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वैष्णव परंपरा में मोहिनी एकादशी व्रत का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

आचार्य ललित मुनि

वैष्णव परंपरा में एकादशी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वर्ष के बारह महीनों में चौबीस एकादशियाँ आती हैं और प्रत्येक एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना माहात्म्य है। इन चौबीस एकादशियों में वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ी है और इसका माहात्म्य स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था। वाल्मीकि रामायण में भी इस एकादशी का उल्लेख मिलता है, जहाँ महर्षि वशिष्ठ ने राजा श्रीराम को इस व्रत का महत्व बताया था।

एकादशी का शाब्दिक अर्थ है ग्यारहवीं तिथि। प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है और इस दिन उपवास रखना, विष्णु का स्मरण करना और रात्रि जागरण करना वैष्णव परंपरा का अभिन्न अंग है। मोहिनी एकादशी विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैशाख माह स्वयं भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इस माह की एकादशी को दोहरा पुण्य मिलता है।

मोहिनी अवतार और एकादशी का संबंध

मोहिनी एकादशी का सीधा संबंध भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से है। समुद्र मंथन की कथा पुराणों में विस्तार से वर्णित है। देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया। इस मंथन से अमृत निकला किंतु असुर उस अमृत को देवताओं को नहीं देना चाहते थे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। मोहिनी रूप में वे एक अत्यंत सुंदर स्त्री बने जिसकी सुंदरता से मोहित होकर असुर अमृत का पात्र उनके हाथों में दे बैठे और भगवान ने वह अमृत देवताओं को पिला दिया।

“ततो देवासुराः सर्वे मोहिता मोहिनीमया।
विष्णोस्तु मायया मोहात् अमृतं देवता ययुः॥”
श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 9

यह अवतार केवल शारीरिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं था। मोहिनी अवतार भगवान की उस माया शक्ति का प्रतीक है जो अज्ञान को नष्ट करती है और सत्य की स्थापना करती है। मोहिनी एकादशी इसी माया शक्ति की अराधना का दिन है। इस दिन जो व्यक्ति उपवास और भगवान के स्मरण में अपना समय लगाता है, वह इस संसार की मोहमाया से मुक्त होने की दिशा में एक कदम बढ़ाता है।

“मोहिनी एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि उस माया से मुक्ति की साधना है जो मनुष्य को परमात्मा से दूर रखती है।”

पुराणीय कथा: राजा धृतिमान और भगवान का वरदान

मोहिनी एकादशी की मुख्य कथा भविष्योत्तर पुराण में मिलती है जो महाभारत के अंतर्गत आता है। यह कथा महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर को सुनाई थी जब युधिष्ठिर ने पूछा कि वैशाख शुक्ल एकादशी का क्या महत्व है और इसे क्यों करना चाहिए।

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कथा के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की नगरी थी जहाँ धृतिमान नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे धर्मनिष्ठ और प्रजापालक राजा थे। उनके पाँच पुत्र थे जिनमें सबसे छोटे का नाम धृष्टबुद्धि था। धृष्टबुद्धि अत्यंत दुराचारी था। वह मांस भक्षण, मदिरापान, जुआ, परस्त्रीगमन और अन्य अनेक पापों में लिप्त था। उसके कुकर्मों से व्यथित होकर राजा धृतिमान ने उसे राज्य से निष्कासित कर दिया।

निर्वासित धृष्टबुद्धि वन वन भटकता रहा। भूख प्यास से व्याकुल वह अनेक कष्ट उठाता रहा। अंत में वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम में पहुँचा। महर्षि ने उसकी दीन दशा देखी और पूछा कि तुम कौन हो और यहाँ कैसे आए। धृष्टबुद्धि ने अपनी सारी कथा सुनाई और महर्षि के चरणों में गिरकर मुक्ति का मार्ग माँगा।

“वैशाखे शुक्लपक्षे तु एकादशी मोहिनी स्मृता।
तस्याः व्रतं नरो भक्त्या कुर्वन्मुक्तिमवाप्नुयात्॥”
भविष्योत्तर पुराण, मोहिनी एकादशी माहात्म्य

