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पुरुषोत्तमी एकादशी और वैष्णव भक्ति परंपरा

आचार्य ललित मुनि

भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना के विशाल आकाश में पुरुषोत्तमी एकादशी और वैष्णव भक्ति परंपरा एक ऐसे दिव्य प्रकाश पुंज के समान हैं जो सदियों से मानवीय संवेदनाओं और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास को आलोकित करते आए हैं। हिंदू पंचांग की गणना में अधिक मास का अपना एक विशिष्ट वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है और जब यह मास भगवान पुरुषोत्तम अर्थात श्री हरि विष्णु को समर्पित हो जाता है तो इसकी महत्ता कई गुना बढ़ जाती है। पुरुषोत्तमी एकादशी जिसे कमला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है वैष्णव परंपरा में आत्मशुद्धि और समर्पण का वह उच्चतम शिखर है जहाँ भक्त अपने अहंकार का विसर्जन कर परमात्मा के सान्निध्य का अनुभव करता है। वैष्णव भक्ति परंपरा का मूल आधार ही प्रेम और शरणागति है और पुरुषोत्तमी एकादशी इस परंपरा का वह प्राण तत्व है जो मनुष्य को भौतिक जगत की नश्वरता से निकालकर शाश्वत सत्य की ओर ले जाता है।

वैष्णव भक्ति परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। आलवार संतों से लेकर चैतन्य महाप्रभु वल्लभाचार्य और रामानुजाचार्य तक इस परंपरा ने समाज को ऊंच नीच और जाति पाति के बंधनों से मुक्त कर केवल भक्ति के सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। इस परंपरा में भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप की आराधना का विशेष महत्व है। पुरुषोत्तम शब्द का अर्थ है पुरुषों में उत्तम अर्थात वह जो अपनी मर्यादा और गुणों में सर्वश्रेष्ठ है। अधिक मास को समाज में कभी कभी उपेक्षित माना जाता था लेकिन भगवान विष्णु ने इस मास को अपना नाम देकर इसे सभी मासों में श्रेष्ठ बना दिया। यही वह मानवीय पक्ष है जहाँ ईश्वर अपने भक्तों और उपेक्षितों को गले लगाता है। पुरुषोत्तमी एकादशी इसी दिव्य प्रेम की स्वीकृति का पर्व है।

तथ्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय काल गणना सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित है। सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच के अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त मास की व्यवस्था की गई है जिसे अधिक मास या मलमास कहा जाता है। वैष्णव परंपरा में इस समय को केवल व्रत और उपवास तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि इसे एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पुरुषोत्तमी एकादशी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं हैं बल्कि वे मनुष्य के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी हैं। एकादशी का व्रत इंद्रियों पर नियंत्रण और मन की एकाग्रता का प्रतीक है। जब मनुष्य अन्न का त्याग कर केवल सात्विक विचारों का सेवन करता है तो उसके भीतर की नकारात्मक ऊर्जा का क्षय होता है और करुणा का संचार होता है।

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मानवीय गद्य शैली में यदि हम भक्ति के इस प्रवाह को देखें तो वैष्णव परंपरा ने हमेशा हृदय की कोमलता पर बल दिया है। मीराबाई का कृष्ण प्रेम हो या नरसी मेहता का भजन जिसमें वे कहते हैं कि वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे यह इस परंपरा का सबसे सुंदर मानवीय चेहरा है। पुरुषोत्तमी एकादशी के अवसर पर दान पुण्य और परोपकार की जो परंपरा है वह इसी पीड़ा को समझने का एक माध्यम है। भूखे को भोजन कराना और असहाय की सहायता करना ही वास्तविक पुरुषोत्तम की सेवा है। इस दिन भक्त केवल अपने कल्याण की कामना नहीं करता बल्कि वह समस्त चराचर जगत की शांति के लिए प्रार्थना करता है। वैष्णव संतों ने सिखाया है कि भगवान मंदिर की मूर्तियों में ही नहीं बल्कि हर जीव के भीतर निवास करते हैं।

