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लोकतंत्र में शासक वर्ग की निजी दुनिया दिल्ली जिमखाना क्लब?

आचार्य ललित मुनि

केंद्र सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने नई दिल्ली के2- सफ़दरजंग रोड़ पर स्थापित 110 वर्षीय दिल्ली जिमखाना क्लब को 5 जून तक अपने परिसर खाली करने का निर्देश दिया। इस निर्देश के जारी होते ही रसूख वाले लोगों में खलबली मच गई। यह एक ऐसी इमारत है जो ईंट और पत्थर से नहीं, बल्कि रुतबे और रसूख से बनी है। इसकी दीवारों के भीतर एक ऐसी दुनिया बसती है जहाँ देश के सबसे ताकतवर लोग यानी नौकरशाह, सेना के अधिकारी, न्यायाधीश, राजनेता और उद्योगपति शाम की चाय और शराब के गिलास के साथ राष्ट्र का भविष्य तय करते आए हैं।

दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना मूल रूप से “इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” के नाम से 3 जुलाई 1913 को हुई थी। इसके पहले अध्यक्ष स्पेंसर हारकोर्ट बटलर थे जो तत्कालीन संयुक्त प्रांत आगरा और अवध के पहले गवर्नर थे। 1928 में क्लब को नई शाही राजधानी नई दिल्ली में 27.3 एकड़ जमीन का स्थायी पट्टा दिया गया। यह वह दौर था जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी भव्यता के शिखर पर था और नई दिल्ली को एक नई शाही राजधानी के रूप में खड़ा किया जा रहा था।

क्लब का डिजाइन वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल ने तैयार किया था, जिन्होंने दिल्ली के कई ऐतिहासिक स्मारकों जैसे वेस्टर्न और ईस्टर्न कोर्ट, तीन मूर्ति भवन और सफदरजंग हवाई अड्डे को भी अपना स्वरूप दिया था। अंग्रेज अधिकारियों और सैन्य अफसरों के लिए बना यह क्लब उनकी जीवनशैली का विस्तार था, एक ऐसी जगह जहाँ साहब लोग पोलो खेलते थे, लॉन टेनिस के कोर्ट में पसीना बहाते थे और शाम को बॉलरूम में नृत्य करते थे।

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1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो क्लब के नाम से “इम्पीरियल” शब्द हटा दिया गया और यह केवल “दिल्ली जिमखाना क्लब” बन गया। किंतु इसकी औपनिवेशिक मानसिकता, विशेषाधिकार की संस्कृति और चुनिंदा लोगों का दरबार बना रहना, यह सब जस का तस रहा। स्वतंत्र भारत के नए शासक वर्ग ने इस क्लब को उसी उत्साह से अपनाया जैसे पुराने शासकों ने।

दिल्ली जिमखाना क्लब में सदस्यता पाना अत्यंत कठिन है। इसकी सदस्य संख्या लगभग 1,200 व्यक्तियों तक सीमित है और प्रत्येक वर्ष केवल 100 नए आवेदकों को सदस्यता दी जाती है। इच्छुक सदस्यों को 35 से 37 वर्ष की प्रतीक्षा अवधि का सामना करना पड़ता है। क्लब की कुल सदस्यता क्षमता 14,000 है, फिर भी 3,000 से अधिक आवेदन प्रतीक्षा सूची में हैं।

शुल्क की बात करें तो कॉर्पोरेट सदस्यता 15 से 20 लाख रुपये के बीच है, गैर सरकारी व्यक्तियों के लिए यह 5 से 10 लाख रुपये है। इस क्लब में एक “40-40-20” कोटा प्रणाली हुआ करती थी जिसमें 40 प्रतिशत नागरिक सेवकों यानी नौकरशाहों के लिए, 40 प्रतिशत रक्षा कर्मियों के लिए और शेष 20 प्रतिशत आम जनता यानी विशिष्ट या प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए आरक्षित था।

