पर्यावरण चेतना और सामाजिक समरसता का त्योहार: बोहाग बिहू

असम की उपजाऊ घाटियों में जब बोहाग असमी नववर्ष का महीना आता है तो पूरी प्रकृति एक नई जीवन लहर से भर जाती है। हवा में कोपो फूल की महक फैल जाती है नदियां अपनी लय में बहने लगती हैं और खेतों में नई आशा जागृत होती है। बोहाग बिहू जिसे रोंगाली बिहू भी कहा जाता है असम का सबसे जीवंत और रंगीन त्योहार है। यह केवल नया साल या वसंत ऋतु का स्वागत नहीं है बल्कि यह पर्यावरण के प्रति गहरी चेतना और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन प्रकृति से अलग नहीं बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है। यहां हर रस्म हर गीत और हर नृत्य प्रकृति की पूजा तथा मानवीय बंधनों को मजबूत करने का माध्यम बन जाता है।
बोहाग बिहू असम के कृषि आधारित समाज की आत्मा है। यह तिब्बतो बर्मी ऑस्ट्रो एशियाटिक और इंडो आर्यन परंपराओं का अनोखा संगम है जो असम की बहु जातीय बहु भाषीय और बहु धार्मिक संस्कृति को एक सूत्र में पिरोता है। त्योहार अप्रैल के मध्य में ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार चौदह अप्रैल को शुरू होता है और सात दिनों तक चलता है। इसे सात बिहू भी कहते हैं सोत, राती, गोरु, मनुह, कुटुम मेला और सेरा। हर चरण कृषि चक्र से गहराई से जुड़ा है बोआई की शुरुआत फसल की आशा और वसंत का उत्सव। यह त्योहार न केवल असम के लोगों को जोड़ता है बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की विविधता को एक मंच पर लाता है। आज के समय में जब पर्यावरण संकट और सामाजिक विभेद बढ़ रहे हैं बोहाग बिहू हमें सिखाता है कि सतत विकास और समानता कैसे संभव है प्रकृति का सम्मान करके और एक दूसरे को अपनाकर।
बोहाग बिहू की जड़ें प्राचीन काल में हैं। यह मूल रूप से जनजातीय मूल का त्योहार है जिसमें तिब्बतो बर्मी और ताई तत्व प्रमुख हैं। असम की प्राचीन जनजातियों देवरी, चुटिया, सोनोवाल, कछारी, बोरो, कछारी आदि ने इसे विकसित किया। बिहू शब्द देवरी भाषा के बिसु से निकला है जिसका अर्थ है अत्यधिक आनंद। यह कृषि चक्र से सीधे जुड़ा है। बोहाग बिहू बोआई के मौसम को चिह्नित करता है जबकि माघ बिहू कटाई का और काती बिहू फसल संरक्षण का।
ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि अहोम राजाओं ने भी इसे अपनाया। राजा रुद्र सिंह ने बिहू नृत्य को संरक्षण दिया। ब्रिटिश काल में भी यह त्योहार असमिया पहचान का प्रतीक बना रहा। लेकिन इसका मूल कृषि पर्यावरणीय है। प्रोफेसर मान बरुआ के शोध द इकोलॉजिकल बेसिस ऑफ द बिहू फेस्टिवल ऑफ असम में स्पष्ट है कि बिहू पर्यावरण और संस्कृति के गतिशील संवाद से जन्मा है। त्योहार की रस्में मौसम मिट्टी पशु और वनस्पतियों के साथ सामंजस्य बिठाती हैं। उदाहरणस्वरूप वसंत में एक सौ एक प्रकार की पत्तेदार सब्जियों का सेवन पारंपरिक आहार का हिस्सा है जो जैव विविधता का सम्मान करता है। डॉक्टर हरिचरण दास की पुस्तक बिहू ऐज इको कल्चर ऑफ असम भी इसे इको कल्चर कहती है जहां हर रस्म प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है।
यह त्योहार सामाजिक समरसता का भी प्राचीन उदाहरण है। असम में तिब्बतो बर्मी इंडो आर्यन ताई अहोम कुकी चिन द्रविड़ चाय बागान मजदूर मुस्लिम और बंगाली समुदाय रहते हैं। बिहू इन सभी को एक मंच देता है। कोई जाति धर्म या वर्ग भेद नहीं सब एक साथ नाचते गाते और खाते हैं। असम सरकार की आधिकारिक जानकारी भी इसे सभी समुदायों की एकता का प्रतीक बताती है।
