विकास की कसौटी पर वृक्षों की बलि : विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

प्रो अश्विनी केशरवानी

आज विकास के नाम पर पेड़ों की बलि दी जा रही है। सड़क चौड़ीकरण के लिए अनगिनत पेड़ काटे जा रहे हैं। पेड़ काटकर कालोनियां बनायी जा रही हैं और वृक्षारोपण के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभायी जा रही है। ऐसे में विनाश निश्चित है। अमेरिका में घर लकड़ी के अवश्य बने होते हैं मगर पेड़ों को अनावश्यक नहीं काटा जाता बल्कि वृक्षारोपण और हरियाली के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है। ऐसा नहीं करने पर दंड का भी प्रावधान है। यहां पौधारोपण और हरियाली के लिए लोगों में जागरूकता है।

आज से 40 साल पहले जब जीवविज्ञान लेखिका रसेल कार्सन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘साइलेंट स्प्रिंग‘ में किसी काल्पनिक शहर की अकाल मृत्यु का भयावह दृश्य खींचा था, तब बहुतों को लगा कि यह कोरी कल्पना है और कभी ऐसा नहीं हो सकता। पर ज्यादा दिन नहीं बीते थे कि अचानक अमेरिका के एक औद्योगिक नगर डेट्रोइट के पास के कस्बे में लोग उस दिन हैरान हो गये। उस दिन वहां अजीब बरसात हुई। बाहर सूखते कपड़े जल गये। जिस पर भी वह गिरा वह चीख उठा। जांच करने पर पता चला कि वह पानी नहीं तेजाब था-गंधक का अम्ल। कारखानों की चिमनियों से हवा में इतनी सल्फर डाई आक्साइड जमा हो गयी कि बादलों के साथ रासायनिक क्रिया करके रिमझिम वर्षा कर दी..दहकते तेजाब की।

सन् 1979 में ईटली के शहर सेवोसो में भी तो जैसे कार्सन की पुस्तक का ही मंचन हुआ था। एक दिन लोगों को लगा कि आज फिजां कुछ बदली बदली है। हवा में एक अजीब गंध तैर रही है। फिर देखा कि मूर्गियां मरने लगीं, पेड़ सूखने लगे। बूड़े खांसते खांसते परेशान हो गये। जांच करने पर पता चला कि पास में स्थित कारखाने में ट्राई क्लोरो फिनोल याने टी. पी. सी. नामक रसायन बनता था। एक दिन उस कारखाने से जो धुआं निकला, निकलता ही चला गया और सारे शहर में फैल गया। इससे तापमान 200 डिग्री सेल्सियस हो गया और डाई आक्सिन नामक एक जहरीली गैस बन गयी जो चिमनी से निकलकर पूरे शहर में फैल गया और ये हादसा हो गया। सन् 1984 में भोपाल का गैस कांड सारी दुनियां में औद्योगिक विकास के चेहरे पर कालिख पोत गया।

वास्तव में ऐसा क्यों हुआ? विश्लेषण करने पर पता चलता है कि औद्योगिक क्रांति की भट्ठी में हमने अपना जंगल झोंक दिया है। पेड़ काट डाले और सड़कें बना डालीं। कुल्हाड़ी-आरी से जंगल काटने में देर होती थी, तो पावर से चलने वाली आरियां गढ़ डालीं। 50 से 90 के बीच 40 वर्षो में दुनियां के लगभग आधे जंगल काट निकाले गये, आज भी बेरहमी से काटे जा रहे हैं। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है और दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आखिर जंगल क्यों जरूरी है? पेड़ हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है?

पेड़ हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजनर्, इंधन, ईमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और तमाम दुनियां के अद्भूत रसायन देते हैं। इसलिए हमने उसका दोहन (शोषण) तो किया, पर यह भूल गये कि वृक्षों के नहीं होने से यह धरती आज वीरान बनती जा रही है। वनों के इस उपकार का रूपयों में ही हिसाब लगायें तो एक पेड़ 16 लाख रूपये का फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है और धरती को हरा भरा बनाता है। पेड़ पौधों की जड़ें मिðी को बांधे रहती है। पेड़ों की कटाई से धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। धरती की उपजाऊ मिðी को तेज बौछारों का पानी बहा ले जाती है। पेड़ों की ढाल के बिना पानी की तेज धाराएं पहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबाती चली जाती है। हर साल बाढ़ का पानी अपने साथ 600 करोड़ टन मिट्टी बहा ले जता है। मिट्टी के इस भयावह कटाव को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की पत्रिका -‘खेती‘ के प्रधान संपादक श्री रमेश दत्त शर्मा ने ‘घाव हरे हो रहे हैं हरियाली के‘ शीर्षक से प्रकाशित अपने लेख में चेतावनी देते हुए कहा है कि ‘संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार विकासशील देशों में हर घंटे 8 से 12 वर्ग कि.मी. वन काटे जा रहे हैं। वैज्ञानिक पृथ्वी को ‘हरा गृह‘ कहते हैं। हरियाली मानव सभ्यता की मुस्कान है। पृथ्वी की हरियाली हजारों किस्म की उपयोगी वनस्पतियों के कारण है, लेकिन आज तथाकथित विकास की अंधी दौड़ ने हमें पागल बना दिया है और हम जंगल काटकर कांक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं। परिणामस्वरूप वनस्पतियों की 20 से 30 हजार किस्में धरती से उठ गयी हैं। यदि हमारे पागलपन की यही स्थिति रही तो इस सदी के अंत तक हम 50 हजार से भी अधिक वनस्पतियों की किस्मों से हाथ धो बैठेंगे। इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इससे 10-12 जातियों के जीवों का भी लोप हो जायेगा। अतः पृथ्वी की हरियाली न केवल हमारे जीवन की उर्जा है, अपितु पर्यावरण को संतुलित करने के लिए बहुत जरूरी है।‘

