हिन्दुत्व की पिच पर विपक्ष: रणनीति बदली है या हार का डर?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जिन राजनीतिक दलों ने दशकों तक हिन्दुत्व को भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति बताकर उसका विरोध किया, उन्हीं दलों के नेता अब मंदिरों की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, संतों से आशीर्वाद ले रहे हैं, अपनी धार्मिक पहचान सार्वजनिक कर रहे हैं और सनातन की नई राजनीतिक व्याख्याएं प्रस्तुत कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का यह कहना कि “जो सनातन है, वही समाजवाद है”, इसी बदलाव का ताजा उदाहरण है।
सवाल यह नहीं है कि अखिलेश यादव धार्मिक हैं या नहीं, और न ही यह कि किसी विपक्षी नेता को मंदिर जाना चाहिए या नहीं। भारत में आस्था कभी राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं रही। असली सवाल यह है कि चुनावों की आहट के साथ विपक्ष को अचानक हिन्दुत्व की भाषा बोलने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
इसका सीधा उत्तर है कि भाजपा ने भारतीय राजनीति का वैचारिक केंद्र बदल दिया है। विपक्ष अब चुनाव में भाजपा को पराजित करने से पहले उसकी बनाई हुई राजनीतिक शब्दावली के भीतर अपने लिए जगह खोजने को विवश दिखाई देता है। यही भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक सफलता और विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता है।
एक समय भाजपा को राम मंदिर, अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे विषयों पर सफाई देनी पड़ती थी। आज स्थिति उलट चुकी है। अब विपक्ष को यह समझाना पड़ रहा है कि वह राम-विरोधी नहीं है, सनातन-विरोधी नहीं है, और उसकी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिन्दू आस्था का विरोध नहीं है।
भाजपा ने केवल चुनाव नहीं जीते, उसने राजनीतिक शब्दकोश ही बदल दिया है। राम, काशी, मथुरा, सनातन, सभ्यता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अब मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श के स्थायी विषय बन चुके हैं। विपक्ष चाहे इनका समर्थन करे, विरोध करे या इनकी नई व्याख्या प्रस्तुत करे, उसे भाजपा द्वारा तैयार किए गए मैदान पर ही अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ रही है।
अखिलेश यादव का सनातन को समाजवाद से जोड़ना इसी दबाव का परिणाम प्रतीत होता है। इसीलिए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के पास बार बार जा रहे हैं, उनकी सभाओं में सपा के नेता दिखाई दे रहे हैं, स्वयं को हिन्दू बताना पड़ रहा है लेकिन भाजपा को हिन्दुत्व और अपनी राजनीति के बीच का संबंध समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
अखिलेश यादव संभवतः सपा की पुरानी “हिन्दू-विरोधी” छवि से बाहर निकलना चाहते हैं, और यह राजनीतिक आवश्यकता समझी भी जा सकती है। लंबे समय तक सपा की पहचान मुस्लिम-यादव समीकरण तक सीमित करके प्रस्तुत की जाती रही। अखिलेश ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का सूत्र देकर इसका विस्तार किया और 2024 के लोकसभा चुनाव में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
लेकिन यदि अब वही विपक्ष “मंदिर बनाम मंदिर”, “सनातन बनाम सनातन” और “हिन्दुत्व बनाम सॉफ्ट हिन्दुत्व” की प्रतिस्पर्धा में उतरता है, तो वह अपनी ही रणनीति को कमजोर कर रहा होगा। हिन्दुत्व को राजनीतिक प्राथमिकता देने वाला मतदाता भाजपा को छोड़कर सपा या कांग्रेस के पास क्यों जाएगा? यदि उसके लिए राम मंदिर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, समान नागरिक संहिता और हिन्दू अस्मिता महत्वपूर्ण हैं, तो भाजपा उसके लिए कहीं अधिक स्वाभाविक विकल्प है।
सपा के लिए हिन्दुत्व की राजनीति एक दोधारी तलवार है। यदि अखिलेश यादव सामाजिक न्याय, जातीय हिस्सेदारी, रोजगार, किसान और युवाओं जैसे प्रश्नों पर चुनाव लड़ते हैं, तो उनके पास भाजपा से अलग राजनीतिक विषय है। लेकिन यदि वे सनातन की प्रामाणिकता की प्रतियोगिता में उतरते हैं, तो सामने केवल भाजपा ही नहीं, योगी आदित्यनाथ भी खड़े मिलेंगे।
