्रदर्शन नहीं है। यह उस भौगोलिक और जैविक जाल की स्वीकृति है जो इन नदियों और उनके आसपास के पारितन्त्रों से बना था। प्रत्येक नदी की अपनी जैव विविधता थी, अपने विशेष जीव जन्तु और वनस्पतियाँ थीं जो उसके जल को शुद्ध रखती थीं। जब यह जैव विविधता नष्ट होती है तो नदियाँ प्रदूषित होती हैं और प्रदूषित जल मानव स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होता है।

स्कन्द पुराण और जलाशय संरक्षण

स्कन्द पुराण में नदियों और तालाबों के किनारे वृक्षारोपण का विस्तृत विधान मिलता है। वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति जलाशयों के किनारे वटवृक्ष, पीपल, नीम और आम के वृक्ष लगाता है वह पुण्य का भागी होता है। यह धार्मिक नियम वास्तव में एक पारिस्थितिकी नीति थी क्योंकि ये वृक्ष जलाशयों के जल को शुद्ध रखते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और जलीय जीवों को आश्रय देते हैं।

पशु पक्षी और मानव स्वास्थ्य की शृंखला

वैदिक समाज में पशुओं और पक्षियों को केवल भोज्य या उपयोगी प्राणी नहीं माना जाता था। उन्हें सृष्टि की उस व्यवस्था का अंग माना जाता था जो मनुष्य के जीवन को सम्भव बनाती है। पशुपति शिव का रूप इसी भावना का प्रतीक है कि सभी जीव जन्तु उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितना मनुष्य।

पशवः मनुष्याणां मित्रम्। तेषां रक्षणं धर्मः।
अर्थात पशु मनुष्य के मित्र हैं। उनकी रक्षा करना धर्म है। ~ विष्णु पुराण, 3.8.15

यह कथन आज के सन्दर्भ में और भी अर्थपूर्ण हो जाता है जब हम जानते हैं कि 70 प्रतिशत से अधिक उभरती संक्रामक बीमारियाँ जानवरों से मनुष्यों में आती हैं। जब हम जंगलों को काटते हैं और वन्य जीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बेदखल करते हैं तो हम उन्हें मानव बस्तियों के निकट आने पर विवश करते हैं। यही वह क्षण होता है जब नए रोगाणु मनुष्यों तक पहुँचते हैं। जैव विविधता का संरक्षण इस अर्थ में भी मानव स्वास्थ्य की रक्षा है।

गरुड़ पुराण और प्राणी जगत

गरुड़ पुराण में पशु पक्षियों के संहार को महापाप बताया गया है। वहाँ कहा गया है कि जो व्यक्ति बिना कारण प्राणियों की हत्या करता है वह अनेक जन्मों तक रोग और पीड़ा भोगता है। यह धार्मिक अभिशाप वास्तव में एक जैविक सत्य था जिसे हमारे ऋषियों ने धर्म की भाषा में कह दिया था। जो समाज अपनी जैव विविधता नष्ट करता है वह वास्तव में अपने ही स्वास्थ्य को नष्ट करता है।

मिट्टी की जैव विविधता और पोषण

वैदिक कृषि परम्परा में भूमि को केवल उपज देने वाली नहीं बल्कि एक जीवित माँ माना गया है। भूमि की उर्वरता उसकी जैव विविधता पर निर्भर है। मिट्टी में उपस्थित लाखों सूक्ष्म जीव, कृमि, कवक और बैक्टीरिया मिलकर उसे उपजाऊ बनाते हैं। जब हम रासायनिक खेती करते हैं और इस सूक्ष्म जैव विविधता को नष्ट करते हैं तो मिट्टी की शक्ति घटती है, अनाज का पोषण मूल्य घटता है और परिणामस्वरूप मानव स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

उर्वरा पृथिवी माता पुत्रोऽस्मि पृथिव्याः। पर्जन्यः पिता स मा वृष्ट्या सम्बभूव।
अर्थात: उर्वर पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। पर्जन्य मेघ मेरे पिता हैं जिन्होंने वर्षा से मुझे जन्म दिया। ~ अथर्ववेद, 12.1.12

‘उर्वरा’ अर्थात उपजाऊ। ऋषि ने जानबूझकर इस विशेषण का प्रयोग किया। वे कह रहे हैं कि वह पृथ्वी माता है जो उर्वर है, जो जीवन से भरी है। मृत, बंजर, विविधताशून्य भूमि उनके लिए माता नहीं थी। भूमि की उर्वरता ही उसकी मातृत्व शक्ति है और वह उर्वरता जैव विविधता से आती है।

