संघ में आइये देखिए समझिए, केवल दर्शक मत बने रहिए : डॉ. मोहन भागवत
नागपुर, 4 जून 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-द्वितीय के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है और विश्व की परिस्थितियाँ संकेत दे रही हैं कि आने वाला समय भारत का है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे केवल दर्शक बनकर न रहें, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाएँ। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य केवल संगठन खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐसा समाज तैयार करना है जो स्वयं जागृत, संगठित और राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध से परिपूर्ण हो।
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान चल रहे विभिन्न कार्यक्रमों और संपर्क अभियानों में समाज के विविध वर्गों से जो प्रतिक्रिया प्राप्त हो रही है, वह अत्यंत उत्साहवर्धक है। समाज के भीतर राष्ट्रहित में कार्य करने की इच्छा बढ़ रही है और यह भारत के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियाँ अपने आप अनुकूल नहीं बनतीं, बल्कि उन्हें अनुकूल बनाने के लिए सतत प्रयास और तैयारी की आवश्यकता होती है। जो लोग भविष्य को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं, वही परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ पाते हैं।
उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया अनेक संकटों से घिरी हुई है। कहीं युद्ध और संघर्ष हैं, कहीं आर्थिक असमानता है, कहीं पर्यावरणीय संकट है तो कहीं सामाजिक विघटन। विश्व के अनेक देश विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। भारत की विशेषता यह है कि यहाँ जीवन को समग्रता में देखने की परंपरा रही है। यहाँ व्यक्ति, समाज, प्रकृति और सृष्टि को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया, बल्कि उनके बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
सरसंघचालक ने कहा कि दुनिया विकास की बात तो करती है, लेकिन विकास के साथ मानवता, नैतिकता और प्रकृति के संरक्षण को कैसे जोड़ा जाए, इसका उत्तर उसके पास नहीं है। भारत की संस्कृति और दर्शन इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करते हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “विश्व बंधुत्व” केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन के मूल तत्व हैं। यही कारण है कि आज विश्व को भारत की आवश्यकता है।
डॉ. भागवत ने कहा कि भारत के पास ज्ञान, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा का विशाल भंडार था, फिर भी देश ने लगभग एक हजार वर्षों की पराधीनता झेली। इसका कारण बाहरी शक्तियों की श्रेष्ठता नहीं थी, बल्कि हमारी अपनी कमजोरियाँ थीं। जिन्होंने भारत को गुलाम बनाया, वे संख्या, संस्कृति या सामर्थ्य में हमसे श्रेष्ठ नहीं थे। समस्या यह थी कि हम अपनी कुछ मूल शक्तियों और सामाजिक एकता को संभालकर नहीं रख सके। हमने अपने संगठन, स्वभाव और सामूहिक चेतना को कमजोर होने दिया। आज आवश्यकता है कि हम उन शक्तियों को पुनः जागृत करें।
उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज भारत के प्रति दायित्वशील समाज है। यदि यह समाज संगठित और जागृत रहेगा तो भारत का भविष्य सुरक्षित रहेगा। संघ की कार्यपद्धति इसी उद्देश्य से विकसित की गई है कि समाज की विविधताओं को स्वीकार करते हुए उसे एक सूत्र में जोड़ा जा सके। भाषा, क्षेत्र, जाति, पंथ और जीवनशैली की विभिन्नताओं के बावजूद राष्ट्रीय एकता का भाव मजबूत होना चाहिए।
डॉ. भागवत ने कहा कि भारत शक्ति सम्पन्न अवश्य बने, लेकिन उसकी शक्ति का उद्देश्य किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं होना चाहिए। आज विश्व में कई शक्तिशाली राष्ट्र अपने सामर्थ्य का उपयोग दूसरे देशों पर दबाव बनाने, संसाधनों पर कब्जा करने या अपने हितों को थोपने के लिए करते हैं। भारत का मार्ग इससे भिन्न है। भारत ऐसा राष्ट्र बने जो अपनी शक्ति का उपयोग विश्व कल्याण और सहयोग के लिए करे। भारत के बारे में यह विश्वास बने कि वह मजबूत होने पर भी सबको साथ लेकर चलने वाला देश है।
उन्होंने कहा कि संघ ऐसा वातावरण बनाना चाहता है जिसमें राष्ट्र प्रथम की भावना से प्रेरित कार्यकर्ताओं का एक विशाल समूह खड़ा हो। ऐसे कार्यकर्ता जो स्वार्थ और भेदभाव से ऊपर उठकर समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण को जीवन का ध्येय बनाएं। संघ का उद्देश्य केवल शाखाओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे चरित्रवान नागरिक तैयार करना है जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बन सकें।
समारोह में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि संघ के बारे में किसी भी प्रकार की धारणा बनाने से पहले उसे निकट से समझना चाहिए। उन्होंने समाज के लोगों से आग्रह किया कि वे संघ की शाखाओं में आएँ, स्वयं देखें, समझें और अनुभव करें। यदि कोई व्यक्ति शाखा में नहीं आ सकता तो वह समाज और राष्ट्रहित के किसी भी कार्य में स्वयंसेवकों के साथ सहयोग कर सकता है। राष्ट्र निर्माण का कार्य किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
अपने संबोधन के अंतिम चरण में डॉ. भागवत ने स्वामी विवेकानंद के उस स्वप्न का उल्लेख किया जिसमें उन्होंने भारत को विश्व में सर्वोच्च सम्मान और गौरव के साथ प्रतिष्ठित होते देखा था। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि समाज संगठित होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करे तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विश्व मंच पर पहले से अधिक ऊँचे स्थान पर स्थापित होगा और मानवता को नई दिशा प्रदान करेगा।
समारोह के प्रमुख अतिथि पद्मभूषण कुमार मंगलम बिड़ला ने कहा कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का व्यापक अभियान है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे भारत में निर्माण करें, भारत के लिए निर्माण करें और भारत में रहकर पूरी दुनिया के लिए उत्पाद एवं सेवाएँ विकसित करें।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकसित भारत का संकल्प देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा। वर्तमान समय भारत के लिए ऐतिहासिक अवसरों का कालखंड है और प्रत्येक भारतीय को इसका लाभ उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
बिड़ला ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेवा गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि 83 हजार से अधिक शाखाएँ, 60 लाख स्वयंसेवक और लाखों सेवा कार्य समाज जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं और राष्ट्रीय चुनौतियों के समय संघ सदैव समाज के साथ खड़ा रहा है।
उन्होंने कहा कि आदित्य बिड़ला समूह और संघ की अनेक गतिविधियों में समानता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास और सामाजिक उत्थान जैसे क्षेत्रों में दोनों संस्थाएँ राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से कार्य कर रही हैं।
कुमार मंगलम बिड़ला ने कहा कि भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और आने वाले वर्षों में और अधिक ऊँचाइयों को प्राप्त करेगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विकसित भारत के निर्माण में उद्योग, समाज और संगठनों की संयुक्त भूमिका निर्णायक सिद्ध होगी।

