चढ़ावे की चोरी की आड़ में हिंदू आस्था पर सियासी प्रहार?

अयोध्या का राम मंदिर केवल पाषाण से निर्मित एक भव्य मंदिर नहीं है। करोड़ों हिंदुओं की आस्था, संघर्ष, प्रतीक्षा और बलिदान का प्रतीक है। पांच शताब्दियों तक जिस स्थान के लिए पीढ़ियां संघर्ष करती रहीं, न्यायालयों में मुकदमे चले, आंदोलन हुए और असंख्य लोगों ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण बलिदान इस संघर्ष को दिया इसलिए यह आसान नहीं है कि मंदिर के चढ़ावे में चोरी या अनियमितता का कोई भी आरोप सामान्य घटना मानकर छोड़ा जा सके।
अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी की जांच होनी ही चाहिए। श्रद्धालुओं द्वारा भगवान के चरणों में अर्पित धन पर हाथ डालना केवल आर्थिक अपराध नहीं है, यह विश्वास के साथ विश्वासघात भी है। इसलिए इस मामले में किसी को बचाने, अपराध पर पर्दा डालने या जांच को प्रभावित करने का कोई प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहां एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या चोरी की जांच के नाम पर अब राम मंदिर की प्रतिष्ठा को ही राजनीतिक कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है? क्या एक आपराधिक घटना को इतना विस्तार दिया जा रहा है कि उसके छींटे मंदिर आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा तक पहुंचाए जा सकें? और क्या यह सब उस उत्तर प्रदेश में हो रहा है, जो अगले विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है?
इन प्रश्नों को पूछना इसलिए आवश्यक है क्योंकि राजनीति में संयोग बहुत होते हैं, लेकिन हर संयोग निर्दोष हो, यह भी आवश्यक नहीं।
राम मंदिर चढ़ावा मामले में जांच चल रही है। आरोपियों की भूमिका की पड़ताल हो रही है और जांच एजेंसियां धन के उपयोग तथा संभावित नेटवर्क की तह तक जाने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे समय में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो. रामगोपाल यादव की ओर से कथित रूप से हजारों करोड़ रुपये के घोटाले और सोना, चांदी तथा अन्य बहुमूल्य सामग्री गायब होने जैसे गंभीर आरोप सामने आए। इसी प्रकार अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और प्रियंका गांधी वाड्रा के बयानों को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। यदि किसी नेता के पास हजारों करोड़ रुपये के घोटाले का प्रमाण है, तो वह प्रमाण जांच एजेंसी के पास क्यों नहीं होना चाहिए? यदि उन्हें यह जानकारी है कि कितना सोना गायब हुआ, कितनी चांदी गायब हुई, कितना नकद चोरी हुआ और कौन बड़े लोग इसमें शामिल हैं, तो यह जानकारी केवल राजनीतिक मंच की सामग्री क्यों बने? इसे जांच अधिकारी को क्यों न सौंपा जाए?
इसी संदर्भ में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने जांच अधिकारी को पत्र लिखकर मांग की है कि सार्वजनिक रूप से गंभीर आरोप लगाने वाले नेताओं के बयान दर्ज किए जाएं। उनसे पूछा जाए कि उनके आरोपों का तथ्यात्मक आधार क्या है, उनकी सूचना का स्रोत कौन है और उनके पास कौन से दस्तावेज अथवा साक्ष्य हैं।
ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राम मंदिर चढ़ावा विवाद को केवल अपराध की जांच के रूप में देखा जा रहा है या उसके माध्यम से एक बड़ा राजनीतिक आख्यान गढ़ने का प्रयास हो रहा है? इस प्रश्न का उत्तर जांच से ही निकलेगा, लेकिन घटनाक्रम को देखकर सावधान रहना आवश्यक है।
विपक्ष को यह अधिकार है कि वह सरकार से प्रश्न पूछे। उसे मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्था पर भी प्रश्न पूछने का अधिकार है। लोकतंत्र में कोई संस्था प्रश्नों से ऊपर नहीं हो सकती। लेकिन प्रश्न पूछने और बिना प्रमाण राजनीतिक फैसला सुनाने में अंतर होता है। यदि चोरी लाखों में हुई है तो जांच लाखों की चोरी की होनी चाहिए। यदि करोड़ों का प्रमाण मिलता है तो जांच करोड़ों तक जानी चाहिए। यदि हजारों करोड़ का प्रमाण है तो देश के सामने रखा जाना चाहिए। लेकिन जांच के निष्कर्ष से पहले राजनीतिक भाषणों में आरोपों की राशि बढ़ाते जाना गंभीर प्रश्न पैदा करता है।
राम मंदिर का विषय करोड़ों लोगों की धार्मिक संवेदना से जुड़ा विषय है। इसीलिए इस विषय पर बोलने वालों की जिम्मेदारी भी सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से अधिक होनी चाहिए। एक कर्मचारी की चोरी को पूरे मंदिर की चोरी नहीं कहा जा सकता। कुछ लोगों के अपराध को पूरे राम मंदिर आंदोलन का चरित्र प्रमाणपत्र नहीं बनाया जा सकता। यदि किसी बैंक का कर्मचारी गबन करता है तो पूरा बैंकिंग तंत्र चोर नहीं हो जाता। यदि किसी मंत्रालय में कोई अधिकारी रिश्वत लेते पकड़ा जाता है तो पूरा लोकतंत्र भ्रष्ट घोषित नहीं हो जाता। फिर किसी मंदिर व्यवस्था में हुई चोरी के आधार पर पूरे आंदोलन और उससे जुड़े संगठनों को कठघरे में खड़ा करने की राजनीति क्यों?
