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भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई रामायणों में सीता जी

आचार्य ललित मुनि

रामकथा के विशाल संसार में यदि कोई एक चरित्र है जो सबसे अधिक व्याख्याओं का केंद्र रहा है, तो वह हैं सीता जी। भारत से लेकर इंडोनेशिया तक, थाईलैंड से लेकर म्यांमार तक, रामकथा जहाँ भी पहुँची, वहाँ सीता जी का स्वरूप उस भूमि की मिट्टी, संस्कृति और स्त्री-चेतना के अनुसार ढलता गया। वाल्मीकि की सीता जी और रामचरितमानस की सीता जी में जो अंतर है, वही अंतर भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई परंपराओं के बीच भी दिखता है। यह अंतर मानवीय चेतना की विविधता का प्रमाण है।

वाल्मीकि रामायण में सीता जी एक ऐसी स्त्री हैं जो भावनाओं से परिपूर्ण, बुद्धिमान और स्वयं के अधिकारों के प्रति सजग हैं। जब भगवान राम वनगमन का निर्णय लेते हैं और सीता जी को अयोध्या में रहने का आग्रह करते हैं, तब सीता जी का उत्तर केवल भक्ति का नहीं, तर्क और आत्मसम्मान का भी है। वे कहती हैं कि पति का घर ही स्त्री का वास्तविक घर है, लेकिन इस कथन के पीछे निर्भरता नहीं, एक स्वतंत्र चुनाव है। अरण्यकांड में जब रावण छद्मवेश में आता है, तब सीता जी उसे पहचान नहीं पातीं किंतु जैसे ही उनका संदेह गहरा होता है, वे सतर्क हो जाती हैं।

“न तत्र देवा गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः।
न च किन्नरनागाश्च शक्ता रामं प्रधर्षितुम्॥”
वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 47

लंका में अशोक वाटिका में जो सीता जी हैं, वे टूटी हुई नहीं हैं। वे रावण के प्रलोभनों को ठुकराती हैं, अपने आत्मबल से अपनी रक्षा करती हैं और हनुमान जी के आने पर भी तुरंत विश्वास नहीं करतीं। यह बुद्धि और विवेक उन्हें केवल आदर्श पत्नी से कहीं आगे ले जाता है। वाल्मीकि की सीता जी में एक ऐसी स्त्री की झलक मिलती है जो परिस्थितियों से दबती नहीं, उनसे संवाद करती है। “सीता जी वाल्मीकि रामायण में न केवल श्री राम की पत्नी हैं, बल्कि एक स्वतंत्र नैतिक सत्ता हैं जो अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं लेती हैं।”

गोस्वामी तुलसीदास की सीता जी अपेक्षाकृत अधिक दिव्य, अधिक शांत और अधिक भक्तिमयी हैं। तुलसीदास ने जो भक्तिकालीन वातावरण था, उसमें सीता का चरित्र उस काल की स्त्री-आदर्श की परिकल्पना के अनुरूप गढ़ा गया। बालकांड में सीता जी का स्वयंवर और श्री राम से प्रथम दृष्टि-मिलन बड़ी कोमलता से चित्रित है।

“जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥”
रामचरितमानस, बालकाण्ड, मंगलाचरण

तुलसी की सीता जी में आत्मसमर्पण है, किंतु यह आत्मसमर्पण किसी दुर्बलता से नहीं उपजा। उन्होंने सीता जी को जगज्जननी के रूप में प्रतिष्ठित किया है जो मानवता की माता हैं। अरण्यकांड में जब लक्ष्मण रेखा का प्रसंग आता है, तब तुलसीदास की सीता जी उस रेखा को लाँघती हैं किंतु इसके पीछे उनकी करुणा है, स्वच्छंदता नहीं।

“सीय राम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥”रामचरितमानस, बालकाण्ड

तुलसीदास की सीता जी सुंदरकांड और लंकाकांड में अधिक मुखर नहीं हैं, किंतु उनकी उपस्थिति ही कथा की धुरी है। उनके बिना रामकथा का कोई अर्थ नहीं। रामचरितमानस में सीता जी का स्वरूप उस भक्ति परंपरा का प्रतीक है जो ईश्वर से पूर्ण समर्पण माँगती है, और सीता जी इस समर्पण की सर्वोच्च प्रतिमा हैं।

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तमिल कवि कम्बन की इरामावतारम् में सीता माता का चरित्र वाल्मीकि रामायण से भिन्न और अत्यंत समृद्ध है। कम्बन की सीता जी में एक गहरी मनोवैज्ञानिक सुक्ष्मता है। वे अधिक भावप्रवण, अधिक वाचाल और अपनी पीड़ा को अधिक स्पष्टता से व्यक्त करने वाली हैं। अशोक वाटिका में जब वे राम के आगमन की प्रतीक्षा करती हैं, तो उनकी विरह-वेदना कम्बन की कलम से एक महाकाव्यात्मक गहराई पाती है। दक्षिण भारत की भक्ति परंपरा में सीता जी केवल आदर्श पत्नी नहीं, बल्कि शक्ति का एक रूप भी हैं।

