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पुराने कुओं को जगाइए, जल संकट को भगाइए

आचार्य ललित मुनि

जून का महीना आते ही आकाश में बादलों की आहट सुनाई देने लगती है। किसान आकाश की ओर निहारता है, पशु-पक्षी बेचैन हो उठते हैं और धरती अपनी प्यास बुझाने की प्रतीक्षा में दरकने लगती है। यह मानसून के आगमन की पूर्वसूचना है। लेकिन मानसून के पहले हमारे पूर्वज एक जरुरी कार्य किया करते थे जो आज लगभग भुला दिया गया है। वर्षा ऋतु से पूर्व गाँव-गाँव में कुओं की सफाई होती थी, उनकी जगत लिपी-पुती जाती थी और उन्हें नए सिरे से जल-स्वागत के लिए तैयार किया जाता था। यह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं थी, यह एक वैज्ञानिक कर्तव्य था।

हम देख रहे हैं कि आज निरंतर भूजल का स्तर गिर रहा है, भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। घरती की छाती में गहरे छेद किये जा रहे हैं, पर अधिंकाश में जल नहीं है, या जल गहरे उतर चुका है। आज जब देश के अनेक भागों में भूजल संकट विकराल रूप ले चुका है, शहरों में जल-आपूर्ति ठप हो रही है और गाँवों में हैंडपंप सूख रहे हैं, तब पुराने कुओं का जीर्णोद्धार आवश्यक हो जाता है, कुओं को अब जगाना होगा।

भारतीय परंपरा में मानसून पूर्व कुओं की सफाई को धार्मिक कर्तव्य की श्रेणी में रखा गया था। वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ के ‘उदकार्गल’ अध्याय में स्पष्ट निर्देश है कि वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व जलस्रोतों की शुद्धि अनिवार्य है। उनके अनुसार ग्रीष्म काल में कुओं में जमा हुई गाद, काई और अशुद्धियाँ वर्षा जल को दूषित कर देती हैं, अतः उनकी सफाई आवश्यक है।

मनुस्मृति के पाँचवें अध्याय में कहा गया है कि कुएँ, तालाब और नदियों की शुद्धता बनाए रखना प्रत्येक गृहस्थ का धर्म है। अग्निपुराण में भी ‘जलाशय-शोधन’ विधि का उल्लेख है जिसमें वर्षा से पहले जलस्रोतों को साफ करने की विस्तृत प्रक्रिया दी गई है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के द्वितीय अधिकरण में तो राजकीय अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य बताया गया है कि वे ग्रीष्म ऋतु में सार्वजनिक कुओं की सफाई सुनिश्चित करें।

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यह एक सर्वविदित तथ्य है कि कुएँ वर्षाजल से ही भरते हैं। जब मानसून की वर्षा भूमि में रिसती है तो वह भूजल को ऊपर उठाती है और कुओं में जल-स्तर बढ़ता है। किन्तु यदि कुआँ वर्षों से बंद पड़ा है, उसमें कचरा, मिट्टी और मलबा भरा हुआ है, तो वर्षाजल का रिसाव अवरुद्ध हो जाता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2023 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार देश के 256 जिलों में भूजल का स्तर अति-दोहन की श्रेणी में है। इन जिलों में यदि परंपरागत कुओं को पुनर्जीवित किया जाए तो वे वर्षाजल को भूमि में उतारने का काम करते हैं, अर्थात रिचार्ज पॉइंट का काम करते हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की के शोध के अनुसार एक साफ और सुव्यवस्थित कुआँ प्रतिवर्ष 50,000 से 1,50,000 लीटर वर्षाजल को भूमि में पहुँचाने में सक्षम है। यह वही जल है जो भूजल तालिका को ऊपर उठाता है और वर्ष भर हैंडपंपों, बोरवेलों और कुओं में जल-स्तर बनाए रखता है।

