परमा एकादशी अधिक मास की सर्वश्रेष्ठ एकादशी,

भारतीय कालगणना की परंपरा केवल समय मापने की व्यवस्था नहीं, बल्कि खगोलीय गणना और आध्यात्मिक साधना का अद्भुत समन्वय है। इसी परंपरा में एक विशेष मास का उल्लेख मिलता है, जो सामान्य वर्षों में नहीं आता, बल्कि सूर्य और चंद्रमा की गतियों के संतुलन हेतु लगभग प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार प्रकट होता है। यह है अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।
परमा एकादशी अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ती है। इसके समकक्ष अधिक मास की कृष्ण पक्ष एकादशी को ‘पद्मिनी एकादशी’ कहते हैं। इन दोनों एकादशियों का महात्म्य भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णित है और कहा गया है कि इन दोनों के व्रत से जो पुण्य मिलता है, वह अश्वमेध यज्ञ, वाजपेय यज्ञ और समस्त तीर्थस्नानों के पुण्य से भी अधिक है।
चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच जो अंतर होता है, वह प्रतिवर्ष लगभग ११ दिनों का होता है। तीन वर्षों में यह अंतर लगभग एक पूरे मास के बराबर हो जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं। इस मास का कोई अधिपति देवता नहीं था, इसलिए यह निर्धन और उपेक्षित था।
त्यक्तो देवैश्च सर्वैश्च शरणं याहि केशवम्।।
पुराण के अनुसार जब इस मास ने भगवान विष्णु से शरण माँगी, तो भगवान ने कहा: “तुम आज से ‘पुरुषोत्तम मास’ कहलाओगे। जो इस मास में मेरी भक्ति करेगा, व्रत रखेगा, दान देगा और एकादशी का पालन करेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।” इस प्रकार जो मास निंदित था, वह सर्वश्रेष्ठ बन गया। इसी मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की एकादशी ‘परमा एकादशी’ के नाम से जानी जाती है।
भविष्योत्तर पुराण में परमा एकादशी की कथा युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में प्रस्तुत की गई है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि अधिक मास की शुक्ल एकादशी का क्या विशेष महत्व है और इसका व्रत कैसे करना चाहिए। तब श्रीकृष्ण एक दिव्य कथा सुनाते हैं।
कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कंपिल्य नगर में एक ब्राह्मण था जिसका नाम सुमेधा था। वह अत्यंत दरिद्र था और उसकी पत्नी पवित्रा थी। दारिद्र्य के कारण वे अनेक कठिनाइयों से गुजरते थे। एक बार महर्षि कौंडिन्य उनके घर पधारे। पवित्रा ने उनकी यथाशक्ति सेवा की। महर्षि ने प्रसन्न होकर कहा कि अधिक मास की शुक्ल एकादशी का व्रत करो जिसे परमा एकादशी कहते हैं। इस व्रत से दरिद्रता, पाप और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है।
अधिमासे शुक्लपक्षे सर्वपापप्रणाशिनी।।
यस्यां जागरणं कृत्वा विष्णुं संपूज्य भक्तितः।
स याति परमां मुक्तिं सर्वभोगसमन्वितः।।
सुमेधा और पवित्रा ने महर्षि कौंडिन्य के बताए अनुसार परमा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने निर्जला उपवास रखा, रात्रि जागरण किया और भगवान विष्णु की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से उनकी दरिद्रता दूर हुई, घर में सुख-समृद्धि आई और जीवन के अंत में वे वैकुंठ को प्राप्त हुए।
एकादशी का शाब्दिक अर्थ है ‘ग्यारहवीं’। ग्यारह इंद्रियाँ होती हैं पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और एक मन। एकादशी व्रत का आध्यात्मिक संदेश यह है कि इन ग्यारहों इंद्रियों को विषय-भोगों से हटाकर परमात्मा की ओर मोड़ो। इसीलिए एकादशी को ‘हरिवासर’ अर्थात ‘हरि का दिन’ भी कहते हैं।
सर्वव्रतेषु सर्वेषु सर्वयज्ञेषु चैव हि।।
एकादशी परं तत्त्वं वेदाः शास्त्राणि साक्षिणः।। पद्म पुराण, उत्तर खण्ड
अधिक मास में दो एकादशियाँ आती हैं। कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘पद्मिनी एकादशी’ और शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘परमा एकादशी’ कहते हैं। ये दोनों सामान्य मासों की एकादशियों से अलग हैं क्योंकि इनका कोई विशेष देवता या पौराणिक प्रसंग नहीं है, बल्कि इनका सम्पूर्ण माहात्म्य पुरुषोत्तम भगवान विष्णु की विशेष कृपा पर आधारित है।
परमा एकादशी सहित सभी एकादशी व्रतों में तुलसी का विशेष स्थान है। तुलसी को ‘विष्णुप्रिया’ कहा जाता है और बिना तुलसी दल के विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है। एकादशी को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए एक दिन पहले ही तुलसी दल संग्रह कर लिए जाते हैं।
नमस्ते नारदनुते नारायणमनःप्रिये।। स्कंद पुराण, तुलसी माहात्म्य
उपवास को आधुनिक विज्ञान ने भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना है। आयुर्वेद के आचार्य चरक ने चरक संहिता में लंघन को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा बताया है। चंद्रमा का मानव शरीर के जल तत्व पर सीधा प्रभाव पड़ता है और एकादशी के दिन उपवास रखने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है।
देहाग्नेः दीपनं कर्म लंघनस्य च तत् स्मृतम्।। चरक संहिता, सूत्रस्थान
ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि एकादशी के दिन चंद्रमा एक विशेष स्थिति में होता है जिसका मानव मन पर प्रभाव पड़ता है। मन चंद्रमा का प्रतीक है और जब चंद्रमा की विशेष स्थिति होती है, तब मन को ईश्वर की ओर मोड़ना अधिक सहज हो जाता है। इसीलिए एकादशी के दिन ध्यान, भजन और साधना का विशेष फल मिलता है।