बोहाग बिहू का पहला दिन गोरु बिहू है पशुओं का त्योहार। पिछले साल के अंतिम दिन मनाया जाने वाला यह दिन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। गाय बैल को नदी किनारे ले जाकर स्नान कराया जाता है। उन पर हल्दी और माह उड़द का लेप लगाया जाता है। कुछ वृक्षों की डंडियों से मक्खियां भगाई जाती हैं। लौ कद्दू और बेंगना बैंगन खिलाए जाते हैं। एक गीत गाया जाता है दिग्लोती दिघल पात माखि मारू जात जात लौ खा बेंगना खा बोसोरे बोसोरे बर्धि जा अर्थात पशु स्वस्थ रहें बढ़ें और परिवार की भलाई करें।
यह रस्म पर्यावरण चेतना का जीवंत उदाहरण है। असम का कृषि समाज पशुओं को फसल का आधार मानता है। गोरु बिहू पशु कल्याण जैविक खेती और मिट्टी की उपजाऊता का संदेश देता है। पशुओं को नई रस्सियां बांधी जाती हैं रैंच पर धुआं दिया जाता है यह सब प्राकृतिक सामग्री से होता है कोई रासायनिक नहीं। खेल जैसे एक सौ एक सब्जियां इकट्ठा करना बांस की जड़ें रोपना बेटल पत्तियों को बांधना ये सब कृषि चक्र और जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। मान बरुआ के अनुसार ये रस्में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखती हैं क्योंकि वे मानव को प्रकृति का संरक्षक बनाती हैं उपभोक्ता नहीं।
आज के युग में जब ग्लोबल वार्मिंग और पशु शोषण बढ़ रहा है गोरु बिहू हमें सिखाता है कि पशु हमारा परिवार हैं। वे मिट्टी को उर्वर बनाते हैं खेती को सहारा देते हैं। यह त्योहार जैविक कृषि और पर्यावरण संरक्षण का प्राचीन मॉडल प्रस्तुत करता है। गोरु बिहू के दौरान पुरानी रस्सियों को फेंक दिया जाता है और नई बांधी जाती हैं जो पुरानी आदतों को त्यागकर नई शुरुआत का प्रतीक है। पशुओं को स्वतंत्र घूमने दिया जाता है जो प्रकृति के साथ स्वतंत्रता और सम्मान की भावना को दर्शाता है। यह रस्म हमें याद दिलाती है कि कृषि केवल मानव श्रम नहीं बल्कि पशु प्रकृति और मिट्टी का सामूहिक योगदान है।
दूसरा दिन मनुह बिहू मानव का दिन। नए कपड़े पहने जाते हैं हल्दी का स्नान किया जाता है घर की पूजा होती है। बुजुर्गों को गामुसा हस्त बुना स्कार्फ भेंट किया जाता है। गामुसा असमिया संस्कृति का प्रतीक है मित्रता प्रेम सम्मान और आतिथ्य का। यह हाथ से बुना जाता है जिसमें प्रकृति की सामग्री रेशम सूत होती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि मानव शरीर और मन दोनों की शुद्धता आवश्यक है। हल्दी स्नान प्राकृतिक औषधीय गुणों से जुड़ा है जो पर्यावरण से प्राप्त संसाधनों का उपयोग दर्शाता है।
कुटुम बिहू में रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाकर भोजन साझा किया जाता है। यह सामाजिक समरसता का उत्सव है। बिहू गीत गाए जाते हैं जो प्रेम प्रकृति और जीवन की खुशी गाते हैं। यह चरण मानवीय संबंधों का उत्सव है। एक दूसरे को गामुसा देते है या कोई जनजातीय युवा बिहू नृत्य सिखाता है तब समरसता जीवंत हो उठती है। असम की इतिहासकार एस एल बरुआ की पुस्तक ए कंप्रीहेंसिव हिस्ट्री ऑफ असम में उल्लेख है कि बिहू ने सदियों से सामाजिक एकता को मजबूत किया है।
तीसरा दिन मेला बिहू मेला का दिन। बिहुतली में नृत्य गान प्रतियोगिताएं होती हैं। बिहू नृत्य बिहू नास असम का प्राण है। युवा पारंपरिक पोशाक में मेखेला चादर धोती धोल पेपा ताल गोगोना के साथ नाचते हैं। नृत्य की मुद्राएं प्रकृति से प्रेरित हैं पक्षी की उड़ान फूलों का खिलना नदी का बहना। गीतों में वसंत प्रेम और फसल की बात होती है। महिलाओं का जेंग बिहू और पुरुषों का मुकोली बिहू सब मिलकर एक वृत्त बनाते हैं जो समरसता का प्रतीक है। बिहू मेला पूरे असम से लोग लाता है टाइ आहोम मिसिंग बोरो कार्बी डिमासा राभा आदि। यहां विभिन्न भाषाएं वेशभूषाएं एक साथ नाचती हैं।