महर्षि कौण्डिन्य ने धृष्टबुद्धि को मोहिनी एकादशी का व्रत करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे और तुम्हें भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होगी। धृष्टबुद्धि ने पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए और अंत में उसे विष्णुलोक की प्राप्ति हुई। यह कथा यह संदेश देती है कि भगवान की भक्ति और उनके व्रत का पालन पूर्व के पापों को भी नष्ट कर सकता है।

वाल्मीकि रामायण में मोहिनी एकादशी का उल्लेख

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में एक प्रसंग मिलता है जिसमें महर्षि वशिष्ठ ने राजा श्रीराम को मोहिनी एकादशी का महत्व बताया था। इस प्रसंग में श्रीराम ने महर्षि से पूछा था कि वे कौन सा ऐसा व्रत बताएँ जो इस लोक में सुख और परलोक में मुक्ति दे। तब वशिष्ठ जी ने मोहिनी एकादशी का वर्णन किया।

“एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि।
विशेषतो वैशाखस्य शुक्लपक्षे च मोहिनी॥”
वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड (परंपरागत पाठ)

यह उल्लेख इस एकादशी की प्राचीनता और महत्व को प्रमाणित करता है। जब स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम राम को इस व्रत का विधान बताया गया, तो इस व्रत का महत्व स्वयंसिद्ध हो जाता है। वैष्णव परंपरा इस बात पर विशेष बल देती है कि राम और कृष्ण दोनों ही विष्णु के अवतार हैं और दोनों ने ही इस व्रत को स्वीकार किया।

महाभारत में युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद

मोहिनी एकादशी की कथा का सबसे विस्तृत वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व और भविष्य पुराण में मिलता है। इस संवाद में युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से एकादशी के महत्व के बारे में पूछा था। श्रीकृष्ण ने बताया कि जो व्यक्ति इस एकादशी को विधिपूर्वक उपवास करता है, उसे एक हजार गायों के दान का फल मिलता है।

“मोहिन्याम् एकादश्यां यः करोति उपवासनम्।
स मुच्यते सर्वपापैः विष्णुलोकं स गच्छति॥”
भविष्योत्तर पुराण, श्रीकृष्ण युधिष्ठिर संवाद

इस संवाद में श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि इस एकादशी के व्रत का फल अश्वमेध यज्ञ के फल के समान है। यह तुलना इस व्रत की महत्ता को रेखांकित करती है। वैष्णव आचार्य इस पर विशेष टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि यज्ञ के लिए धन, सामग्री और विस्तृत विधान की आवश्यकता होती है, जबकि एकादशी का व्रत निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी कर सकता है। इस प्रकार भगवान ने सबके लिए मुक्ति का द्वार खोल दिया।

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व्रत की विधि: वैष्णव आगम और स्मृति परंपरा

दशमी की तैयारी एकादशी उपवास द्वादशी पारण

वैष्णव परंपरा में मोहिनी एकादशी के व्रत की विधि अत्यंत व्यवस्थित है। यह व्रत वास्तव में दशमी की संध्या से प्रारंभ होता है। दशमी के दिन संध्याकाल में सात्विक भोजन करना चाहिए और मांस, मसूर, चना, शहद और बासी अन्न का त्याग करना चाहिए। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है।

एकादशी के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना चाहिए। तिल मिश्रित जल से स्नान को विशेष महत्व दिया गया है। स्नान के पश्चात भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प में यह कहा जाता है कि हे भगवन, मैं आज मोहिनी एकादशी का व्रत कर रहा हूँ, आप मुझे इसे पूर्ण करने की शक्ति दें।

व्रत में निषिद्ध वस्तुएँ

स्मृति ग्रंथों के अनुसार एकादशी को चावल, गेहूँ की रोटी, दाल और अन्न का सेवन वर्जित है। फल, दूध, दही, मेवे और कंदमूल खाए जा सकते हैं। जो लोग पूर्ण निर्जला व्रत करते हैं वे जल भी ग्रहण नहीं करते। हालाँकि वैष्णव आचार्य कहते हैं कि शरीर की क्षमता के अनुसार व्रत करना चाहिए।