दूसरी ओर, सपा का मुस्लिम मतदाता भी प्रश्न पूछ सकता है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से रणनीतिक मतदान करता रहा है — उसने उस दल को समर्थन दिया जिसे भाजपा को हराने में सबसे सक्षम माना गया। इसका सबसे बड़ा लाभ सपा को मिलता रहा है।
यदि मुस्लिम मतदाता को यह महसूस होने लगे कि सपा उसका वोट तो चाहती है, लेकिन उसके प्रश्नों और प्रतिनिधित्व से लगातार दूरी बनाए रखती है, जबकि चुनाव आते ही हिन्दुत्व की प्रतिस्पर्धा में कूद पड़ती है, तो असंतोष स्वाभाविक है। यही असंतोष असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति के लिए अवसर बन सकता है। ओवैसी को उत्तर प्रदेश का पूरा मुस्लिम मत नहीं चाहिए — कई सीटों पर सीमित मत-विभाजन भी परिणाम बदलने के लिए पर्याप्त हो सकता है। ऐसी स्थिति में नुकसान सपा और कांग्रेस को होगा, जबकि लाभ भाजपा को मिलेगा।
कांग्रेस इस प्रयोग से पहले भी गुजर चुकी है। चुनावी मौसम में मंदिर यात्राएं, धार्मिक पहचान का प्रदर्शन और सॉफ्ट हिन्दुत्व की रणनीति बार-बार अपनाई गई, लेकिन इससे भाजपा का हिन्दुत्व-समर्थक मतदाता कांग्रेस के साथ नहीं आया।
बहुजन समाज पार्टी का संकट थोड़ा अलग है। कांशीराम के समय बहुजन राजनीति के पास स्पष्ट लक्ष्य और सक्रिय संगठन था। मायावती ने सामाजिक इंजीनियरिंग के माध्यम से पूर्ण बहुमत की सरकार भी बनाई। आज बसपा के सामने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाए रखने की चुनौती है।
भाजपा ने गैर-जाटव दलित समुदायों में विस्तार किया है, जबकि सपा पीडीए के माध्यम से दलित मतों में जगह बनाने का प्रयास कर रही है। बसपा इन दोनों तरफ से दबाव में है। यदि बसपा निष्क्रिय बनी रहती है, तो उसके सामाजिक आधार में भाजपा और सपा दोनों सेंध लगाते रहेंगे। यदि वह विपक्षी गठबंधन में शामिल होती है, तो उसकी स्वतंत्र पहचान पर प्रश्न उठेगा। और यदि वह अकेले चुनाव लड़ती है, तो कमजोर संगठन के कारण परिणाम उसके पक्ष में लाना कठिन होगा।
बसपा का कमजोर पड़ना विपक्ष की सामूहिक शक्ति में कोई वृद्धि नहीं कर रहा। इसके विपरीत, भाजपा ने बहुजन राजनीति की कमजोरी से बने खाली स्थान का बड़ा हिस्सा अपने सामाजिक गठबंधन में जोड़ लिया है।
असदुद्दीन ओवैसी भाजपा के मुखर आलोचक हैं, लेकिन उनकी चुनावी राजनीति का वास्तविक दबाव भाजपा से कहीं अधिक सपा और कांग्रेस पर पड़ता है।
संक्षेप में कहें तो सपा का विस्तार बसपा को कमजोर करता है, बसपा का पुनरुत्थान सपा के पीडीए समीकरण को चुनौती देगा, कांग्रेस का मजबूत होना क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक जगह घटाएगा, और ओवैसी का विस्तार सपा-कांग्रेस के मुस्लिम आधार को प्रभावित करेगा। यानी विपक्षी दल एक साथ भाजपा से भी लड़ रहे हैं और आपस में भी। इसके विपरीत भाजपा के पास स्पष्ट विचारधारा, मजबूत संगठन, राष्ट्रीय नेतृत्व, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ जैसा स्पष्ट चेहरा, और सरकारी योजनाओं से जुड़ा विशाल लाभार्थी वर्ग है। यही भाजपा की वास्तविक शक्ति है।
विपक्ष यदि हिन्दुत्व को अपनी मुख्य चुनावी रणनीति बनाता है, तो इसके तीन संभावित परिणाम हो सकते हैं। पहला, भाजपा का मूल मतदाता विपक्ष की ओर नहीं आएगा, क्योंकि उसके सामने पहले से ही अधिक पुराना और विश्वसनीय विकल्प मौजूद है। दूसरा, विपक्ष के अपने पारंपरिक मतदाताओं में भ्रम और असंतोष पैदा हो सकता है, विशेषकर मुस्लिम मतदाता अपने स्वतंत्र राजनीतिक विकल्पों पर विचार करना शुरू कर सकता है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, विपक्ष भाजपा से अलग विकल्प प्रस्तुत करने की अपनी क्षमता ही खो देगा। लोकतंत्र में मतदाता को विकल्प चाहिए, प्रतिलिपि नहीं।
भाजपा की सबसे बड़ी सफलता यही है कि विपक्ष अब उससे केवल चुनाव नहीं लड़ रहा, बल्कि उसकी बनाई हुई राजनीतिक भाषा में ही अपनी जगह तलाश रहा है। अखिलेश यादव का “जो सनातन है, वही समाजवाद है” वाला कथन भाजपा की कमजोरी का संकेत नहीं है बल्कि इसे भाजपा के वैचारिक प्रभाव के विस्तार के रूप में ही देखा जाना चाहिए। खिलाड़ी भले विपक्ष के हों, पिच भाजपा की है, देखना यह है कि मैच किस दिशा में जाता है।

