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स्क्रीन पर सिमटता संसार या ज्ञान का विस्तार: पुस्तक का नया युग

आचार्य ललित मुनि

पुस्तक सदैव मानव सभ्यता का सबसे विश्वसनीय साथी रही है। यह ज्ञान का भंडार है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मानव समाज को जोड़ता आया है। जब हम किसी पुरानी पुस्तक को हाथ में लेते हैं, तो उसकी कागजी महक हमें उन दिनों की याद दिलाती है जब पढ़ना एक शांत, गहन और आत्मिक अनुभव हुआ करता था। पुस्तक केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, बल्कि वह विचारों, संवेदनाओं और अनुभवों की एक जीवंत धारा होती है।

किन्तु वर्तमान समय में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज स्क्रीन की चमक धीरे धीरे उन पन्नों का स्थान ले रही है, जिन्हें कभी हमारी उंगलियां स्पर्श करती थीं। यह परिवर्तन केवल माध्यम का परिवर्तन नहीं है, बल्कि पढ़ने की शैली, भावनात्मक जुड़ाव और ज्ञान ग्रहण करने की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव का संकेत है। डिजिटल युग ने पुस्तक को कागज की सीमाओं से मुक्त कर दिया है। अब पुस्तक हर स्थान पर, हर समय उपलब्ध है।

फिर भी यह परिवर्तन कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी उत्पन्न करता है। क्या स्क्रीन पर पढ़ना उतना ही गहरा और संतोषजनक है जितना कागज पर पढ़ना था। क्या पुस्तक का मूल स्वरूप सुरक्षित रहेगा, या वह केवल डेटा का एक रूप बनकर रह जाएगी।

पुस्तक का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। प्रारंभिक समय में ज्ञान को पत्थरों पर उकेरा जाता था। बाद में मिट्टी की पट्टिकाओं का प्रयोग हुआ। भारत में ताड़पत्र और भोजपत्र पर ग्रंथ लिखे जाते थे। मिस्र में पेपिरस के पत्तों पर लेखन किया जाता था। चीन में बांस की पट्टियों पर ज्ञान अंकित किया जाता था।

मध्यकाल में कागज का आविष्कार मानव इतिहास की महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुआ। कागज के माध्यम से ज्ञान का संरक्षण सरल हुआ। इसके बाद जर्मनी के जोहान्स गुटेनबर्ग द्वारा मुद्रण यंत्र का आविष्कार किया गया, जिसने ज्ञान के प्रसार में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। पुस्तकें अधिक संख्या में छपने लगीं और आम लोगों तक पहुंचने लगीं।

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सन् उन्नीसवीं शताब्दी तक पुस्तकें मुख्य रूप से मुद्रित स्वरूप में उपलब्ध थीं। वे अपेक्षाकृत भारी होती थीं और उनका संग्रह करना भी चुनौतीपूर्ण था। इसके बावजूद पुस्तकालयों का विस्तार हुआ और ज्ञान का दायरा बढ़ता गया। बीसवीं शताब्दी में मुद्रण तकनीक और उन्नत हुई, लेकिन स्थान, लागत और पहुंच की सीमाएं बनी रहीं।

इसी बीच डिजिटल तकनीक के बीज बोए जाने लगे। सन् 1971 में माइकल हार्ट नामक विद्वान ने प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग की शुरुआत की। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा को कंप्यूटर पर टाइप किया, जिसे विश्व की पहली डिजिटल पुस्तक माना जाता है। इस परियोजना का उद्देश्य ज्ञान को निःशुल्क और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना था।

प्रारंभ में यह प्रयास सीमित लोगों तक ही था, लेकिन कंप्यूटर और इंटरनेट के विस्तार के साथ डिजिटल पुस्तकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। हजारों क्लासिक पुस्तकें डिजिटल रूप में उपलब्ध हो गईं। नब्बे के दशक में इंटरनेट के प्रसार ने पुस्तकों को ऑनलाइन साझा करने की प्रक्रिया को सरल बना दिया।

सन् 2007 में अमेजन कंपनी ने किंडल नामक उपकरण प्रस्तुत किया, जिसने डिजिटल पठन को लोकप्रिय बना दिया। यह एक विशेष पठन उपकरण था, जिसमें हजारों पुस्तकें संग्रहित की जा सकती थीं। इसकी स्क्रीन कागज जैसी प्रतीत होती थी, जिससे आंखों पर कम दबाव पड़ता था। इसके बाद डिजिटल पुस्तक बाजार तेजी से विकसित हुआ और पुस्तक केवल कागज तक सीमित न रहकर डिजिटल डेटा के रूप में भी स्थापित हो गई।

डिजिटल पुस्तक के विकास का सबसे बड़ा कारण तकनीकी प्रगति है। इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक वैश्विक गांव में परिवर्तित कर दिया है। स्मार्टफोन ने प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में एक छोटा पुस्तकालय पहुंचा दिया है। अब लोग यात्रा करते समय, विश्राम के समय या रात्रि में भी पुस्तक पढ़ सकते हैं।

