futuredराजनीति

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिला सशक्तिकरण से राष्ट्र रचना तक

डाॅ श्रद्धा मिश्रा

खत्म हुआ दशकों का इंतजार, नारी शक्ति को मिला अधिकार। महिलाएं अब केवल सहभागी नहीं रहेंगी, बल्कि नेतृत्वकर्ता बनकर देश के विकास को नई दिशा देंगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी, संवेदनशील और सशक्त बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। भारतीय नारी व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों के समग्र विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी भूमिका निभाती है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शिता ने आधी आबादी को समान अधिकार दिया है, एवं सबका साथ, सबका विकास में नारी शक्ति को भी जोड़ा है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाना और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका देना है। जब महिलाएं शासन और नीतिनिर्माण में शामिल होती हैं, तो समाज अधिक संतुलित, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील बनता है।

अनादिकाल से शक्ति उपासना, ज्ञान और समृद्धि के प्रतीक के रूप में होती रही है। वैदिक काल में गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी ऋषिकाओं ने ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया। यह परंपरा स्पष्ट करती है कि भारतीय संस्कृति में नारी को सृजन, चेतना और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महान हस्तियां रही हैं। इनमें रानी लक्ष्मीबाई (झांसी की रानी), सरोजिनी नायडू (पहली महिला गवर्नर और स्वतंत्रता सेनानी), कस्तूरबा गांधी (महात्मा गांधी की सहयोगी और स्वतंत्रता सेनानी), अरुणा आसफ अली (भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख नेता), बेगम हज़रत महल (1857 के विद्रोह की वीरांगना), कमलादेवी चट्टोपाध्याय (प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी), मातंगिनी हाज़रा (असाधारण साहस की प्रतीक स्वतंत्रता सेनानी) और सुचेता कृपलानी (स्वतंत्रता सेनानी एवं उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री) जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

यह भी पढ़ें  असहज सच से मुंह मोड़ने की ‘सेकुलर’ कीमत

आज की भारतीय महिलाएं विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, पत्रकारिता, उद्यमिता, खेल, सशस्त्र बल, सामाजिक कार्य, कला और संस्कृति, चिकित्सा और अंतरिक्ष सहित हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी को संस्थागत रूप देना समय की मांग है, ताकि देश के समग्र और संतुलित विकास को और अधिक गति मिल सके। भारतीय नारी समाज, परिवार और व्यक्ति निर्माण की आधारशिला है। वह केवल परिवार की संरक्षक ही नहीं, बल्कि संस्कारों, मूल्यों और नैतिकता की प्रथम शिक्षक भी होती है। आज नारी शक्ति अपने घरेलू दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए भी राजनीति और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही है और राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दे रही है। एक माँ के रूप में वह बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण करती है, उन्हें अनुशासन, सहानुभूति और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाती है। आधुनिक भारत में नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाते हुए महिलाओं की भागीदारी को और सशक्त बना रहा है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम क्या है?
यह अधिनियम लोकसभा और विधानसभाओं की कुल सीटों में 33 प्रतिशत महिला-आरक्षित सीटें (रोटेशन के साथ) देता है, ताकि महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व में समान मौका मिल सके। यह 128वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में 2023 में पारित हुआ, और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे 28 सितंबर, 2023 को मंजूरी दे दी, जिससे यह भारतीय कानून बन गया।

कैसे यह अधिनियम लागू होगा?
इसके लागू होने के लिए परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया तय करनी होगी। सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर रही है, और इसे 16–18 अप्रैल 2026 के विशेष संसद सत्र में संशोधित विधेयक के रूप में पारित कर लागू करने की तैयारी है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनावों से ही 33% आरक्षण लागू हो सके। प्रावधान के अनुसार, यह आरक्षण निर्दिष्ट अवधि (लगभग 15 वर्ष) के लिए लागू रहेगा। बाद में आवश्यकता होने पर इसे बढ़ाया जा सकता है, ताकि धीरे-धीरे लैंगिक संतुलन राजनीतिक व्यवस्था में स्वाभाविक हो जाए।

यह भी पढ़ें  सुशासन तिहार 2026: 30 अप्रैल तक लंबित मामलों के समाधान के निर्देश, 1 मई से 10 जून तक लगेंगे जन समस्या निवारण शिविर

दशकों के इंतजार के बाद ऐतिहासिक पल सच होने वाले हैं। 1996 – महिला आरक्षण विधेयक पहली बार संसद में पेश हुआ, लेकिन लोकसभा भंग होने के साथ ही विधेयक लैप्स हो गया। 1998 और 1999 – विधेयक दोबारा पेश हुआ, लेकिन दोनों बार कानून बनने से पहले ही लैप्स हो गया। 2008 – महिला आरक्षण विधेयक एक बार फिर संसद में पेश किया गया। 2010 – विधेयक राज्यसभा से पारित हुआ, लेकिन लोकसभा में लंबित रहा और बाद में लैप्स हो गया। 2014 और 2019 – महिला आरक्षण भाजपा के संकल्प का हिस्सा बना रहा। 2023 – संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया, जिसके तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया।

वर्ष 2023 में इस अधिनियम को व्यापक समर्थन मिलना भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रतीक है। 16 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित संसद की ऐतिहासिक बैठक में इस विधेयक पर चर्चा और उसका पारित होना करोड़ों भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं, उम्मीदों और अधिकारों का सशक्त प्रतिबिंब होगा। यह केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की नारी शक्ति के सम्मान और उनके अधिकारों की स्वीकृति का प्रतीक है। नारी शक्ति को लंबे समय तक केवल वोट बैंक के रूप में देखा गया, लेकिन उनके वास्तविक अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम सीमित रहे। जब इस अधिनियम को संसद में प्रस्तुत किया गया, तब परिस्थितियाँ पूरी तरह अनुकूल नहीं थीं, फिर भी इसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया और भविष्य में इसके प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में कार्य जारी है। माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के दृढ़ संकल्प से आने वाले समय में आवश्यक प्रक्रियाओं और संशोधनों के साथ यह व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ रूप में लागू होगी।

यह भी पढ़ें  भीषण गर्मी के चलते स्कूलों की छुट्टियां पहले घोषित, अब 20 अप्रैल से 15 जून तक रहेगा ग्रीष्मकालीन अवकाश

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार, माननीय मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में, मातृशक्ति के सम्मान और सशक्तिकरण के प्रति पूर्णतः समर्पित और प्रतिबद्ध है। ‘महतारी वंदन योजना’ जैसे प्रयास इस दिशा में किए जा रहे ठोस कार्यों का प्रमाण हैं, जिनसे लाखों महिलाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है। यह पहल न केवल आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रही है, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता को भी मजबूत कर रही है।

अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधिक, संतुलित और प्रभावी बनाएगा। यह अधिनियम केवल एक कानूनी पहल नहीं, बल्कि एक समावेशी और सशक्त भारत के निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है, जिसमें सभी की सहभागिता आवश्यक है। यह न केवल महिलाओं को पंचायत से संसद तक सशक्त करेगा, बल्कि करोड़ों भारतीय महिलाओं के सपनों और आकांक्षाओं को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।