भारत में स्वतंत्रता के बाद से कुओं की उपेक्षा का जो दौर चला वह आज भी जारी है। नलकूप और हैंडपंप आ जाने के बाद गाँव वालों ने कुओं का उपयोग बंद कर दिया और धीरे-धीरे वे कचरा फेंकने का स्थान बन गए। राष्ट्रीय जल मिशन के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में अनुमानित 30 लाख से अधिक पुराने कुएँ हैं जिनमें से 60 प्रतिशत से अधिक या तो पूरी तरह बंद हो चुके हैं या उनकी दशा अत्यंत जर्जर है। इन कुओं में वर्षों से जमी गाद और मलबे के कारण जल-धारण क्षमता लगभग शून्य हो गई है। मानसून का जल इनमें नहीं ठहरता और भूमि में नहीं उतरता। परिणामस्वरूप एक ओर वर्षा का जल व्यर्थ बह जाता है और दूसरी ओर भूजल स्तर गिरता जाता है। यह विडंबना है कि जो देश वर्षाजल से समृद्ध है, वहाँ जल-संकट है।

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छत्तीसगढ़ के साथ अन्य कई राज्यों में भी हर घर की बाड़ी में एक कुंआ होता है। जिसका उपयोग पेयजल निस्तारी के साथ बखरी में सब्जी उगाने एवं उसके सिंचन के लिए किया जाता है। लेकिन इन कुंओं के खराब होने के पीछे सेप्टिक टैंक एक बड़ा कारण बनकर सामने आ रहा है। सैप्टिंक टैंक से मल युल जल का रिसाव होने के कारण वह जल रिसकर कुंओं में आ जाता है। जिसके कारण कुंए का जल मानव उपयोग के लायक नहीं रहता। यह एक बड़ी समस्या है, जिसका सामना ग्रामीण कर रहे हैं। मेरी कईयों से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि घरों मे सैप्टिक टैंक होने के कारण उसके रिसाव को कुंआ का स्रोत खींच लेता है और कुंआ खराब हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि कुओं का जल खराब होना केवल गाँवों की समस्या हैं। भारत के हर पुराने शहर एवं नगर में सैकड़ों प्राचीन कुएँ और बावड़ियाँ हैं जो अतिक्रमण, मलयुक्त जल का रिसाव और उपेक्षा के कारण मृतप्राय हो गई हैं। इनमें अधिकांश ढके हुए या कचरे से भरे हैं। यदि इन्हें साफ कर वर्षाजल संचयन से जोड़ा जाए तो शहरी भूजल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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केंद्र सरकार की ‘जल शक्ति अभियान’ और ‘अटल भूजल योजना’ में परंपरागत जलस्रोतों के पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी गई है। किन्तु सरकारी प्रयासों के साथ-साथ नागरिक चेतना भी उतनी ही आवश्यक है। स्कंदपुराण में कहा गया है कि जो समाज अपने जलस्रोतों की रक्षा करता है, वही समाज दीर्घकाल तक समृद्ध रहता है। यह वाक्य आज नीतिशास्त्र का सूत्र बन सकता है।

जून का यह महीना उस सुनहरे अवसर का द्वार है जब थोड़े से श्रम और संकल्प से हम अपने पुराने कुओं को जिंदा कर सकते हैं। मानसून की पहली बारिश से पहले यदि हम अपने गाँव या मुहल्ले के पुराने कुएँ की सफाई करें, उसकी मरम्मत करें और उसे जल-संचयन के लिए तैयार करें, तो हम न केवल एक जलस्रोत को बचाएंगे बल्कि उस परंपरा को भी जीवित करेंगे जिसने हजारों वर्षों तक इस देश को जल-समृद्ध बनाए रखा।

ऋग्वेद के ‘आपो हि ष्ठा मयोभुवः’ सूक्त में ऋषि ने जल देवताओं से प्रार्थना की थी कि वे हमें जीवनदायी जल दें। आज उस प्रार्थना का उत्तर हम स्वयं दे सकते हैं। अपने पूर्वजों के खोदे हुए कुओं को जगाना, उनसे निकलने वाले जल को सहेजना और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल-विरासत को सुरक्षित करना, यही इस जून में हमारा सबसे बड़ा धर्म है।

 

आचार्य ललित मुनि

वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।