दिन भर भगवान विष्णु के नाम का जप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। तुलसी की पूजा इस दिन विशेष रूप से की जाती है क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।

“तुलस्या तुलिता नास्ति तुलसी तुलसी भव।
विष्णोर्मनसि तिष्ठन्ती सर्वपापहरा शुभा॥”
पद्म पुराण, तुलसी माहात्म्य

रात्रि में जागरण करना इस व्रत का महत्वपूर्ण अंग है। रात्रि जागरण में भजन कीर्तन करना, भागवत का पाठ सुनना और भगवान के गुणों का स्मरण करना उचित है। वैष्णव संप्रदाय में मानते हैं कि जो व्यक्ति एकादशी की रात्रि में जागता है वह न केवल इस जन्म के पाप नष्ट करता है बल्कि अनेक पूर्व जन्मों के कर्मफल से भी मुक्त होता है।

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द्वादशी के दिन ब्राह्मण मुहूर्त में अर्थात सूर्योदय के पश्चात पारण करना चाहिए। पारण में पहले तुलसी दल और जल ग्रहण करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान देकर स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। पारण का समय निर्धारित होता है और उसके बाद पारण करना शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता।

वैष्णव संप्रदायों में मोहिनी एकादशी

भारत के चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों में मोहिनी एकादशी को विशेष महत्व दिया जाता है। रामानुजाचार्य के श्री संप्रदाय में एकादशी के दिन तिरुप्पावई और अन्य आलवार प्रबंधों का पाठ किया जाता है। तमिलनाडु के वैष्णव मंदिरों में इस दिन विशेष उत्सव होता है।

माध्वाचार्य के द्वैत वेदांत के अनुयायी उडुपी और दक्षिण कर्नाटक में इस एकादशी को अत्यंत श्रद्धा से मनाते हैं। माध्व संप्रदाय में एकादशी को पर्युषण के रूप में मनाया जाता है जिसमें उपवास के साथ साथ भजन और प्रवचन होते हैं। उडुपी के श्रीकृष्ण मंदिर में इस दिन विशेष सेवा और अभिषेक होता है।

वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग में प्रत्येक एकादशी का विशेष महत्व है। वृंदावन और मथुरा के वल्लभ संप्रदाय के मंदिरों में मोहिनी एकादशी के दिन भगवान श्रीनाथजी की विशेष सेवा होती है। इस दिन भगवान को विशेष वस्त्र, आभूषण और भोग अर्पित किए जाते हैं।

गौड़ीय वैष्णव परंपरा में जो श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं पर आधारित है, एकादशी को हरि वासर कहते हैं। इस्कॉन के मंदिरों में विश्व भर में मोहिनी एकादशी के दिन विशेष भजन कीर्तन, भागवत प्रवचन और एकादशी व्रत कथा का आयोजन होता है।

“एकादश्यां हरेर्नाम जप्यं सर्वफलप्रदम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन एकादश्यां जपेत्तरेः॥”
पद्म पुराण, उत्तरखंड, एकादशी माहात्म्य

आध्यात्मिक दृष्टि: मोह से मुक्ति का पर्व

मोहिनी एकादशी का नाम गहरे आध्यात्मिक अर्थ से भरा है। मोहिनी का अर्थ है वह जो मोहित करे, जो माया का विस्तार करे। और एकादशी का व्रत इसी माया के आवरण को हटाने का प्रयास है। वैष्णव दार्शनिकों की व्याख्या में यह व्रत एक प्रतीकात्मक क्रिया है जिसमें साधक अपनी इंद्रियों को संसार की ओर से हटाकर परमात्मा की ओर मोड़ता है। रामानुजाचार्य ने अपने श्रीभाष्य में एकादशी के उपवास को चित्त की शुद्धि का साधन बताया है। उनके अनुसार जब हम भोजन का त्याग करते हैं तो इंद्रियों की तृप्ति की आदत टूटती है और मन ईश्वर की ओर मुड़ता है।