केजरीवाल की राजनीति पर सवाल : सांसदों के दलबदल से मचा सियासी भूचाल

लोगों का ध्यान बंगाल के चुनाव की तरफ़ था और इधर दिल्ली में खे्ला हो गया। राघव चड्डा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने पार्टी छोड़ दी तथा तीन सांसदों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। इन राज्यसभा सांसदों का भारतीय जनता पार्टी की ओर जाना एक ऐसा संकेत है, जिसे केवल दलबदल कहकर टाला नहीं जा सकता। यह घटनाक्रम उस गहरे संकट की ओर इशारा करता है, जहाँ एक समय उम्मीदों का केंद्र बनी पार्टी अब भरोसे के संकट से जूझती नजर आ रही है।
आम आदमी पार्टी के पास आज बस पंजाब की जमीन है। दिल्ली जा चुकी है, गोवा कभी आया ही नहीं, गुजरात में केवल पाँव रखे थे जो उखड़ गए। फरवरी 2027 में पंजाब विधानसभा के चुनाव होने हैं। 24 अप्रैल 2026 की उस राघव चड्डा की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जो राजनीतिक भूकंप आया है, उसके झटके पंजाब में पार्टी की जमीन को हिला रहे हैं। जो सात सांसद आम आदमी पार्टी से अलग होकर भाजपा में गए, उनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह सहनी और स्वाति मालीवाल शामिल हैं। राघव चड्ढा ने कहा कि वे “15 साल अपना खून-पसीना देकर” पार्टी को सींचते रहे, लेकिन आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और मूल्यों से भटक गई है।
राघव चड्ढा को राज्यसभा उपनेता पद से हटाना, उनका बोलने का समय रोका गया तब चड्ढा ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि AAP ने राज्यसभा सचिवालय से उन्हें संसद में बोलने से रोकने को कहा। उन्होंने पूछा था, “क्या जनता के मुद्दे उठाना अपराध है?” जब राघव चड्डा ने खुले मंच पर नेतृत्व पर सवाल उठाया और नेतृत्व ने उत्तर देने की जगह दंड देना चुना। यही निर्णय आज सात सांसदों के जाने का कारण बना।
2022 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब की 117 में से 92 सीटें जीतकर 79 प्रतिशत बहुमत हासिल किया था लेकिन जिस ऊँचाई से जीत मिले, उस ऊँचाई से गिरना भी उतना ही तेज होता है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत जनता का उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह था, जिससे वह वर्षों से असंतुष्ट थी। लोगों ने एक ऐसे विकल्प पर भरोसा किया, जो खुद को ईमानदारी, पारदर्शिता और जनहित की राजनीति का प्रतिनिधि बताता था।
केजरीवाल की राजनीतिक शैली का एक विरोधाभास रहा है कि वे “नई राजनीति” की बात करते हैं, लेकिन पार्टी में सवाल उठाने की जगह नहीं देते। जो नेता सवाल करे, वह “भाजपा का एजेंट” हो जाता है। राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी पाटी के नेताओं और जनता का विश्वास होता है। यदि वही डगमगाने लगे, तो सबसे मजबूत संगठन भी भीतर से खोखला होने लगता है। आम आदमी पार्टी के संदर्भ में यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि इस पार्टी ने खुद को नैतिक राजनीति का प्रतीक और केजरीवाल ने कट्टर ईमानदार बताया था। ऐसे में यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि व्यवहार और वादों में अंतर है, तो प्रतिक्रिया स्वाभाविक है।
संदीप पाठक जैसे संगठन प्रमुख का जाना AAP के पंजाब ढाँचे के लिए सबसे गहरी चोट है। पार्टी का चुनावी तंत्र, बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ता समन्वय आदि सब कुछ संदीप पाठक जैसे संगठनकर्ताओं पर टिका था। यह कदम ऐसे समय में आया है जब आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब से परे अपनी पहुँच बढ़ाने की कोशिश कर रही थी।