पुरुषोत्तमी एकादशी के संदर्भ में पौराणिक कथाओं का भी अपना एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से दरिद्रता का नाश होता है और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। यहाँ दरिद्रता केवल धन का अभाव नहीं है बल्कि विचारों की संकीर्णता और हृदय की शून्यता भी है। जब कोई व्यक्ति पुरुषोत्तमी एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा के साथ रखता है तो उसके भीतर संतोष का जन्म होता है। संतोष ही वह धन है जो मनुष्य को वास्तविक रूप से धनी बनाता है। वैष्णव परंपरा में भक्ति को नौ प्रकारों में बांटा गया है जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। पुरुषोत्तमी एकादशी के दिन श्रवण कीर्तन और स्मरण जैसी विधाओं के माध्यम से भक्त परमात्मा से सीधा संवाद स्थापित करता है।

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इस एकादशी का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष इसकी समावेशी प्रकृति है। वैष्णव भक्ति ने कभी भी ज्ञान को केवल पंडितों तक सीमित नहीं रखा बल्कि इसे जन सामान्य की भाषा में प्रवाहित किया। कबीर और रैदास जैसे संतों ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सरल जीवन और शुद्ध आचरण पर बल दिया। पुरुषोत्तमी एकादशी के दिन गांवों और नगरों में जो कीर्तन की गूंज सुनाई देती है वह सामूहिक चेतना को जगाने का कार्य करती है। संगीत और नृत्य के माध्यम से ईश्वर की आराधना करना वैष्णव परंपरा की एक विशिष्ट शैली है जो मनुष्य को तनाव मुक्त कर आनंद की अनुभूति कराती है। यह आनंद क्षणिक नहीं होता बल्कि यह आत्मा के गहरे तलों को स्पर्श करता है।

आधुनिक संदर्भों में यदि हम पुरुषोत्तमी एकादशी और वैष्णव मूल्यों की बात करें तो आज के संघर्षपूर्ण जीवन में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज मनुष्य अपने अस्तित्व की खोज में भटक रहा है और मानसिक शांति के लिए छटपटा रहा है। ऐसे में एकादशी जैसे व्रत हमें ठहराव और चिंतन का अवसर प्रदान करते हैं। यह केवल उपवास नहीं है बल्कि यह खुद से मिलने की एक यात्रा है। वैष्णव परंपरा हमें सिखाती है कि हम ईश्वर के अंश हैं और हमारा स्वभाव प्रेम करना है न कि द्वेष करना। पुरुषोत्तमी एकादशी पर भगवान विष्णु के शांत और अभय स्वरूप का ध्यान हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रहना सिखाता है।

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अधिक मास की इस पावन एकादशी का महत्व पद्म पुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। इन ग्रंथों के अनुसार पुरुषोत्तमी एकादशी का फल हजारों यज्ञों के समान बताया गया है। लेकिन यदि हम इसके मर्म को समझें तो यह फल केवल कर्मकांड से नहीं बल्कि शुद्ध भाव से प्राप्त होता है। भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है कि जो मुझे प्रेम से पत्र पुष्प या जल अर्पित करता है मैं उसे स्वीकार करता हूँ। वैष्णव भक्ति का यही सरलीकरण इसे जन जन का प्रिय बनाता है। पुरुषोत्तमी एकादशी पर तुलसी पूजन और दीपदान की जो परंपरा है वह प्रकृति के प्रति हमारे सम्मान और अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की हमारी शाश्वत यात्रा को दर्शाती है।

निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि पुरुषोत्तमी एकादशी और वैष्णव भक्ति परंपरा भारतीय संस्कृति के वे स्तंभ हैं जो हमें मानवता और आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाते हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि जीवन केवल उपभोग के लिए नहीं बल्कि त्याग और सेवा के लिए है। पुरुषोत्तम मास की यह एकादशी हमें अपने भीतर के उत्तम पुरुष को जगाने का संदेश देती है। जब हम दूसरों के प्रति दयालु होते हैं और अपने आचरण में शुचिता लाते हैं तभी हम सच्चे अर्थों में पुरुषोत्तम की शरण में होते हैं। यह पावन पर्व हमें याद दिलाता है कि भक्ति कोई बाहरी आडंबर नहीं बल्कि हृदय का वह गुप्त मंदिर है जहाँ केवल प्रेम की भाषा बोली जाती है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है और भविष्य में भी मानवीय चेतना को शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाती रहेगी। वैष्णव धर्म की व्यापकता और पुरुषोत्तमी एकादशी की गहराई मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करती हैं जहाँ श्रद्धा और विज्ञान एक दूसरे के पूरक बनकर मनुष्य के सर्वांगीण उत्थान में सहायक होते हैं।