पर्यावरण सबसे अधिक वनों से प्रभावित होता है। हवा, पानी, मिट्टी , तापमान आदि वनों से प्रभावित होते हैं। शंकुधारी पौधों की प्रजातियां समुद्र तट से लगभग 5000 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ों पर पायी जाती है। शंकुधारी पौधों में जल ग्रहण क्षमता बहुत अधिक होती है। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में शंकुधारी पौधों के साथ साथ चौड़े पत्तों वाले वृक्ष भी पाये जाते हैं। प्रायः इन क्षेत्रों के आसपास पानी का स्रोत पाया जाता है। साल प्रजाति के पौधे अन्य प्रजाति के पौधों की अपेक्षा अधिक ठंडे और आर्द्र होते हैं और इस क्षेत्र में पानी का बहाव हमेशा रहता है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के सरगुजा, रायगढ़, जशपुर, रायपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बिलासपुर और राजनांदगांव जिलों के अलावा शहडोल, मंडला और बालाघाट जिले में साल के पेड़ बहुतायत में मिलते हैं। इसी प्रकार हिमालय की चोटी में पूरे वर्ष बर्फ जमे होने के कारण वहां से निकलने वाली नदियों में हमेशा पानी बहता है। लेकिन इंद्रावती, नर्मदा, सोन, चम्बल, महानदी, रिहंद, केन आदि का उद्गम बर्फीली पहाड़ियों से नहीं होने के कारण इनमें हमेशा पानी बहता है। इसका एक मात्र कारण वनों की जल ग्रहण क्षमता और इनसे उत्पन्न पानी का स्रोत है। कहना न होगा कि हमारे देश में पानी के दो मुख्य स्रोत-बर्फ और वन हैं। अमरकंटक की वनाच्छादित पहाड़ियां, नर्मदा और सोन नदी के जल ग्रहण क्षमता क्षेत्र हैं। यहीं से दोनों नदियों का उद्गम भी है। साल के वनों के साथ साथ इस क्षेत्र में बाक्साइड की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है, जिसका खनन जारी है। इससे यहां की जल ग्रहण क्षमता में भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा है। दूसरा पास में स्थित एक पेपर मिल के लिए बांस के वनों की कटाई और यूकेलिप्टस के रोपण से पानी के स्रोत सूखते जा रहे हैं।

वनों के घटने या बढ़ने से वहां की जलवायु प्रभावित होती है। वन क्षेत्रों में एवं उसके आसपास की जलवायु अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा आर्द्र और ठंडी होती है। जलवायु पर वनों के इस प्रभाव को ‘माइक्रो क्लाइमेटिक इफेक्ट‘ कहते हैं। इस प्रभाव के साथ वनों का पृथ्वी के पूरे वातावरण एवं पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। यहां यह बताना समीचीन प्रतीत होता है कि पौधे और वातावरण के साथ हमारा कैसा सम्बंध है। पौधे अपना भोजन बनाने के लिए सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पत्तियों में उपस्थित क्लोरोफिल और वातावरण में उपस्थित कार्बन डाई आक्साइड के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करके अपना भोजन तैयार करते हैं और आक्सीजन छोड़ते हैं वायुमंडल में कार्बनडाईआक्साइड और आक्सीजन का एक निश्चित अनुपात होता है। इसमें वायुमंडल में एक साम्य बना रहता है।

लेकिन अगर कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ जाए, तो यह साम्य टूट जाता है। ऐसा तब होता है, जब पेड़ पौधे कम हों ? इस संतुलन को बिगाड़ने के लिए औद्योगिकरण बहुत हद तक जिम्मेदार है। गगनचुम्बी चिमनियों से और जल, थल ओर नभ में बढ़ते यातायात के साधनों के कारण कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ती ही जा रही है, जो पृथ्वी के चारों ओर इकट्ठी होकर एक चादर का काम करती है। इससे पृथ्वी की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती, जिससे ताप में वृद्धि होती जा रही है।