तेलुगु रामायण परंपरा में भी सीता जी का चरित्र विशेष है। रंगनाथ रामायण में सीता जी अधिक सक्रिय भूमिका में हैं। वे अपने संकट में स्वयं निर्णय लेती हैं और अपनी पीड़ा को व्यक्त करने में संकोच नहीं करतीं। यह दक्षिणी परंपरा की विशेषता है कि उसने सीता जी को ईश्वरीय शक्ति के साथ मानवीय भावनाओं से भी जोड़े रखा।

थाईलैंड में रामकथा का नाम रामकियेन है और यहाँ सीता जी को नांग सीदा कहा जाता है। थाई परंपरा में सीता जी का स्वरूप भारतीय परंपरा से कुछ भिन्न है। रामकियेन में एक ऐसा प्रसंग है जो वाल्मीकि में नहीं मिलता। जब रावण सीता जी का अपहरण करता है, तो सीता जी अपनी एक छाया, एक प्रतिरूप बनाकर रावण के साथ भेज देती हैं और असली सीता जी अग्नि में सुरक्षित रहती हैं। यह प्रसंग थाई परंपरा में सीता जी की बुद्धिमत्ता और सक्रियता का प्रतीक है।

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रामकियेन में सीता जी का चरित्र थाई बौद्ध और हिंदू संस्कृति के सम्मिश्रण से बना है। वे करुणामयी और धर्मपरायण हैं किंतु साथ ही चतुर और सुरक्षोपाय सोचने में सक्षम भी हैं। थाई कला और नृत्य में, विशेषकर खोन नृत्य नाटिका में, सीता जी का स्वरूप अत्यंत सुंदर, शांत और गरिमामयी चित्रित किया जाता है। थाई राजवंश रामकियेन को अपनी राष्ट्रीय पहचान का अंग मानता है और सीता जी उस पहचान का अभिन्न भाग हैं।

इंडोनेशिया की परंपरा में सीता जी को देवी सिंताह कहा जाता है। जावानी और बालिनी रामायण में सीता जी का चरित्र इस्लाम के आगमन से पूर्व की हिंदू परंपरा और स्थानीय संस्कृति के संयोग से बना है। बाली में आज भी केकक नृत्य में रामायण का मंचन होता है और सिंताह का अपहरण और मुक्ति उसका केंद्रीय विषय है। बालिनी परंपरा में सीता जी सर्वोच्च स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं जिनकी पवित्रता किसी भी आक्रमण से नष्ट नहीं होती।

मलय परंपरा के सेरी रामा में एक अत्यंत रोचक प्रसंग मिलता है। यहाँ सीता जी का जन्म रावण की पुत्री के रूप में बताया गया है किंतु एक भविष्यवाणी के कारण उन्हें त्याग दिया जाता है और जनक उन्हें पालते हैं। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है और यह दिखाता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया की परंपराओं ने रामकथा को किस सर्जनात्मक स्वतंत्रता के साथ अपनाया। इस प्रसंग में एक गहरा प्रतीकवाद भी है: रावण की संतान होते हुए भी सीता  जी की पवित्रता और धर्म पर उनकी आस्था अटूट है। “सीता जी की कथा जहाँ भी पहुँची, वहाँ की स्त्री-आकांक्षाओं और सांस्कृतिक मूल्यों ने उसे नया रूप दिया।”

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म्यांमार में यम ज़तदौ के नाम से रामकथा प्रचलित है और सीता जी को मेई थीडा कहते हैं। यहाँ की परंपरा में सीता जी का स्वरूप बौद्ध आदर्शों से प्रभावित है। म्यांमार की सीता जी में करुणा और अहिंसा के बौद्ध मूल्य केंद्रीय हैं। वे कष्टों को धैर्य से सहती हैं और अपने संकट में भी अहिंसक रहती हैं।

लाओस की फ्रा लक फ्रा राम में सीता जी को नांग सीदा कहा जाता है। लाओ परंपरा में सीता जी का अपहरण एक कोमल और करुण प्रसंग के रूप में चित्रित है। यहाँ भी स्थानीय मान्यताओं और बौद्ध दर्शन का सम्मिश्रण है। लाओस की सीता जी में एक ऐसी दृढ़ता है जो कष्टों के बावजूद उन्हें टूटने नहीं देती।

सीता जी की यह सांस्कृतिक यात्रा यह सिद्ध करती है कि महान साहित्यिक चरित्र किसी एक व्याख्या में बंधे नहीं रहते। वाल्मीकि की सीता जी, तुलसी की सीता जी, कम्बन की सीता जी और रामकियेन की सीता जी, सब अलग हैं और सब अपने संदर्भ में सच्ची हैं। हर परंपरा ने सीता जी को अपने समाज की सर्वोत्तम आकांक्षाओं का प्रतीक बनाया।

“उर्मिला लखन प्रिया बड़भागी। उनको सुमिरि राम-रस पागी॥”रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड

सीता  जी का मूल स्वभाव, चाहे वाल्मीकि रामायण में हो या रामकियेन में, भूमि से जुड़ा है। वे धरती की पुत्री हैं। जनक ने उन्हें हल जोतते समय पाया था। अपने जीवन के अंत में वे उसी धरती में वापस लौटती हैं। यह एक गरिमामयी वापसी है। पृथ्वी अपनी पुत्री को वापस बुला लेती है। यह कथा अपने आप में इतना गहरी है कि दो हजार वर्षों में और दर्जनों संस्कृतियों में भी इसकी अनुगूँज मिटी नहीं।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।