futuredसमाज

क्यों जरूरी है बच्चों के लिए पर्यावरण शिक्षा?

आचार्य ललित मुनि

जब कोई बच्चा धरती पर पग धरते चलने लगता है तो पगतल की माटी के सम्पर्क में आता है, उसकी सोंधी सुगंध से परिचित होता है, उसकी आँखें पहली बार किसी रंग बिरंरगी तितली को देखती हैं तो उसका पीछा करता है, नंगे पैर घास पर चलता है तब वह अनजाने में प्रकृति के साथ एक गहरा रिश्ता बना रहा होता है। यह रिश्ता ही पर्यावरण शिक्षा की असली नींव है। आज जब दुनिया जलवायु संकट, जैव विविधता की हानि और प्रदूषण की मार झेल रही है, तब यह सवाल और भी अहम हो जाता है कि क्या हम अपने बच्चों को वह समझ दे पा रहे हैं जो उन्हें और आने वाली पीढ़ियों को जरूरत है?

बचपन में जो सीख, सदैव स्मृतियों में

मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इंसान के मूल्य और आदतें बचपन में ही बनती हैं। शिक्षा शास्त्रियों ने पाया है कि बच्चा जो कुछ अपने अनुभव से सीखता है वह उसके व्यवहार में स्थायी रूप से बस जाता है। इसीलिए अगर एक बच्चे को स्कूल में पेड़ लगाने का आनंद मिलता है, नदियों की सफाई में भाग लेने का मौका मिलता है, या पक्षियों की आवाज़ों को पहचानना सिखाया जाता है, तो वह बड़े होकर एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनता है। पर्यावरण शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं है, यह जीवन जीने का एक तरीका है। “बच्चे भविष्य के उपभोक्ता नहीं, भविष्य के संरक्षक हैं। उन्हें धरती का मालिक नहीं, बल्कि उन्हे संरक्षक बनाना होगा।”

विज्ञान और लोक परम्परा का सेतु

पर्यावरण चेतना केवल विज्ञान का विषय नहीं है, यह विज्ञान एवं लोक परम्पराओं के बीच सेतु है। यह विज्ञान, नैतिकता, सामाजिक समझ और भावनात्मक जुड़ाव और लोक परम्पराओं का अनूठा संगम है। जब एक बच्चा यह जानता है कि एक पेड़ अपने जीवनकाल में लगभग एक टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, तो यह जानकारी उसे पेड़ काटने से रोकने वाली शक्ति बन जाती है। जब वह यह समझता है कि प्लास्टिक की एक थैली सैकड़ों साल तक मिट्टी में रहती है, तो वह स्वेच्छा से कपड़े का थैला उठाने लगता है। यह बदलाव किसी कानून से नहीं, बल्कि समझ से आता है। और लोक परम्पराओं के द्वारा यही समझ देना पर्यावरण चेतना जागृत करने का सबसे बड़ा काम है।

यह भी पढ़ें  कुत्ता पकड़ता रहा, सफर चलता रहा

भारत की परंपरा में पर्यावरण के प्रति सम्मान सदा से रहा है। चिपको आंदोलन हो या बिश्नोई समुदाय का पेड़ों के लिए जान देना, हमारे समाज में प्रकृति के साथ सहजीवन की गहरी जड़ें हैं। लेकिन शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के साथ यह संवेदनशीलता धीरे धीरे कमजोर पड़ रही है। बच्चे कंक्रीट के जंगलों में पले बढ़ रहे हैं, जहाँ मिट्टी से खेलना दुर्लभ हो गया है। ऐसे में स्कूलों और परिवारों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे बच्चों को प्रकृति से फिर से जोड़ें।

पर्यावरणीय चेतना में वृद्धि

पर्यावरण चेतना बच्चों में केवल प्रकृति प्रेम नहीं जगाती, बल्कि उनकी सोच को भी धार देती है। जब एक बच्चा यह समझता है कि उसके शहर में बाढ़ क्यों आती है, या यह जानता है कि वायु प्रदूषण उसके फेफड़ों को किस तरह नुकसान पहुँचाता है, तो वह प्रश्न करना और जवाब माँगना सीखता है, समाधान खोजने की कोशिश करता है। हमारी प्राचीन पर्यावरणीय चेतना बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरुक बनाती है।

घर, स्कूल और समाज की साझी जिम्मेदारी

वैसे भी हमारे परिवार में ही बच्चे पर्यावरण के संरक्षण के प्रति उत्तरदायित्व को सीखते हैं। पाठ्यपुस्तकों के अध्याय किसी बच्चे के मन में उतनी गहरी छाप नहीं छोड़ते जितनी घर के आँगन में लगाया गया एक पौधा छोड़ता है। इसलिए परिवार, स्कूल और समुदाय को मिलकर यह जिम्मेदारी उठानी होगी। प्रकृति के संपर्क में रहने वाले बच्चों में तनाव कम होता है, एकाग्रता बेहतर होती है और रचनात्मकता अधिक होती है। यानी पर्यावरण शिक्षा न केवल धरती के लिए, बल्कि बच्चे के अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है। जब बच्चा जंगल में चलता है, पक्षियों की आवाज़ सुनता है, तारों को देखता है, तो वह एक ऐसी शांति पाता है जो किसी स्क्रीन पर नहीं मिल सकती।

यह भी पढ़ें  रक्तरंजित थियानमेन और खूनी वामपंथी इतिहास

पर्यावरण शिक्षा किसी एक विषय तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसे गणित में, विज्ञान में, हिंदी की कविताओं में, सामाजिक विज्ञान में, यहाँ तक कि खेल के मैदान में भी बुनना होगा। एक पूरी पीढ़ी को यह एहसास दिलाना होगा कि वे इस धरती के मेहमान नहीं, बल्कि उसके रखवाले हैं। जब यह भाव एक बच्चे के दिल में उतर जाता है, तो वह बड़े होकर किसी कारखाने से निकलने वाले धुएँ को चुपचाप नहीं सहेगा। वह नदी में कचरा फेंकने वालों को टोकेगा। वह अपनी सरकार से जवाब माँगेगा।

महानगरों के बच्चों को लोक परम्पराओं का ज्ञान।

इसके साथ ही नगरों एवं महानगरों के बच्चों को माटी की सुंगध, कोयल की कूल, गौरैया का धूलि स्नान, तितलियों की उड़ान आदि से परिचित करना होगा। इसके लिए आस पास के गांव या वनों  का भ्रमण कराना चाहिए, लोक संस्कृति से परिचित करना चाहिए। हमारे सभी सनातनी तीज त्योहार प्रकृति से जुड़े हुए हैं। उन्हें संलग्न करें और प्रकृति से परिचित कराएं, जो कि बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होगा

यह भी पढ़ें  प्रकृति संरक्षण की प्राचीन पाठशाला है हमारा कुटुम्ब

आज की दुनिया में पर्यावरण शिक्षा एक विकल्प नहीं, एक अनिवार्यता है। यह केवल विज्ञान का पाठ नहीं, यह जीवन दर्शन है। यह केवल परीक्षा की तैयारी नहीं, यह अस्तित्व की तैयारी है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे एक हरी भरी, साँस लेने योग्य और जीवंत दुनिया में जिएँ, तो उन्हें आज ही सिखाना होगा कि इस दुनिया को कैसे बचाया जाता है। क्योंकि जो बीज आज हम उनके मन में बोएँगे, वही कल की छाँव बनेगा।

 

आचार्य ललित मुनि

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।