तापमान के बढ़ने की इस प्रक्रिया को ‘ग्रीनहाउस‘ कहते हैं वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि अगली शताब्दी के अंत तक वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा दो गुनी हो जायेगी, जिससे ध्रुवी क्षेत्रों का तापमान बढ़ जायेगा। इससे बर्फ पिघलेगी। गर्मी के दिनों में बाढ़ आयेगी और अवर्षा के दिनों में बर्फ के पिघलने से बारहों मास बहने वाली नदियां सूख जायेंगी। इससे जमीन का जल स्तर भी नीचे चला जायेगा और इन नदियों में बनाये गये बांध सूख जायेंगे। इससे चलने वाले बिजली घर बंद हो जायेंगे। अतः इनसे होने वाले दुष्परिणामों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

एक करोड़ पेड़ों को डुबाकर सुदूर वनांचल बस्तर में बनने वाली बोधघाट वि़ुत जल परियोजना, भागीरथी टिहरी की घाटी में बसी हुई 70 हजार की जनसंख्या को विस्थापित कर बनने वाला भीमकाय टिहरी बांध और इसीप्रकार के अन्य बांध जो कभी भी अपनी पूरी आयु तक जिंदा नहीं रहेंगे, गंधमर्दन के प्राकृतिक वन को उजाड़कर प्राप्त होने वाले बाक्साइड और दून घाटी को रेगिस्तान बनाकर प्राप्त होने वाले चूना पत्थर से किसको लाभ होने वाला है ? इस प्रकार के विकास के आधार पर खड़ी होने वाली अर्थ व्यवस्था अवश्य ही भोग लिप्सा को भड़का सकती है, क्षेत्रीय असंतुलन पैदा कर सकती है। इससे पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो सकती है, जिसकी भरपायी किसी भी कीमत पर नहीं हो सकती।

आखिर जंगल क्यों जरूरी है ? पेड़ पौधे हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है ? पेड़-पौधे हमें फल, फूल, जड़ीबूटी, भोजन, ईंधन, इमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और कई प्रकार के रसायन देते हें। इसलिए उसका शोषण तो किया गया, पर हम यह भूल गये कि पेड़-पौधो के कारण ही यह धरती मानव विकास के याग्य बन सकी है। नीलकंठ वृक्षों के कार्बन डाई आक्साइड का विष पीकर ऐसी कीमियागिरि दिखायी वृक्ष को अमृतोपम फलों में बदल दिया और उपर से बांट दी प्राण वायु आक्सीजन, जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना की जा सकी।

वनों के इस उपकार का रूपयों में हिसाब लगायें तो एक पेड़ मानव को लगभग 16 लाख रूपये का फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर पृथ्वी पर बरसता है और इससे फसलें उगायी जाती हैं। पेड़ पौधे की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती है। पेड़ के कटते ही धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। हरे चीर से विहीन नंगी जमीन की उपजाऊ मिट्टी को तेज बौछार का पानी बहा ले जाता है। पेड़ों के ढाल के बिना पानी की तेज धाराएं पहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबोती चली जाती है। हर साल बाढ़ का पानी 600 करोड़ टन मिट्टी बहा ले जाता हे। बंगाल की खाड़ी में ऐसे मिट्टी के जमा होने से एक नया द्वीप उभर आया है। मिट्टी के इस भयावह कटाव और बहाव को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण।

मिट्टी, पानी और बयार, ये तीन उपकार हैं वनों के हम पर। इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से पेड़ों की पूजा होती आयी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हर साल ‘वन महोसव‘ मनाकर बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने का अभियान चलाया गया है। 12 अप्रेल सन् 1972 को विज्ञान और प्रौद्योगिक विभाग के अधीन पर्यावरण नियोजन के समन्वय की एक राष्ट्रीय समिति बनायी गयी थी। 01 नवंबर 1980 को पर्यावरण विभाग मनाया गया। 25 अगस्त 1980 को केन्द्रिय वानिकी बोर्ड की बैठक को सम्बोधित करते हुए तत्कालीन प्रधान मंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा था-‘ पर्यावरण रक्षा और विकास के बीच कोई बैर है। हम वनों के उपर आधारित उद्योग जैसे कागज बनाने के कारखानें रख सकते हैं और ताजी हवा पैदा करने वाले कुदरती कारखानें यानी जंगल भी रख सकते हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि जितने पेड़ काटो, उससे ज्यादा लगाओ और वन विकास और औद्योगिक विकास की योजनाएं बहुत सोच समझ कर बनायी और चलायी जाये। यूरोप के देशों ने करीब करीब फिर जंगल उगा लिए हैं, हमें भी ऐसा करना चाहिए।‘ तभी हमारा अस्तित्व बना रहेगा।

लेखक सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर हैं एवं संस्कृति के अध्येता है।

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