भोजन पिट्ठा लारू चिरा दोई सब चावल आधारित स्थानीय। यह पर्यावरण अनुकूल है क्योंकि लोकल संसाधनों पर निर्भर। बिहू नृत्य की लय ढोल की थाप और गोगोना की ध्वनि युवा ऊर्जा को प्रकृति की लय से जोड़ती है। नृत्य में हाथ पैर की मुद्राएं फसल बोने की मुद्रा या पक्षियों की उड़ान की नकल करती हैं जो पर्यावरण से सीधा संबंध दर्शाती हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि प्रकृति के साथ मानव के सामंजस्य का अभ्यास है।
बोहाग बिहू के दौरान एक विशेष परंपरा है एक सौ एक प्रकार की साग सब्जियों का भोजन। यह परंपरा जैव विविधता का सम्मान करती है। स्थानीय जंगलों खेतों और बगीचों से विभिन्न पत्तेदार साग इकट्ठा किए जाते हैं जो मौसमी और पौष्टिक होते हैं। यह रस्म हमें सिखाती है कि विविधता ही जीवन की कुंजी है। जब हम एक सौ एक साग खाते हैं तो हम प्रकृति की समृद्धि को स्वीकार करते हैं और उसके संरक्षण का संकल्प लेते हैं। आज के औद्योगिक कृषि युग में जहां मोनो कल्चर फसलें पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं यह परंपरा जैविक और विविध कृषि का महत्व बताती है।
सामाजिक समरसता के संदर्भ में बोहाग बिहू असम की विविधता को एकता में बदलने का माध्यम है। असम में रहने वाली विभिन्न जनजातियां जैसे मिसिंग, बोरो, कार्बी आदि अपनी अपनी विशिष्ट परंपराओं के साथ बिहू मनाती हैं लेकिन मुख्य धारा में वे एक दूसरे से जुड़ जाती हैं। बिहू मेलों में सभी समुदायों के कलाकार एक साथ प्रस्तुति देते हैं। यह दृश्य सामाजिक सद्भाव का जीवंत चित्रण है। जब कोई अहोम युवक बोरो नृत्य सीखता है या कोई बंगाली परिवार असमिया पिट्ठा बनाता है तो विभेद स्वतः मिट जाते हैं।
आधुनिक समय में बोहाग बिहू पर्यावरण जागरूकता का माध्यम भी बन गया है। कई संगठन बिहू उत्सव के दौरान पेड़ लगाने अभियान चलाते हैं नदी सफाई कार्यक्रम आयोजित करते हैं और प्लास्टिक मुक्त उत्सव का आह्वान करते हैं। बिहू गीतों में अब पर्यावरण संरक्षण के नए छंद जुड़ रहे हैं। युवा पीढ़ी बिहू नृत्य के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर जागरूकता फैला रही है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि सांस्कृतिक परंपराएं पर्यावरण संकट के समाधान का हिस्सा बन सकती हैं।
बोहाग बिहू का भोजन भी पर्यावरण चेतना से जुड़ा है। चावल आधारित पिट्ठा विभिन्न प्रकार के जैसे तिल पिट्ठा, नारियल पिट्ठा और साग पिट्ठा सब स्थानीय सामग्री से बनाए जाते हैं। इनमें कोई पैकेज्ड सामग्री नहीं होती। यह परंपरा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है और कार्बन फुटप्रिंट को कम करती है। परिवार और पड़ोसी मिलकर पिट्ठा बनाते हैं जो सामूहिक श्रम और साझेदारी का प्रतीक है।
सामाजिक स्तर पर बिहू असम की कभी कभी होने वाली अशांति के बीच पुल का काम करता है। विभिन्न समुदायों के युवा एक साथ बिहू नाचते हैं तो विभेद भूल जाते हैं। यह यूनिटी इन डाइवर्सिटी का जीवंत प्रमाण है। गामुसा बांटना एक दूसरे को नया कपड़ा भेंट करना और बुजुर्गों से आशीर्वाद लेना सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है।