आम आदमी पार्टी पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि यह एक व्यक्ति केंद्रित पार्टी बनती जा रही है। शुरुआती दौर में जिन लोगों ने इस पार्टी को खड़ा किया, उनमें से कई प्रमुख चेहरे समय के साथ अलग होते गए। कुछ ने वैचारिक मतभेदों की बात कही, तो कुछ ने निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया। यह सिलसिला केवल एक दो नामों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के बड़े नेता धीरे-धीरे अगल होते गये। जिसका परिणाम दिल्ली के चुनाव में तगड़ी हार रहा है।
दूसरी ओर, पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने पलटवार करते हुए कहा, “पार्टी ने राघव चड्ढा को विधायक और सांसद बनाया, पंजाब की जनता ने उन्हें इतना प्यार दिया। और अब वे भाजपा की गोद में बैठ गए।” उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी और सीबीआई का उपयोग करके ‘ऑपरेशन लोटस’ चलाया जा रहा है। जबकि सच यह है कि यह पार्टी में टूटन एक दिन में नहीं हुई बल्कि कई महीनों से पनप रहे असंतोष का परिणाम है। जब किसी पार्टी में भीतरी लोकतंत्र सिकुड़ता है, जब नेतृत्व एकाधिकार बन जाता है, जब सवाल करना विश्वासघात माना जाने लगता है तब विभाजन की जमीन तैयार होती है।
किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह स्थिति गंभीर होती है। जब पुराने और समर्पित कार्यकर्ता या नेता पार्टी छोड़ते हैं, तो वह केवल संख्या का नुकसान नहीं होता, बल्कि संगठन के मुख्य ढांचे पर भी असर डालता है। नए लोग जुड़ सकते हैं, लेकिन अनुभव और भरोसे का जो ताना बाना होता है, उसे दोबारा खड़ा करना आसान नहीं होता।
अब बात आती है सांसदों के दलबदल की। जब कोई सांसद पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो वह अपने साथ केवल व्यक्तिगत पहचान ही नहीं, बल्कि अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेटवर्क का एक हिस्सा भी लेकर जाता है। इसीलिए ऐसे दलबदल का प्रभाव अक्सर व्यापक होता है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए यह अवसर की तरह है। पंजाब में जहां वह लंबे समय तक सीमित उपस्थिति रखती थी, वहाँ अब वह नए समीकरण बना रही है। आम आदमी पार्टी से आए सांसद उसके लिए न केवल संख्या बढ़ाने वाले हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर पार्टी को बढ़ाने में भी मददगार हो सकते हैं। यह एक रणनीतिक बढ़त है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आम आदमी पार्टी के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आई है। एक तरफ उसे अपने भीतर के असंतोष को संभालना है, दूसरी तरफ विपक्ष के हमलों का सामना करना है। विपक्ष इस घटनाक्रम को इस रूप में पेश कर रहा है कि पार्टी अपने ही नेताओं का भरोसा खो चुकी है। यदि यह धारणा जनता के बीच मजबूत होती है, तो इसका असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।
जहाँ तक पंजाब के आगामी चुनावों का सवाल है, यह कहना उचित होगा कि यह दलबदल एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव जरूर डालेगा। चुनाव केवल नीतियों और घोषणाओं से नहीं जीते जाते, बल्कि माहौल और धारणा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि यह माहौल बनता है कि पार्टी कमजोर हो रही है या उसके भीतर स्थिरता नहीं है, तो मतदाता विकल्पों की ओर देख सकता है।
अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व पर भी इस समय गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या वह संगठन को एकजुट रख पाएंगे, क्या वे असंतोष को दूर कर पाएंगे, और क्या वे जनता का भरोसा फिर से जीत पाएंगे, यह आने वाला समय तय करेगा। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों का भाजपा में जाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि यह केजरीवाल के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या आत्मनिरीक्षण करेंगे या दोष दूसरों पर मढ़ते रहेंगे?