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अग्नि पुराण में भूमि संरक्षण

अग्नि पुराण में राजनीति के सन्दर्भ में यह स्पष्ट निर्देश है कि राजा अपने राज्य की भूमि की उर्वरता को बनाए रखे। वहाँ कहा गया है कि जिस राज्य की भूमि बंजर हो जाए, जहाँ के जंगल उजड़ जाएँ, जहाँ की नदियाँ सूख जाएँ, वहाँ के नागरिकों का स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों समाप्त हो जाती है। यह एक स्पष्ट नीतिगत वक्तव्य है जो जैव विविधता को राजधर्म का विषय बनाता है।

महामारी, रोग और प्राकृतिक असन्तुलन

भागवत पुराण में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथन है जिसमें यह बताया गया है कि महामारियाँ और असाध्य रोग तब आते हैं जब मनुष्य प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करता है। यह केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं है। आधुनिक विज्ञान ने सिद्ध किया है कि जैव विविधता का ह्रास और महामारियों का उद्भव सीधे सम्बन्धित हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
अर्थात जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ।~ भगवद्गीता, 4.7

यहाँ ‘धर्म की हानि’ को केवल नैतिक पतन तक सीमित नहीं समझना चाहिए। प्रकृति के नियमों का उल्लंघन भी धर्म की हानि है। जब पृथ्वी का पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ता है तो प्रकृति स्वयं इसे ठीक करने का प्रयास करती है और यह प्रयास अनेक बार महामारी के रूप में सामने आता है। कोरोना काल ने इसी सत्य को हमें पुनः स्मरण कराया।

अथर्ववेद में ज्वर अर्थात बुखार के सन्दर्भ में एक महत्त्वपूर्ण मन्त्र है जिसमें वन देवता से प्रार्थना की गई है कि वे रोगों को दूर भगाएँ। यह वर्णन इस सत्य को इंगित करता है कि वन की जैव विविधता रोगों से रक्षा करती है और वनों के उजड़ने से रोगों का प्रकोप बढ़ता है।

नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः।
अर्थात उन सभी सर्पों को नमस्कार जो पृथ्वी पर हैं, जो अन्तरिक्ष में हैं, जो आकाश में हैं, उन सभी को नमस्कार।~ अथर्ववेद, 11.10.1

सर्पों को नमस्कार करने की यह परम्परा जैव विविधता के प्रति उस आदर का प्रतीक है जो वैदिक समाज में था। सर्प पारितन्त्र में चूहों और अन्य कृन्तकों की संख्या को नियन्त्रित करते हैं जो फसलें नष्ट करते हैं और रोग फैलाते हैं। जब सर्पों की जनसंख्या घटती है तो कृन्तकों की संख्या बढ़ती है और उनसे फैलने वाले रोग भी बढ़ते हैं। प्राचीन ऋषियों ने इस श्रृंखला को समझकर ही सर्पों को देवता का दर्जा दिया था।

जड़ी बूटियाँ और रोग प्रतिरोधक क्षमता

आयुर्वेद जो वेदों का उपवेद है, पूरी तरह से जैव विविधता पर आधारित है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में सैकड़ों ऐसी वनस्पतियों का वर्णन है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं। अश्वगन्धा, तुलसी, गिलोय, नीम, हल्दी ये सब उन असंख्य वनस्पतियों के कुछ उदाहरण हैं जिन्हें हमारे पूर्वजों ने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रयोग किया।

अश्वत्थमेकं पिचुमर्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजातीः। द्वे द्वे तथा दाडिमरम्यजम्ब्वौ ग्रामे नरः पञ्च च रोपयेत्।
अर्थात एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस फूलदार वृक्ष, दो अनार और दो जामुन, गाँव में प्रत्येक व्यक्ति को ये वृक्ष लगाने चाहिए। ~ विष्णु धर्मोत्तर पुराण

यह श्लोक वृक्षारोपण की एक व्यावहारिक नीति प्रस्तुत करता है। ध्यान दीजिए कि इसमें केवल सुन्दरता के लिए नहीं बल्कि औषधीय और पोषण सम्बन्धी महत्त्व के वृक्ष लगाने का निर्देश है। नीम जीवाणुनाशक है, पीपल प्राण वायु देता है, बरगद छाया और आर्द्रता बनाए रखता है, अनार और जामुन पोषण देते हैं। यह जैव विविधता की एक सुनियोजित योजना थी।