बोहाग बिहू की सात दिनों की परंपरा कृषि चक्र को पूरा करती है। गोरु बिहू पशुओं को समर्पित मनुह बिहू मानव को कुटुम बिहू परिवार को और मेला बिहू समुदाय को। अंतिम दिन सेरा बिहू विदाई का दिन है जहां पुरानी चीजों को त्यागकर नई शुरुआत की जाती है। यह चक्र हमें जीवन की निरंतरता सिखाता है जैसे प्रकृति हर साल नया जीवन देती है वैसे ही हमें भी नवीनीकरण करना चाहिए।
आज जब विश्व पर्यावरण दिवस और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर चर्चा होती है बोहाग बिहू एक प्राचीन लेकिन प्रासंगिक मॉडल प्रस्तुत करता है। यह त्योहार सतत विकास लक्ष्यों से जुड़ता है जैसे स्वच्छ पानी स्वस्थ भूमि और समानता। पशु संरक्षण जैव विविधता संरक्षण और सामुदायिक सद्भाव इसके मुख्य स्तंभ हैं। असम के गांवों में आज भी बिहू को पर्यावरण शिक्षा का माध्यम बनाया जा रहा है। स्कूलों में बच्चों को बिहू गीत सिखाए जाते हैं जिनमें प्रकृति से प्रेम की बात होती है।
बिहू नृत्य की ऊर्जा युवाओं को प्रेरित करती है। नृत्य में शामिल होने वाले युवा न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं बल्कि सामूहिकता की भावना भी विकसित करते हैं। लड़के और लड़कियां साथ नाचते हैं जो लैंगिक समानता का भी संदेश देता है। हालांकि पारंपरिक रूप में कुछ सीमाएं हैं लेकिन आधुनिक मेलों में यह और अधिक समावेशी होता जा रहा है।
बोहाग बिहू का सांस्कृतिक प्रभाव असम से बाहर भी फैला है। दिल्ली मुंबई और अन्य शहरों में रहने वाले असमिया लोग बिहू मेला आयोजित करते हैं जहां वे अपनी संस्कृति को जीवित रखते हैं। यह प्रवासी समुदायों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। साथ ही अन्य राज्यों के लोग भी इसमें भाग लेकर असम की संस्कृति को समझते हैं।
पर्यावरण के संदर्भ में बोहाग बिहू हमें सिखाता है कि विकास प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि उसके साथ तालमेल है। खेती के दौरान रासायनिक उर्वरकों के बजाय प्राकृतिक तरीके अपनाने की परंपरा आज भी प्रासंगिक है। गोरु बिहू के दौरान पशुओं को खिलाई जाने वाली सब्जियां जैविक हैं जो मिट्टी की सेहत सुधारती हैं।
सामाजिक समरसता के लिए बिहू एक आदर्श है। असम जैसे विविध राज्य में जहां कभी तनाव होता है बिहू शांति का संदेश देता है। विभिन्न जनजातियों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान बिहू के माध्यम से होता है। यह त्योहार सिखाता है कि विविधता शक्ति है न कि विभेद का कारण।
बोहाग बिहू केवल एक त्योहार नहीं बल्कि जीवन दर्शन है। यह पर्यावरण चेतना और सामाजिक समरसता का अनूठा मेल है। असम की भूमि पर हर साल यह उत्सव दोहराता है कि जीवन चक्र अनंत है जैसे बोआई फसल कटाई। हमें इस मानवीय संदेश को अपने जीवन में उतारना चाहिए एक पेड़ लगाएं पड़ोसी से गामुसा बांटें प्रकृति का सम्मान करें। बोहाग बिहू सिर्फ असम का नहीं पूरे भारत का संदेश है प्रकृति और समरसता से ही सच्चा विकास संभव है।
यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि खुशी व्यक्तिगत नहीं सामूहिक है। जब पूरा गांव या शहर बिहू नाचता है तो हर दिल में एकता की लहर दौड़ती है। पर्यावरण की रक्षा करके हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य बना सकते हैं। सामाजिक समरसता से हम एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। बोहाग बिहू इन दोनों को साथ लेकर चलता है इसलिए यह अमर है और प्रासंगिक है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।
