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संघ और प्रचारक जीवन को समझने की दृष्टि देता है ‘तत्वमसि’ उपन्यास – पुस्तक चर्चा

उमेश कुमार चौरसिया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक जीवन, उसके आदर्शों, त्याग, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठ चिंतन को निकट से समझने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए प्रबुद्ध प्रचारक एवं लेखक श्रीधर पराड़कर द्वारा रचित आत्मकथात्मक उपन्यास तत्वमसि अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। यह उपन्यास केवल साहित्यिक रचना भर नहीं, बल्कि प्रचारक जीवन के भोगे हुए यथार्थ, संघर्ष, संवेदना और राष्ट्रसमर्पित जीवन-दृष्टि का जीवंत दस्तावेज भी प्रतीत होता है।

उपन्यास का कथानायक परितोष बाबू अपनी रेलयात्रा के माध्यम से पाठक को जीवन के अनेक अनुभवों, वैचारिक संघर्षों और संगठनात्मक संस्कारों से परिचित कराता है। यह यात्रा वस्तुतः लेखक के स्वयं के जीवनानुभवों का प्रतीक बन जाती है। कथा आगे बढ़ते हुए संघ कार्य, शाखा जीवन, सामाजिक समरसता, राष्ट्रभाव और प्रचारक के निस्वार्थ समर्पण को सहज रूप में उद्घाटित करती है। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी रोचकता है। प्रत्येक प्रसंग पाठक में अगला पृष्ठ पढ़ने की उत्सुकता बनाए रखता है।

‘तत्वमसि’ शब्द सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद के महावाक्य का अंश है, जिसका अर्थ है ‘तुम वही हो’। यह भारतीय अद्वैत दर्शन के उस चिंतन को अभिव्यक्त करता है जिसमें समस्त मानवता को एक ही चेतना का स्वरूप माना गया है। यही भाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूल चिंतन और उसके ध्येय में भी दिखाई देता है। उपन्यास इसी अभेद दृष्टि को कथा के माध्यम से प्रस्तुत करता है।

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आज के समय में जब अनेक हिंदी उपन्यासों में निराशा, अकेलापन और अवसाद की मनोभूमि प्रमुखता से दिखाई देती है, तब ‘तत्वमसि’ आशा, कर्तव्यबोध, राष्ट्रप्रेम और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का संदेश देने वाला उपन्यास बनकर सामने आता है। यह पाठकों को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि जीवन के उद्देश्य, समाज के प्रति दायित्व और आत्मानुशासन पर गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित करता है। विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए यह उपन्यास संघ और प्रचारक जीवन के अनेक अनजाने पहलुओं को समझने का अवसर प्रदान करता है।

कृति की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और संवेदनात्मक है। लेखक ने कहीं भी उपदेशात्मक शैली का सहारा नहीं लिया, बल्कि घटनाओं और पात्रों के माध्यम से विचारों को स्वाभाविक रूप से उभरने दिया है। यही कारण है कि यह उपन्यास सामान्य पाठकों से लेकर वैचारिक साहित्य में रुचि रखने वालों तक सभी को प्रभावित करता है।

डाॅ. सुशीलचंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ की ये पंक्तियां भी इस कृति के भाव को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं—

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“युग-युग ‘प्रचारकों’ का चिंतन, दिव्य ‘तत्वमसि’ गाएगा।
मानवता के लिए समर्पित, राष्ट्रव्रती बन पाएगा।।“

यह उपन्यास संघ के सौ वर्षीय वैचारिक और सामाजिक प्रवास को समझने के लिए भी उपयोगी कृति सिद्ध होता है।

उमेश कुमार चौरसिया

पुस्तक परिचय :
पुस्तक : तत्वमसि
लेखक : श्रीधर पराड़कर
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ : 176
मूल्य : ₹350