इसका अर्थ यह भी नहीं कि मंदिर ट्रस्ट से प्रश्न न पूछे जाएं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को अपनी व्यवस्थाओं की कमियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। श्रद्धालुओं का चढ़ावा साधारण धन नहीं है। कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दस रुपये देता है, कोई हजार और कोई सोना या चांदी अर्पित करता है। इस धन की सुरक्षा ट्रस्ट की धार्मिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
यदि चोरी हुई है तो इसका अर्थ है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं कमजोरी थी। उस कमजोरी को स्वीकार कर सुधारना होगा। दान की गणना, भंडारण, डिजिटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी निगरानी, जिम्मेदारी निर्धारण और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को इतना मजबूत किया जाना चाहिए कि भविष्य में किसी कर्मचारी या अधिकारी के लिए श्रद्धालुओं के धन पर हाथ डालना लगभग असंभव हो जाए।
राजनीति में आरोप लगाकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन राम मंदिर जैसे संवेदनशील विषय पर आरोप लगाने वाला व्यक्ति अपने शब्दों की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
यदि किसी नेता के पास ठोस प्रमाण हैं, तो देश उन प्रमाणों को देखना चाहता है। यदि कोई बड़ा व्यक्ति इस चोरी में शामिल है, उसका नाम सामने आना चाहिए। यदि किसी प्रभावशाली पदाधिकारी ने अपराधियों को संरक्षण दिया है, उसे दंड मिलना चाहिए। लेकिन यदि प्रमाण के स्थान पर केवल राजनीतिक अनुमान और चुनावी भाषण हैं, तो यह भी जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए।
राम मंदिर किसी दल की संपत्ति नहीं है। भाजपा की भी नहीं, समाजवादी पार्टी की भी नहीं। संघ की भी नहीं और किसी नेता की भी नहीं। यह उस समाज की आस्था का केंद्र है जिसने सदियों तक इसकी प्रतीक्षा की है। इसलिए दो अपराधों के प्रति समान रूप से सावधान रहना होगा। पहला अपराध है भगवान के चढ़ावे की चोरी। दूसरा अपराध हो सकता है उस चोरी का राजनीतिक उपयोग करके मंदिर की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाना। पहले अपराध की जांच पुलिस और कानून करें। दूसरे की पहचान जागरूक समाज को करनी होगी।
चोरी की जांच अवश्य हो, पूरी कठोरता से हो और अंतिम अपराधी तक पहुंचे। लेकिन चोरी के बहाने राम मंदिर की प्रतिष्ठा की चोरी न होने दी जाए। क्योंकि राजनीति में चुनाव आते जाते रहेंगे, सरकारें बनती और बिगड़ती रहेंगी, दल जीतेंगे और हारेंगे, लेकिन अयोध्या की प्रतिष्ठा किसी चुनावी मौसम की संपत्ति नहीं है। वह भारत की सांस्कृतिक स्मृति और करोड़ों लोगों की आस्था का प्रश्न है। उस पर राजनीति करने से पहले हर दल को अपने शब्दों, आरोपों और इरादों की जिम्मेदारी लेनी ही होगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

