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सुभाष बोस के राजनीतिक गुरु देशबंधु चित्तरंजन दास

आचार्य ललित मुनि

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में ऐसे कई नाम हैं जो केवल नेतृत्व के लिए नहीं बल्कि अपने त्याग और मानवीय संवेदनाओं के लिए अमर हो गए। उनमें से एक हैं देशबंधु चित्तरंजन दास, जिन्हें पूरा देश प्यार से देशबंधु कहकर पुकारता था। वे न केवल एक कुशल वकील थे बल्कि एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी सारी संपत्ति और प्रतिष्ठा को स्वतंत्रता के यज्ञ में अर्पित कर दिया। उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा क्रांतिकारी को राजनीति के क्षेत्र में मार्गदर्शन देने की। सुभाष बोस ने स्वयं उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना और उनके मार्गदर्शन में उन्होंने राष्ट्र सेवा के उस पथ पर कदम रखा जो बाद में उन्हें नेताजी के रूप में पूरे विश्व में विख्यात कर गया।

चित्तरंजन दास का जन्म पांच नवंबर सन् सत्रह सौ सत्तर को कलकत्ता में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता एक सफल वकील थे और उन्होंने भी वही मार्ग अपनाया। युवावस्था में वे लंदन गए जहां उन्होंने कानून की पढ़ाई की और वापस आकर कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। उनकी प्रतिभा और वाक्पटुता ने उन्हें शीघ्र ही सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया। वे प्रतिदिन हजारों रुपये कमाते थे और उस धन को उदारता से खर्च भी करते थे।

लेकिन उनके हृदय में राष्ट्रप्रेम की अग्नि सुलग रही थी। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो चित्तरंजन दास ने अपनी सारी कानूनी प्रैक्टिस छोड़ दी। उन्होंने अपनी संपत्ति भी त्याग दी और पूरी तरह आंदोलन में कूद पड़े। यह त्याग इतना गहरा था कि लोग उन्हें देखकर हैरान रह जाते थे कि एक ऐसा व्यक्ति जो पहले विलासिता से जीता था अब सादगी का जीवन जी रहा है।

सुभाष चंद्र बोस जब सन् उन्नीस सौ इक्कीस में भारतीय सिविल सेवा की नौकरी छोड़कर स्वदेश लौटे तो उनके मन में स्वतंत्रता की ललक थी। गांधी जी से मिलने के बाद उन्हें सलाह मिली कि वे बंगाल में चित्तरंजन दास से संपर्क करें। जब सुभाष बोस पहली बार देशबंधु से मिले तो उनका हृदय गदगद हो उठा। देशबंधु की आंखों में वो चमक थी जो युवाओं को प्रेरित करती थी। वे समझते थे कि युवा मन कैसा होता है और उन्हें कैसे दिशा दी जाए।

सुभाष बोस ने तुरंत अपने आपको उनके नेतृत्व में समर्पित कर दिया। देशबंधु ने उन्हें बंगाल नेशनल कॉलेज का प्रधानाचार्य बनाया जहां वे शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का कार्य संभालते थे। साथ ही उन्हें नेशनल वालंटियर कॉर्प्स का कप्तान भी बनाया गया। यह जिम्मेदारी सुभाष बोस को बहुत प्रिय लगी क्योंकि इससे उन्हें बंगाल के युवाओं को सैन्य अनुशासन में ढालने का अवसर मिला। वे प्रचार विभाग के प्रमुख भी बने और कांग्रेस के संदेश को जन जन तक पहुंचाने में लग गए।

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देशबंधु और सुभाष बोस के बीच का संबंध केवल राजनीतिक नहीं था बल्कि पिता और पुत्र जैसा था। देशबंधु सुभाष की महत्वाकांक्षा और उत्साह को समझते थे। वे अक्सर उनसे बहस भी करते थे लेकिन सिद्धांतों पर कभी मतभेद नहीं होता था। सुभाष बोस ने बाद में अपनी पुस्तक भारतीय संघर्ष में लिखा कि देशबंधु की मृत्यु भारत के लिए पहली श्रेणी की राष्ट्रीय आपदा थी। उन्होंने कहा कि देशबंधु ने केवल पांच वर्षों के सक्रिय राजनीतिक जीवन में ही इतना कुछ कर दिखाया कि उनकी छाप अमिट रह गई। वे वैष्णव भक्त की तरह निस्वार्थ भाव से आंदोलन में डूब गए थे और उन्होंने न केवल स्वयं बल्कि अपनी सारी संपत्ति भी स्वराज के लिए दे दी।

बंगाल में असहयोग आंदोलन की सफलता में देशबंधु की भूमिका अद्वितीय थी। उन्होंने युवाओं को संगठित किया और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया। सुभाष बोस उनके दाहिने हाथ बन गए। जब देशबंधु कलकत्ता के महापौर चुने गए तो उन्होंने सुभाष बोस को नगर निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। यह निर्णय विवादास्पद था क्योंकि कई लोग अधिक अनुभवी बिरेंद्रनाथ सस्मल को पसंद करते थे लेकिन देशबंधु को सुभाष की क्षमता पर पूरा विश्वास था। सुभाष ने इस पद पर रहते हुए भी अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर बर्मा भेज दिया गया। लेकिन देशबंधु का समर्थन उनके साथ बना रहा।

देशबंधु ने स्वराज पार्टी की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब कांग्रेस के अंदर परिषदों में प्रवेश को लेकर मतभेद हुए तो उन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वराज पार्टी बनाई। इसका उद्देश्य था कि विधान परिषदों में जाकर ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया जाए और स्वराज की मांग को मजबूत किया जाए। सुभाष बोस इस पार्टी के सक्रिय सदस्य बने और बंगाल में इसके प्रचार में लग गए। देशबंधु की दूरदृष्टि ने उन्हें समझा दिया था कि केवल आंदोलन से नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति से भी स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है।

