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एक व्यक्ति नहीं, एक युग थे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

आचार्य ललित मुनि

आज ही 2 जून के दिन सन् 1990 में एक ऐसी विभूति ने इस नश्वर संसार को अलविदा कहा, जिसने अपने 80 वर्षों के जीवन में वह कर दिखाया जिसे सामान्य मनुष्य की कल्पना भी नहीं पकड़ पाती। युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक विचार थे, एक आंदोलन थे, एक युग की करवट थे। उनका जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि जब कोई आत्मा सच्चे संकल्प के साथ मानवता की सेवा में समर्पित हो जाती है, तो वह इतिहास की धारा को मोड़ देती है।

20 सितंबर 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के आंवलखेड़ा ग्राम में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे श्रीराम शर्मा बचपन से ही असाधारण थे। उनके पिता का नाम रूपकिशोर शर्मा था। बालक श्रीराम को मात्र 15 वर्ष की आयु में उनके गुरु स्वामी सर्वेश्वरानंद जी ने दीक्षा दी और उन्हें गायत्री उपासना का मार्ग दिखाया। यह कोई साधारण दीक्षा नहीं थी, यह एक जीवन की दिशा का निर्धारण था।

उनके गुरु ने उन्हें एक संकल्प दिया जिसे उन्होंने जीवन भर निभाया: चौबीस महापुरश्चरण करना, चौबीस लाख गायत्री मंत्र का जाप प्रतिदिन करना और अंततः एक विराट विचार क्रांति का सूत्रपात करना। श्रीराम शर्मा ने यह संकल्प अक्षरशः पूरा किया। 24 वर्षों तक उन्होंने प्रतिदिन 24,000 गायत्री मंत्र का जाप किया। उनका यह साधनाकाल केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के लिए नहीं था, बल्कि वे जानते थे कि भारत और विश्व को एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है।

श्रीराम शर्मा आचार्य का जीवन केवल आश्रम की चहारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। जब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, वे भी उस महायज्ञ में शामिल थे। महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने 1930 के नमक सत्याग्रह में भाग लिया। वे मथुरा जेल में बंद रहे। उनकी गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वे केवल आध्यात्मिकता के पथिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के भी अग्रदूत थे।

उनकी दृष्टि में राजनीतिक स्वतंत्रता तो एक आवश्यक प्रथम चरण था, परंतु वास्तविक स्वतंत्रता तो तब आती है जब मनुष्य के विचार स्वतंत्र हों, जब वह अंधविश्वास, कुरीतियों और सामाजिक विषमताओं की बेड़ियों से मुक्त हो। इसीलिए उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ साथ एक वैचारिक आंदोलन की नींव भी रख दी थी।

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1940 में आचार्यजी ने ‘अखंड ज्योति’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह केवल एक पत्रिका नहीं थी, यह एक मशाल थी जो करोड़ों लोगों के मन में विचार की रोशनी जगाने निकली थी। प्रारंभ में यह पत्रिका एक छोटी सी जुगत से निकलती थी, किंतु धीरे धीरे इसने लाखों पाठकों तक अपनी पहुँच बना ली। आज भी ‘अखंड ज्योति’ भारत की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली आध्यात्मिक पत्रिकाओं में से एक है।

1953 में उन्होंने ‘युग निर्माण योजना’ का सूत्रपात किया। इस योजना का मूल संदेश था: ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा। हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।’ यह केवल एक नारा नहीं था, यह एक जीवनदर्शन था। उन्होंने माना कि समाज परिवर्तन बाहरी बलप्रयोग से नहीं, बल्कि आंतरिक जागृति से होता है। जब एक एक व्यक्ति अपने भीतर बदलाव लाता है, तभी समूचा समाज बदलता है।

1958 में आचार्यजी ने हरिद्वार के निकट शांतिकुंज की स्थापना की जो आज अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय है। शांतिकुंज केवल एक आश्रम नहीं है, यह एक जीवंत विश्वविद्यालय है जहाँ मनुष्य निर्माण का शिक्षण होता है। यहाँ से प्रतिवर्ष लाखों साधक प्रशिक्षण लेकर जाते हैं और अपने अपने क्षेत्रों में सांस्कृतिक जागरण का कार्य करते हैं।

अखिल विश्व गायत्री परिवार आज विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक संगठनों में से एक है। इसके सदस्य विश्व के 180 से अधिक देशों में फैले हुए हैं। इस परिवार की विशेषता यह है कि यहाँ कोई जाति भेद नहीं, कोई ऊँच नीच नहीं। आचार्यजी ने स्त्री पुरुष समानता पर जोर दिया और महिलाओं को यज्ञोपवीत धारण करने तथा यज्ञ करने का अधिकार दिलाया, जो उस समय के रूढ़िवादी समाज के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।

आचार्य श्रीराम शर्मा की लेखनी की शक्ति अकल्पनीय थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में 3,200 से अधिक पुस्तकों की रचना की। यह संख्या सुनकर ही मन चकित हो जाता है। इन पुस्तकों में आध्यात्मिकता, दर्शन, समाज सुधार, वैज्ञानिक अध्यात्म, नारी शक्ति, युवा चेतना, स्वास्थ्य विज्ञान और जीवन प्रबंधन जैसे असंख्य विषय शामिल हैं। उनकी रचनाएँ संस्कृत, हिंदी सहित अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।