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पारितन्त्र सेवाएँ और मानव कल्याण

भारतीय दर्शन में यह विचार सदा से था कि प्रकृति मनुष्य को नि:शुल्क सेवाएँ देती है। स्वच्छ हवा, शुद्ध जल, उपजाऊ मिट्टी, नियमित वर्षा ये सब प्रकृति की देन हैं और ये सब जैव विविधता पर निर्भर हैं। आधुनिक अर्थशास्त्र इन्हें Ecosystem Services कहता है परन्तु हमारे पूर्वजों ने इन्हें ईश्वर का प्रसाद कहा।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
अर्थात सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का भला हो, कोई भी दुःख का भागी न हो। ~ बृहदारण्यक उपनिषद

इस मन्त्र में ‘सर्वे’ अर्थात सभी का आशय केवल मनुष्यों से नहीं है। वैदिक परम्परा में सभी जीवों का कल्याण कामना की जाती थी। जब सभी जीव स्वस्थ और समृद्ध होंगे तो मनुष्य भी स्वस्थ होगा। यह समझ आज की Ecological Health की अवधारणा से बिल्कुल मेल खाती है जो कहती है कि मानव स्वास्थ्य पारितन्त्र के स्वास्थ्य पर निर्भर है।

मार्कण्डेय पुराण और ऋतु परिवर्तन

मार्कण्डेय पुराण में यह वर्णन है कि जब पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ता है और प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ता है तो ऋतुएँ अनियमित हो जाती हैं। असमय वर्षा, असमय सूखा, अत्यधिक गर्मी और अनियमित ठण्ड मनुष्य के स्वास्थ्य को नष्ट करती हैं। यह वर्णन आज के जलवायु परिवर्तन और उससे उत्पन्न स्वास्थ्य संकटों की एक सटीक भविष्यवाणी जैसा प्रतीत होता है।

जैव विविधता की रक्षा: एक नैतिक दायित्व

वैदिक दर्शन में यह स्पष्ट है कि मनुष्य को प्रकृति से जितना लेना हो उतना ही लो, उससे अधिक नहीं। ईशावास्य उपनिषद का वह मन्त्र जो कहता है ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ अर्थात त्याग भावना से भोगो, यही जैव विविधता संरक्षण का मूल मन्त्र है।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
अर्थात इस जगत में जो कुछ भी है वह सब ईश्वर से व्याप्त है। त्याग भावना से उपभोग करो, लालच मत करो, यह किसी का धन नहीं है। ~ ईशावास्य उपनिषद, मन्त्र 1

यह मन्त्र जैव विविधता के प्रति एक नैतिक दायित्व का बोध कराता है। प्रकृति की यह सम्पदा किसी एक पीढ़ी की नहीं है। यह उन सभी पीढ़ियों की धरोहर है जो आने वाली हैं। जब हम किसी प्रजाति को विलुप्त होने देते हैं तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और जीवन से खिलवाड़ कर रहे होते हैं।

अंतत: जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य का सम्बन्ध एक सूत्र नहीं, एक पूरा जाल है। जिस प्रकार मकड़ी के जाले में एक धागा टूटने से पूरा जाल कमजोर पड़ जाता है उसी प्रकार प्रकृति के जाल में एक प्रजाति के विलुप्त होने से पूरा पारितन्त्र अस्थिर होने लगता है। हमारे वैदिक ऋषियों ने इस सत्य को पहचाना था और इसीलिए उन्होंने प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक नदी, प्रत्येक पशु पक्षी और प्रत्येक कीट को पवित्र घोषित किया ताकि समाज उन्हें व्यर्थ में नष्ट न करे।

आज जब विश्व की एक तिहाई से अधिक प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं, जब वनों का विनाश हो रहा है, जब नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, तब वेदों और पुराणों की यह शिक्षा केवल धार्मिक नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन जाती है। जो समाज अपनी जैव विविधता खो देता है वह अन्ततः अपना स्वास्थ्य भी खो देता है।

वैदिक परम्परा का यह सन्देश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्रों वर्ष पहले था। पृथ्वी हमारी माता है, उसके प्रत्येक जीव हमारे बन्धु हैं और उनकी रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा धर्म भी है और सबसे बड़ी चिकित्सा भी।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः”
सभी जीव सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों