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मानवता के दीपक : पद्म श्री दामोदर गणेश बापट

आचार्य ललित मुनि

कुछ लोग इस संसार में आते हैं, अपना जीवन जीते हैं और बिना किसी विशेष पहचान के समय के प्रवाह में विलीन हो जाते हैं। वहीं कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपने जाने के बाद भी अपने कार्यों की उजली छाप छोड़ जाते हैं। वे अपने पीछे ऐसी रोशनी छोड़ जाते हैं जो उन अंधेरे कोनों तक पहुँचती है जहाँ सामान्यतः समाज की दृष्टि नहीं जाती। दामोदर गणेश बापट ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उनका जीवन किसी बड़े पद, प्रतिष्ठा या वैभव से नहीं बल्कि सेवा, करुणा और निस्वार्थ समर्पण से परिभाषित होता है। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण उन लोगों के लिए समर्पित कर दिया जिन्हें समाज ने उपेक्षित कर दिया था।

दामोदर गणेश बापट का जन्म सन् 29 अप्रैल 1934 या 1935 में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के पाथरोट नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध नहीं था, किन्तु संस्कारों की दृष्टि से वह अत्यंत समृद्ध था। उनके पिता रेलवे में कार्यरत थे और वे अपने तीन पुत्रों में सबसे छोटे थे। बचपन से ही उनके भीतर संवेदनशीलता और सेवा का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।

उनके जीवन पर स्वामी विवेकानंद के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। विवेकानंद का यह संदेश कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है, उनके हृदय में गहराई से बैठ गया। यही विचार उनके जीवन की दिशा तय करने में निर्णायक सिद्ध हुआ।उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और कला तथा वाणिज्य दोनों विषयों में डिग्री प्राप्त की। वे मेधावी थे, समझदार थे और उनके सामने जीवन में अनेक संभावनाएँ थीं। उन्होंने कुछ समय तक विभिन्न नौकरियों में भी हाथ आजमाया, किन्तु उन्हें हर बार एक अधूरापन महसूस होता रहा। उनके भीतर एक ऐसी बेचैनी थी जो उन्हें लगातार यह संकेत दे रही थी कि उनका जीवन किसी और उद्देश्य के लिए बना है।

पिता के निधन के बाद उनके जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया। परिस्थितियाँ कठिन हुईं, किन्तु इसी कठिनाई ने उन्हें आत्ममंथन का अवसर भी दिया। उन्होंने अपने भीतर झांककर यह समझने का प्रयास किया कि उनका वास्तविक कर्तव्य क्या है। यही वह समय था जब उन्होंने अपने जीवन की दिशा बदलने का निर्णय लिया। सन् 1970 में उन्होंने महाराष्ट्र को छोड़कर तत्कालीन मध्यप्रदेश के जशपुर जिले की ओर प्रस्थान किया, जो आज छत्तीसगढ़ का हिस्सा है। वहाँ उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम के साथ जुड़कर आदिवासी क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने बच्चों को पढ़ाया और समाज के वंचित वर्ग के बीच रहकर उनके जीवन को समझने का प्रयास किया।

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इसी दौरान उनका साक्षात्कार उस पीड़ा से हुआ जो उनके जीवन का उद्देश्य बन गई। जशपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में उन्होंने ऐसे लोगों को देखा जिन्हें समाज ने पूरी तरह से बहिष्कृत कर दिया था। ये लोग कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। वे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत पीड़ित थे। समाज उन्हें घृणा की दृष्टि से देखता था, उनसे दूरी बनाता था और उन्हें अपने जीवन से अलग कर देता था। बापट जी ने इन लोगों के भीतर छिपे दर्द को महसूस किया। उन्होंने केवल बीमारी को नहीं देखा, बल्कि उस अपमान और अकेलेपन को भी देखा जो इन लोगों को हर दिन झेलना पड़ता था। यही वह क्षण था जब उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अपना जीवन इन लोगों की सेवा में समर्पित करेंगे।

इस दिशा में उनका जुड़ाव भारतीय कुष्ठ निवारक संघ से हुआ, जिसकी स्थापना डॉ. सदाशिव काटरे ने सन् 1962 में की थी। यह संस्था जांजगीर चांपा क्षेत्र में कुष्ठ रोगियों के उपचार और पुनर्वास के लिए कार्य कर रही थी। सन् 1972 में बापट जी इस संस्था से जुड़े और सन् 1975 में वे इसके सचिव बने। इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह से सेवा के मार्ग पर अग्रसर हो गया। उन्होंने न केवल रोगियों का उपचार सुनिश्चित किया बल्कि उनके जीवन को सम्मानजनक बनाने के लिए भी अनेक प्रयास किए। उन्होंने यह समझा कि केवल चिकित्सा पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में स्वीकृति और आत्मसम्मान भी उतना ही आवश्यक है।

कुष्ठ रोग, जिसे लेप्रोसी के नाम से जाना जाता है, माइकोबैक्टीरियम लेप्रे नामक जीवाणु के कारण होता है। यह त्वचा और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और यदि समय पर उपचार न मिले तो विकृति का कारण बन सकता है। भारत ने वर्ष 2000 में इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त घोषित कर दिया, किन्तु इसके साथ जुड़ा सामाजिक कलंक समाप्त नहीं हुआ। कुष्ठ रोगियों को समाज में तिरस्कार का सामना करना पड़ता था। उन्हें परिवार से अलग कर दिया जाता था, सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोका जाता था और कई बार उनके साथ अमानवीय व्यवहार भी किया जाता था।

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बापट जी ने इस मानसिकता को बदलने का प्रयास किया। उन्होंने रोगियों के साथ बैठकर भोजन किया, उनके साथ समय बिताया और उन्हें यह एहसास दिलाया कि वे समाज के अभिन्न अंग हैं। उनका यह व्यवहार उस समय एक क्रांतिकारी कदम था जब लोग कुष्ठ रोगियों के पास जाने से भी डरते थे। उनके नेतृत्व में आश्रम का व्यापक विकास हुआ। यह केवल एक अस्पताल नहीं रहा बल्कि एक समग्र पुनर्वास केंद्र बन गया। यहाँ रोगियों के लिए चिकित्सा सुविधा के साथ साथ शिक्षा, प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता के अवसर भी उपलब्ध कराए गए।

आश्रम में विद्यालय, छात्रावास, कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र और सिलाई केंद्र स्थापित किए गए। रोगियों को विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। आश्रम में कृषि कार्य भी किया जाता था, जिससे भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित होती थी और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता था। बापट जी ने विशेष रूप से रोगियों के बच्चों की शिक्षा और देखभाल पर ध्यान दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि स्वस्थ बच्चे समाज की मुख्यधारा से जुड़े रहें और उन्हें अपने माता पिता की बीमारी का दुष्प्रभाव न झेलना पड़े।

उनके प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया। एक अनुमान के अनुसार उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 26000 कुष्ठ रोगियों के जीवन को प्रभावित किया। यह केवल एक संख्या नहीं बल्कि हजारों परिवारों की नई शुरुआत की कहानी है। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया, जो भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह सम्मान उन्हें वर्ष 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा प्रदान किया गया।

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इसके अतिरिक्त उन्हें विवेकानंद सेवा पुरस्कार, भाऊराव देवरस सेवा स्मृति पुरस्कार, छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण और देवी अहिल्याबाई राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इन सभी सम्मानों के बावजूद उनके भीतर विनम्रता बनी रही। उन्होंने हमेशा यह कहा कि भारत में जन्म लेना ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। उन्होंने कभी किसी पुरस्कार की इच्छा नहीं की और न ही उसके लिए प्रयास किया। सन् 2019 में उनके जीवन की अंतिम यात्रा प्रारंभ हुई। जुलाई महीने में उन्हें मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। 17 अगस्त 2019 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया।

उनका जाना भी उतना ही प्रेरणादायक था जितना उनका जीवन। उन्होंने अपने शरीर को चिकित्सा शिक्षा के लिए दान कर दिया था, जिससे भविष्य के चिकित्सकों को सीखने में सहायता मिल सके। उनके निधन पर समाज के विभिन्न वर्गों ने शोक व्यक्त किया। राज्यपाल अनुसुइया उइके ने कहा —

“उन्होंने अपना जीवन दूसरों की सेवा में, मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया। श्री बापट ने कुष्ठ रोगियों की सेवा करके जो अनुकरणीय कार्य किया, वह सदा दूसरों को प्रेरित करता रहेगा।”

आज के समय में जब सेवा को अक्सर प्रचार और प्रदर्शन से जोड़ा जाता है, बापट जी का जीवन हमें सच्ची सेवा का अर्थ समझाता है। उन्होंने बिना किसी दिखावे के, बिना किसी अपेक्षा के और बिना किसी स्वार्थ के सेवा की। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सेवा केवल एक कार्य नहीं बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि संकल्प मजबूत हो और हृदय में करुणा हो तो एक व्यक्ति भी हजारों जीवनों में परिवर्तन ला सकता है। दामोदर गणेश बापट एक नाम नहीं बल्कि एक प्रेरणा हैं। उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि समाज के सबसे कमजोर और उपेक्षित वर्ग की सेवा ही सच्ची मानवता है। उनकी विरासत आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। ऐसे महान व्यक्तित्व को शत शत नमन।

लेखक वरिष्ठ  पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।