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उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में ‘गायत्री महाविज्ञान’, ‘अखंड ज्योति’, ‘युग की माँग प्रतिभा परिष्कार’ और ‘सुपर साइंस ऑफ गायत्री’ प्रमुख हैं। उन्होंने संपूर्ण वांग्मय के रूप में 108 खंडों में अपने समग्र साहित्य को संकलित किया। यह वांग्मय आज उनके लाखों अनुयायियों के जीवन का पाथेय है। उन्होंने वेद, उपनिषद और गीता को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्यायित किया और यह सिद्ध किया कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

आचार्यजी के जीवन में हिमालय का विशेष महत्व रहा। वे बताते थे कि उनके गुरु ने उन्हें हिमालय की सूक्ष्म लोकों में मार्गदर्शन दिया। उन्होंने सप्तर्षि कुंड और अन्य सिद्धपीठों पर तपस्या की। उनकी यह साधना केवल व्यक्तिगत मोक्ष के लिए नहीं थी, बल्कि एक सामूहिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए थी। उनका मानना था कि एक विशेष समय में पृथ्वी पर एक नया युग आने वाला है जिसमें मनुष्य की चेतना का विकास होगा।

उन्होंने अपने जीवन में दो बार हिमालय की लंबी साधना यात्राएँ कीं। पहली यात्रा 1984 में और दूसरी 1986 में। इन यात्राओं के बाद वे और अधिक तेजस्वी होकर लौटे और उनके कार्य में नई ऊर्जा का संचार हुआ। उनकी पत्नी माता भगवती देवी शर्मा उनकी इस सम्पूर्ण यात्रा में उनकी समान भागीदार रहीं और उन्होंने शांतिकुंज के कार्य को अपनी देखरेख में निरंतर चलाया।

आचार्यजी का सामाजिक दर्शन अत्यंत प्रगतिशील और क्रांतिकारी था। उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया और यह स्पष्ट रूप से कहा कि व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से होनी चाहिए। उन्होंने दहेज प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया और बाल विवाह के विरोध में लिखा। उनका मानना था कि यदि भारत को वास्तव में महान बनाना है तो नारी शक्ति को जागृत करना होगा।

उन्होंने महिलाओं को यज्ञ करने का अधिकार दिलाया, जो परंपरागत रूप से पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था। ‘नारी जागृति अभियान’ के अंतर्गत उन्होंने महिलाओं को शिक्षा, स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया। उनका यह प्रयास उस युग में जब महिलाओं की स्थिति दयनीय थी, एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम था।

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आचार्य श्रीराम शर्मा की एक महत्वपूर्ण देन यह है कि उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के बीच की दूरी पाटी। उनका मानना था कि वास्तविक विज्ञान और वास्तविक अध्यात्म में कोई विरोध नहीं है। उन्होंने गायत्री मंत्र की वैज्ञानिक व्याख्या की। उन्होंने यज्ञ के वायु शुद्धि और मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर शोध करवाए। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना हरिद्वार में इसी उद्देश्य से हुई।

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में आज भी यज्ञ चिकित्सा, प्राणायाम और ध्यान के वैज्ञानिक पहलुओं पर गंभीर अनुसंधान होता है। देश विदेश के वैज्ञानिक यहाँ आकर शोध करते हैं। आचार्यजी ने कहा था कि 21वीं शताब्दी आध्यात्मिकता की शताब्दी होगी और विज्ञान एक दिन यह स्वीकार करेगा कि चेतना ही इस ब्रह्मांड की मूल सत्ता है। आज क्वांटम फिजिक्स और न्यूरोसाइंस जिस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वे उनकी इस दृष्टि को बल देते हैं।

2 जून 1990 का वह दिन जब युगऋषि ने अपना नश्वर शरीर त्यागा, आध्यात्मिक जगत के लिए एक अविस्मरणीय दिन बन गया। उनके अनुयायियों का कहना है कि उन्होंने महाप्रयाण से पहले ही अपने शिष्यों को संकेत दे दिए थे। वे जानते थे कि उनका कार्य पूर्ण हो गया है और अब उन्हें सूक्ष्म रूप में कार्य करना है। उनके अंतिम संस्कार के समय लाखों लोग उपस्थित थे और यह दृश्य किसी बड़े राष्ट्रीय नेता के निधन से कम नहीं था।

उनके महाप्रयाण के 36 वर्ष बाद भी उनका मिशन निरंतर आगे बढ़ रहा है। उनकी पत्नी माता भगवती देवी शर्मा ने उनके बाद इस कार्य को बखूबी संभाला। अब उनके दामाद श्रद्धेय प्रणव पंड्या इस विराट परिवार का नेतृत्व करते हैं। आज गायत्री परिवार के 50 लाख से अधिक सक्रिय सदस्य विश्व के कोने कोने में प्रकाश फैला रहे हैं।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।