क्या बंगाल में ममता युग अवसान की ओर बढ रहा है?

क्या ममता बनर्जी का बंगाल का किला दरक रहा है, क्या बंगाल की राजनीति में एक ऐसा दौर आ गया है जिसकी कल्पना कुछ साल पहले असंभव लगती थी। वह नेत्री जिसने 34 वर्षों की वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका, जिसने 2011 में बंगाल को एक नया अध्याय दिया, जो 2021 में भारतीय जनता पार्टी की पूरी ताकत के सामने अडिग खड़ी रही और 215 सीटें जीतीं, वही ममता बनर्जी आज एक ऐसे राजनीतिक भँवर में फँसती दिख रही हैं जहाँ से निकलना उनके लिए अत्यंत कठिन होता जा रहा है।
2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को केवल 80 सीटें मिली हैं। यह संख्या अपने आप में उनके पतन की कहानी कहती है, क्योंकि 2021 की 215 सीटों से 80 सीटों पर आना महज एक चुनावी हार नहीं है, यह एक जनादेश है, एक जनाक्रोश है, जो ममता के भतीजे के प्रति लोगों में दिखाई देता है। लेकिन असली संकट इसके बाद शुरू होता है।
6 मई को जब पहली बार दस विधायकों ने पार्टी की बैठक में अनुपस्थिति दर्ज कराई, तो इसे सामान्य नाराजगी समझकर नजरअंदाज किया जा सकता था। बंगाल की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं थी। लेकिन 13 मई को जब यह संख्या 35 हो गई, तब संकेत स्पष्ट था कि यह कोई व्यक्तिगत असंतोष नहीं, बल्कि एक संगठित असहमति है। 31 मई को 60 विधायकों की अनुपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि दल के भीतर कुछ गहरा टूट चुका है। और 2 जून को जब 77 विधायकों के साथ 26 सांसद भी नेतृत्व से दूरी बनाकर खड़े हो गए, तो यह तृणमूल कांग्रेस का संकट नहीं रहा, यह ममता बनर्जी के राजनीतिक अस्तित्व का संकट बन गया।
इससे घटनाक्रम से दिखाई देता है कि चुनाव परिणाम आने के बाद से ही ममता के विधायकों में खलबली मची हुई है। बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सार्वजनिक बयान दिया है कि तृणमूल के कई विधायकों का फ़ोन आ रहा है और वे भाजपा में प्रवेश लेना चाहते हैं, लेकिन हम उन्हें भाजपा में प्रवेश नहीं देंगे। इसके बाद लगता है तृणमूल के विधायकों ने अलग रास्ता निकाल लिया है।
तृणमूल से निष्काषित पूर्व प्रवक्ता रिजुदत्ता ने सार्वजनिक बयान दिया है कि तृणमूल के विधायक नई पार्टी बना सकते हैं। तृणमूल के विधायक कुणाल घोष के नेतृत्व में होटल गेटवे और एमएलए रेस्ट हाउस में लगभग 50 बगावती विधायकों की बैठक हो चुकी है, जो असली तृणमूल के नाम से पार्टी बनाना चाहते हैं। इसके साथ ही उसने कहा है, स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि पचास विधायक, विधानसभा अध्यक्ष को चिट्ठी देने वाले हैं, उनकी तरफ़ से ॠतब्रत बंदोपाध्याय को विधान सभा में विपक्ष का नेता बनाया जाए।
इस तरह बंगाल तृणमूल में बड़ी टूट हो सकती है। एक चैनल ने यह भी दावा किया है कि 77 विधायक और 26 सांसद मिलकर एक नया राजनीतिक मंच खड़ा करते हैं। संख्याबल देखें तो 80 में से 77 विधायक अर्थात उनके पास पार्टी का लगभग संपूर्ण जनप्रतिनिधित्व है। रिजुदत्ता ने बताया कि ये विधायक पार्टी के चुनाव चिन्ह पर भी अपना दावा प्रस्तुत करेंगे। इस तरह पूरी तृणमूल खत्म होने कगार पर है।
भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे उदाहरण नहीं हैं जहाँ कोई नेता इतने बड़े पैमाने पर विद्रोह के बाद वापसी कर सका हो। 1969 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस तोड़ी थी, लेकिन तब वे सत्ता में थीं और उनके साथ जनता थी। 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई, लेकिन तब भी उनके साथ एक संगठित शक्ति थी। यहाँ स्थिति उलटी है। ममता बनर्जी के पास अब न सत्ता है, न संख्या, और न संगठन। क्योंकि चुनाव में हार के बाद तृणमूल के संगठन के लोग जनता के डर से उसके सामने जाने से बच रहे हैं
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 2011 से 2026 तक का ममता युग बंगाल के लिए एक निर्णायक काल रहा। इस दौर में बंगाल ने वामपंथी शासन की जड़ता से मुक्ति पाई, औद्योगिक विकास के नए प्रयास हुए, महिला सशक्तीकरण की योजनाएँ लागू हुईं, और बंगाल ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका स्थापित की। लेकिन इसी दौर में सारदा चिटफंड घोटाला, नारद स्टिंग, शिक्षक भर्ती घोटाला और सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं द्वारा हिंसा, कटमनी, तोलाबाजी जैसे आरोप सामने आए। 2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड ने बंगाल की जनता के मन में एक ऐसा आक्रोश पैदा किया जो 2026 के जनादेश में प्रतिबिंबित हुआ।
यदि तृणमूल टूटती है, तो ममता बनर्जी के सामने कुछ मूलभूत प्रश्न खड़े होंगे। क्या वे पुनः जमीन से संगठन खड़ा कर सकती हैं, जैसा उन्होंने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल बनाते समय किया था। उस समय वे 44 वर्ष की थीं, उनके पास ऊर्जा थी, समय था, और जनता में भारी आक्रोश था वामपंथियों के विरुद्ध। आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं, पर आज ऐसा होता दिखाई नहीं देता। बंगाल में जिस तरह प्रचूर मात्रा में वोट मिला है, उससे तो स्पष्ट है कि अब बंगाल की जनता ममता को कोई मौका नहीं देना चाहती।
हालांकि राजनीति में कुछ भी अंतिम नहीं होता, पर ममता बनर्जी की राजनीतिक वापसी कठिन है, राजनीति में कुछ भी अंतिम नहीं होता, लेकिन जब 80 में से एक बड़ी संख्या में विधायक एक साथ पीठ फेर लें और एक नया मंच खड़ा करें, तो वह नेता के लिए महज एक झटका नहीं होता, वह एक युग का समापन होता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