क्लब के सदस्यों में राहुल गांधी और सुरेश प्रभु जैसे शीर्ष राजनेता, नागरिक सेवकों, सशस्त्र बलों के अधिकारियों और उद्योगपतियों के नाम शामिल हैं। यह महज एक क्लब नहीं है, यह भारत के शासक वर्ग की अनौपचारिक संसद है जहाँ नीतियाँ पर्दे के पीछे बनती हैं और नियुक्तियाँ चाय की चुस्कियों के साथ तय होती हैं।

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यह क्लब विवादों से अनजान नहीं रहा। अगस्त 2014 में रिपोर्ट आई कि क्लब अनधिकृत बोरवेल का उपयोग कर रहा था और पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रहा था। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने अगस्त 2014 में दिल्ली जिमखाना क्लब को बंद करने का आदेश दिया, हालाँकि बाद में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इसे बंद होने से बचाते हुए 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

किंतु सबसे बड़ा विवाद तब सामने आया जब सरकार ने क्लब के आर्थिक प्रबंधन की जाँच की। सरकार ने पाया कि भले ही जमीन क्लब को खेल गतिविधियों के लिए पट्टे पर दी गई थी, 2014-15 से 2018-19 के बीच इसका कुल व्यय खेलों पर मात्र 2.77 प्रतिशत ही था। इसके बजाय भोजन, शराब, पेय पदार्थों और सिगरेट पर असाधारण रूप से अधिक राशि खर्च की जा रही थी। सार्वजनिक भूमि पर बने क्लब में राष्ट्रीय धन का उपयोग शराब और दावतों पर हो रहा था, यह तथ्य ही उस आंतरिक विरोधाभास को उजागर करता है जो इस क्लब के मूल में बैठा था।

मई 2026 में केंद्र सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने 110 वर्षीय दिल्ली जिमखाना क्लब को 5 जून तक अपने परिसर खाली करने का निर्देश दिया। आदेश में यह भी कहा गया कि अनुपालन न करने पर कानून के अनुसार संपत्ति ले ली जाएगी।

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क्लब का स्थान प्रधानमंत्री आवास के ठीक बगल में और रणनीतिक लुटियंस दिल्ली प्रशासनिक क्षेत्र के भीतर है जिसके कारण यह भूमि सुरक्षा अवसंरचना को मजबूत करने और क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण बताई जा रही है। यह आदेश 1928 के पट्टा समझौते के तहत उपलब्ध कानूनी शक्तियों के आधार पर दिया गया है जो सरकार को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए संपत्ति वापस लेने की अनुमति देता है।

नवीनतम आदेश से ठीक पहले सरकार ने क्लब से संशोधित पट्टा शुल्क और अन्य देनदारियों से जुड़े लगभग 47 करोड़ रुपये की माँग की थी। यह पूरा घटनाक्रम देखें तो स्पष्ट होता है कि यह लड़ाई केवल 2026 में अचानक नहीं शुरू हुई। यह वर्षों से धीरे धीरे पक रही थी।

यह उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी इस क्लब के सदस्य हैं। सरकार के इस कदम ने तत्काल राजनीतिक घमासान छेड़ दिया। क्लब के सदस्यों और 600 से अधिक कर्मचारियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पैरवी कर रहे हैं।

इस पूरे विवाद के केंद्र में एक मूलभूत प्रश्न है। क्या सार्वजनिक भूमि पर एक ऐसा क्लब चलना उचित है जहाँ आम नागरिक का प्रवेश वर्षों की प्रतीक्षा और लाखों रुपये के बिना संभव नहीं? अंग्रेजों के जाने के 78 साल बाद भी शासक वर्ग की अपनी एक अलग, बंद और विशेषाधिकार सम्पन्न दुनिया जीवित है, जिसमें अन्य किसी साधारण आदमी का दखल संभव नहीं है। अब मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।