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मानवीय दृष्टि से देखें तो देशबंधु एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके हृदय में गरीबों और पीड़ितों के लिए गहरी संवेदना थी। वे न केवल राजनीतिक नेता थे बल्कि एक कवि और पत्रकार भी थे। उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम की झलक मिलती थी। उन्होंने फॉरवर्ड नामक समाचार पत्र की स्थापना की जिसके संपादक बाद में सुभाष बोस बने। यह पत्र ब्रिटिश शासन की नीतियों का खुलकर विरोध करता था और जनता को जागृत करता था। सुभाष बोस ने देशबंधु से सीखा कि कैसे शब्दों से क्रांति लाई जा सकती है।

देशबंधु का स्वास्थ्य सन् उन्नीस सौ पच्चीस में बिगड़ने लगा। वे दार्जिलिंग गए जहां सोलह जून को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु से पूरा बंगाल शोक में डूब गया। सुभाष बोस के लिए यह व्यक्तिगत क्षति थी। उन्होंने अपने गुरु को खो दिया था जो न केवल राजनीतिक मार्गदर्शक थे बल्कि जीवन के कठिन क्षणों में सहारा भी देते थे। देशबंधु की मृत्यु के बाद सुभाष बोस ने उनकी विरासत को संभाला। वे बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष बने और स्वराज पार्टी के कार्यों को आगे बढ़ाया। देशबंधु की शिक्षाओं ने सुभाष को और अधिक दृढ़ बना दिया।

देशबंधु चित्तरंजन दास की सबसे बड़ी देन थी कि उन्होंने सुभाष बोस जैसे तेजस्वी युवा को राजनीति के क्षेत्र में लाकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। सुभाष बोस ने बाद में आजाद हिंद फौज का गठन किया और विदेशों में जाकर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी। लेकिन उनकी राजनीतिक नींव देशबंधु ने ही रखी थी। देशबंधु का मानना था कि स्वतंत्रता केवल लड़ाई से नहीं बल्कि संगठन शिक्षा और जन जागरण से आएगी। उन्होंने सुभाष को यही सिखाया कि युवाओं को चरित्र निर्माण पर जोर देना चाहिए।

भावनात्मक रूप से देखें तो देशबंधु और सुभाष का संबंध एक ऐसे बंधन का प्रतीक है जो समय और परिस्थितियों से परे है। देशबंधु ने सुभाष को अपनी बेटी की तरह प्यार दिया और सुभाष ने उन्हें पिता के समान सम्मान दिया। जब देशबंधु ने अपनी सारी दौलत त्याग दी तो सुभाष ने भी अपनी आईसीएस की नौकरी छोड़कर उसी पथ पर चलना चुना। यह त्याग की परंपरा थी जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही।

देशबंधु की मृत्यु के बाद भी उनकी यादें सुभाष बोस के साथ रहीं। उन्होंने अपनी किताबों और भाषणों में बार बार देशबंधु का जिक्र किया और उन्हें भारत का सबसे महान नेता बताया। देशबंधु ने बंगाल को न केवल राजनीतिक रूप से संगठित किया बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी जागृत किया। उनके प्रभाव से ही बंगाल के युवा क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय हुए और सुभाष बोस उनमें सबसे आगे रहे।

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आज जब हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं तो देशबंधु चित्तरंजन दास और सुभाष चंद्र बोस के संबंध को याद करना आवश्यक है। यह संबंध दिखाता है कि कैसे एक गुरु अपने शिष्य को न केवल ज्ञान देता है बल्कि अपने जीवन के मूल्यों से भी प्रेरित करता है। देशबंधु ने सुभाष को सिखाया कि सच्ची स्वतंत्रता आत्म बलिदान से आती है। सुभाष ने उस शिक्षा को अमल में लाकर इतिहास रचा।

देशबंधु का पूरा जीवन त्याग का प्रतीक था। वे वकील के रूप में कमाते थे लेकिन जब राष्ट्र की पुकार आई तो सब कुछ छोड़ दिया। उनकी पत्नी बसंती देवी भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलीं और उन्हें मां के रूप में जाना गया। सुभाष बोस ने भी देशबंधु की पत्नी को मां कहा। यह पारिवारिक बंधन राजनीतिक संबंध को और गहरा बनाता था।

सुभाष बोस ने देशबंधु से सीखा कि राजनीति में सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। जब स्वराज पार्टी बनी तो देशबंधु ने परिषदों में प्रवेश का मार्ग चुना लेकिन उनका लक्ष्य स्वराज ही था। सुभाष ने भी बाद में अपनी रणनीति में इसी लचीलेपन को अपनाया। देशबंधु की मृत्यु के बाद बंगाल की राजनीति अस्त व्यस्त हो गई लेकिन सुभाष ने उसे संभाला।

यह लेख देशबंधु चित्तरंजन दास की स्मृति को समर्पित है जिन्होंने सुभाष बोस को राजनीतिक रूप से गढ़ा। उनके जीवन की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा नेतृत्व त्याग और संवेदना से आता है। सुभाष बोस ने देशबंधु को अपना गुरु माना और उनके पदचिन्हों पर चलकर भारत की स्वतंत्रता के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। आज भी उनके संबंध की यह कहानी युवाओं को प्रेरित करती है कि कैसे एक सच्चा गुरु अपने शिष्य को महान बना सकता है। देशबंधु और सुभाष का यह बंधन भारतीय इतिहास का एक अमूल्य अध्याय है जो हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में मानवीय संबंध कितने महत्वपूर्ण होते हैं।