डिजिटल पुस्तकों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उनमें खोज की सुविधा उपलब्ध होती है। पाठक किसी भी शब्द को तुरंत खोज सकता है। फॉन्ट का आकार अपनी सुविधा के अनुसार बदला जा सकता है। दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए श्रव्य विकल्प उपलब्ध हैं।

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पर्यावरणीय दृष्टि से भी डिजिटल पुस्तक उपयोगी मानी जाती है, क्योंकि कागज निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई होती है और बड़ी मात्रा में जल तथा रसायनों का उपयोग किया जाता है। डिजिटल माध्यम इन संसाधनों के उपयोग को कम कर सकता है।

वैश्विक स्तर पर डिजिटल पुस्तक बाजार निरंतर बढ़ रहा है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार आने वाले वर्षों में इसका आर्थिक आकार लगातार बढ़ने की संभावना है। भारत में भी युवा पीढ़ी डिजिटल माध्यम पर पढ़ने में रुचि दिखा रही है।

डिजिटल पुस्तकों का सबसे बड़ा लाभ उनकी उपलब्धता है। एक छोटा उपकरण हजारों पुस्तकों को संग्रहित कर सकता है। विद्यार्थियों को भारी बैग लेकर चलने की आवश्यकता नहीं होती। यात्रा करने वाले लोगों के लिए यह सुविधा अत्यंत उपयोगी है।

डिजिटल पुस्तकें प्रायः कम मूल्य पर उपलब्ध होती हैं। कई पुस्तकें निःशुल्क भी मिल जाती हैं। ऑनलाइन खरीदने पर पुस्तक तुरंत उपलब्ध हो जाती है। साझा करना भी सरल होता है। डिजिटल पुस्तकें पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक हो सकती हैं। यदि कागज की खपत कम होती है, तो पेड़ों की कटाई भी कम हो सकती है।

पढ़ने की आदतों में भी परिवर्तन आया है। अब लोग घर, पार्क, बस, ट्रेन या कार्यालय कहीं भी पढ़ सकते हैं। दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए श्रव्य पुस्तकें अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई हैं। प्रकाशन के क्षेत्र में भी परिवर्तन आया है। अब लेखक स्वयं अपनी पुस्तक प्रकाशित कर सकता है। नए लेखकों को अवसर मिल रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से पुस्तकें अधिक लोगों तक पहुंच रही हैं।

डिजिटल पुस्तकों के अनेक लाभ हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। स्क्रीन पर लंबे समय तक पढ़ने से आंखों में थकान हो सकती है। नीली रोशनी का प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। कई अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि कागज पर पढ़ने से समझ अधिक गहरी हो सकती है। पन्ने पलटने से स्मृति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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डिजिटल माध्यम में ध्यान भटकने की संभावना अधिक होती है। पढ़ते समय संदेश या सूचनाएं ध्यान को प्रभावित कर सकती हैं। डिजिटल विभाजन भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा सीमित है। सभी लोगों के पास डिजिटल उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। कॉपीराइट उल्लंघन भी एक चुनौती है। डिजिटल सामग्री की अनधिकृत प्रतिलिपि बनाना आसान होता है, जिससे लेखकों और प्रकाशकों को आर्थिक हानि हो सकती है।

डिजिटल तकनीक ने प्रकाशन उद्योग को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। अब लेखक स्वयं प्रकाशन कर सकते हैं। ऑनलाइन मंचों ने लेखन को अधिक लोकतांत्रिक बना दिया है। क्षेत्रीय भाषाओं में भी लेखन बढ़ा है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की पुस्तकें डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध हो रही हैं। पाठक अब केवल पाठक नहीं रहे, बल्कि वे समीक्षा और चर्चा के माध्यम से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऑनलाइन पुस्तक क्लब और डिजिटल पुस्तकालयों की संख्या बढ़ रही है। इससे ज्ञान तक पहुंच और अधिक आसान हुई है।

भविष्य में पुस्तक का स्वरूप और अधिक उन्नत हो सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखन, संपादन और अनुवाद में सहायता कर रही है। श्रव्य पुस्तकें अधिक सुलभ हो रही हैं। इंटरएक्टिव पुस्तकें विकसित हो रही हैं, जिनमें चित्र, ध्वनि और दृश्य सामग्री शामिल होती है। शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल पुस्तकें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। संभावना है कि भविष्य में कागज और डिजिटल दोनों माध्यम साथ साथ बने रहेंगे। कागज की पुस्तक संग्रह और भावनात्मक जुड़ाव के लिए महत्वपूर्ण रहेगी, जबकि डिजिटल पुस्तक सुविधा और पहुंच के लिए उपयोगी रहेगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।