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लोक संस्कृति में वर्षा ऋतु का उत्सव चौमासा

आचार्य ललित मुनि

आषाढ़ के आते ही गांवों और कस्बों की दिनचर्या बदलने लगती है। किसान की निगाह आसमान पर टिकने लगती है, पेड़ पौधों पर हरियाली लौट आती है और गांव का जीवन खेती के नए चक्र में प्रवेश करता है। वर्षा के साथ शुरू होने वाली लगभग चार महीनों की इस अवधि को लोकजीवन में चौमासा कहा जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक फैला चौमासा भारतीय जीवन में खेती किसानी, व्रत पर्व, लोकगीत, कथा कहानियों और सामाजिक मेलजोल का अपना अलग संसार रचता है।

पुराणों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी अथवा हरिशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं, जिसे देवोत्थानी अथवा प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इसी बीच के अंतराल को चातुर्मास या चौमासा कहा गया है। पद्म पुराण में बताया गया है कि जो व्यक्ति दीपदान करता है, पलाश के पत्ते पर भोजन ग्रहण करता है और व्रत रखते हुए चौमासा बिताता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय होता है। यह भी कहा गया है कि सावन में साग, भादों में दही, कुंआर में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग करना चाहिए। यह सूची केवल धार्मिक अनुशासन नहीं, बल्कि वर्षा ऋतु में शरीर को स्वस्थ रखने की एक व्यावहारिक समझ भी दर्शाती है।

भगवान विष्णु के इस चार माह के शयन के पीछे वामन अवतार और राजा बलि की कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार असुरराज बलि ने अपनी शक्ति से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। दो पगों में उन्होंने पृथ्वी और आकाश नाप लिए और तीसरे पग के लिए बलि ने स्वयं अपना सिर आगे कर दिया। बलि की इस भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर विष्णु ने उसे पाताल लोक का स्वामी बना दिया, परंतु स्वयं भी उसके द्वार की रक्षा करने का वचन दे बैठे। इससे चिंतित माता लक्ष्मी ने एक निर्धन स्त्री का रूप धरकर बलि को राखी बांधी और बदले में अपने पति को वापस मांग लिया। तब विष्णु ने बलि को वचन दिया कि वे प्रतिवर्ष चार माह के लिए पाताल लोक में रहा करेंगे। यही चार माह चौमासा कहलाए।

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चौमासे का एक अत्यंत प्राचीन और व्यावहारिक पक्ष यह है कि इस काल में साधु संत और भ्रमणशील तपस्वी अपनी यात्राएं रोककर किसी एक स्थान पर रुक जाते थे। इसे वर्षावास कहा जाता है। वर्षा ऋतु में मार्ग कीचड़युक्त हो जाते हैं, नदी नाले उफान पर आ जाते हैं और भूमि पर असंख्य सूक्ष्म जीव जन्म लेते है। ऐसे में निरंतर पैदल भ्रमण करने वाले संन्यासियों के लिए यात्रा जारी रखना न केवल कठिन होता है बल्कि जीव हिंसा की दृष्टि से भी उचित नहीं माना गया। सनातन परम्परा के संतों का चौमासा, बौद्ध भिक्षुओं की वर्षावास परंपरा और जैन मुनियों का चातुर्मास व्रत इसी सोच से जन्मा। वे नगर या गांव में रुककर स्वाध्याय, तप और उपदेश में समय व्यतीत करते हैं। इस प्रकार चौमासा केवल वैष्णव परंपरा तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की बहुधार्मिक सभ्यता का साझा सांस्कृतिक कालखंड है।

महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय की परंपरा में आषाढ़ी एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन लाखों वारकरी भक्त पंढरपुर की ओर पैदल यात्रा करते हुए विठोबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यह यात्रा संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की पालकी के साथ चलती है और मार्ग भर अभंग गाए जाते हैं।

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संस्कृत साहित्य में महाकवि कालिदास ने वर्षा ऋतु का अत्यंत सजीव चित्रण किया है। उनकी रचना ऋतुसंहार में वर्षा ऋतु के आगमन पर बादलों की गर्जना, मयूरों के नृत्य और नदियों के उफान का वर्णन मिलता है। उनकी दूसरी कृति मेघदूत में एक यक्ष अपने विरह में बादल को दूत बनाकर अपनी प्रिया के पास संदेश भेजता है। यह काव्य वर्षा ऋतु को केवल प्रकृति की घटना नहीं बल्कि विरह, स्मरण और प्रतीक्षा के भाव से जोड़ता है। यही भाव आगे चलकर लोक गीतों में कजरी और सावन के गीतों में भी प्रतिध्वनित होता है।

भक्ति काल में भी वर्षा ऋतु का विशेष स्थान रहा है। संत कबीर ने सांसारिक जीवन की नश्वरता और सतर्कता का संदेश देने के लिए अक्सर वर्षा और बादलों के प्रतीकों का प्रयोग किया। मीराबाई के पदों में सावन का उल्लेख उनके कृष्ण प्रेम की व्याकुलता को व्यक्त करता है, जहां वे बादलों की घटा देखकर अपने गिरधर की याद में विह्वल हो उठती हैं। सूरदास के पदों में भी वर्षा ऋतु में गोपियों की कृष्ण विरह वेदना का सुंदर चित्रण मिलता है। यह सारा साहित्य इस बात का प्रमाण है कि चौमासा भारतीय हृदय में केवल मौसम नहीं बल्कि भावनाओं का मौसम भी है।

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भारत के गांवों में सावन के महीने में कजरी गाने की परंपरा आज भी जीवंत है। स्त्रियां समूह में बैठकर या झूला झूलते हुए कजरी गाती हैं, जिसमें वर्षा, विरह, मायके की याद और पति के परदेस से लौटने की प्रतीक्षा जैसे भाव पिरोए होते हैं। इसी मौसम में मल्हार राग का गायन विशेष रूप से किया जाता है, जिसके विषय में लोक मान्यता है कि इसके गायन से वर्षा होती है। सावन में गांव गांव में पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं और हरियाली तीज के अवसर पर स्त्रियां हरे वस्त्र पहनकर, मेहंदी रचाकर झूला झूलती हैं। यह उत्सव सुहाग, प्रकृति और सामूहिक आनंद का सुंदर संगम है।

चौमासे की इसी शृंखला में अनेक पर्व एक के बाद एक आते हैं। नाग पंचमी के दिन सर्पों की पूजा की जाती है, जो कृषक समाज की उस समझ को दर्शाती है कि वर्षा ऋतु में सर्पों का बिलों से बाहर निकलना स्वाभाविक है, इसलिए उनके प्रति भय के स्थान पर सम्मान का भाव रखा जाए। रक्षाबंधन पर भाई बहन के स्नेह का उत्सव मनाया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी, हरियाली तीज, गणेश चतुर्थी और अंततः शरद ऋतु में आने वाली नवरात्रि और दीपावली, ये सभी पर्व चौमासे की इसी कड़ी में गुंथे हुए हैं। ओडिशा में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भी आषाढ़ मास में ही निकलती है, जो लोक परंपरा को इस ऋतु से जोड़ती है। चौमासा केवल मौसम की घटना नहीं है, यह भारतीय जनमानस में धर्म, कृषि, संगीत, साहित्य और सामाजिक जीवन में समाहित एक संपूर्ण सांस्कृतिक अध्याय है।