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भारतीय वामपंथ का उग्र और माओवादी हिंसक चरित्र

आचार्य ललित मुनि

भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे विशाल लोकतांत्रिक प्रयोग माना जाता है। विविध भाषाओं, संस्कृतियों, आस्थाओं और विचारों से भरे इस देश ने स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को केवल संविधान की पोथी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज के जीवंत व्यवहार का हिस्सा बनाया। इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति रही है विचारों की बहुलता। भारत में दक्षिणपंथ, समाजवाद, गांधीवाद, उदारवाद और वामपंथ, सभी धाराओं को राजनीतिक अभिव्यक्ति का अवसर मिला। किंतु लोकतंत्र की इसी उदारता के भीतर एक ऐसा वैचारिक प्रवाह भी विकसित हुआ, जिस पर समय-समय पर हिंसा, वैचारिक कट्टरता और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देते रहा। यह प्रवाह था भारतीय वामपंथ का एक उग्र और आतंकवादी चेहरा।

भारत में वामपंथी राजनीति का इतिहास स्वतंत्रता से पहले ही प्रारंभ हो चुका था। 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना हुई। प्रारंभिक दौर में वामपंथी आंदोलन मजदूरों, किसानों और आर्थिक विषमता के प्रश्नों को लेकर सक्रिय रहा। औद्योगिक श्रमिकों के अधिकार, जमींदारी प्रथा का विरोध और सामाजिक असमानता के प्रश्नों पर वामपंथ ने महत्वपूर्ण विमर्श खड़ा किया। किंतु स्वतंत्रता के बाद धीरे धीरे भारतीय वामपंथ का एक हिस्सा लोकतांत्रिक राजनीति से आगे बढ़कर क्रांतिकारी हिंसा और वर्ग संघर्ष की दिशा में बढता गया।

1940 और 1950 के दशक में तेलंगाना आंदोलन इसका पहला बड़ा उदाहरण बना। हैदराबाद राज्य में कम्युनिस्ट नेतृत्व में चलाया गया यह आंदोलन आरंभ में किसान विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया गया, किंतु धीरे धीरे इसमें सशस्त्र हिंसा और समानांतर सत्ता स्थापित करने के प्रयास दिखाई देने लगे। स्वतंत्र भारत की सरकार को अंततः सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। यह घटना एक संकेत थी कि भारतीय वामपंथ का एक वर्ग संसदीय लोकतंत्र से अधिक क्रांतिकारी सत्ता परिवर्तन में विश्वास रखता है।

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1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में जो आंदोलन शुरू हुआ, उसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी। चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में प्रारंभ हुए इस आंदोलन ने माओत्से तुंग की विचारधारा से प्रेरणा ली। उनका मानना था कि भारत में संसदीय लोकतंत्र “शोषक वर्गों का उपकरण” है और सशस्त्र क्रांति के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करना ही अंतिम समाधान है। यही आंदोलन आगे चलकर नक्सलवाद कहलाया।

नक्सल आंदोलन के प्रारंभिक वर्षों में कई युवाओं और बुद्धिजीवियों को यह “गरीबों की क्रांति” प्रतीत हुआ। विश्वविद्यालयों के कुछ वर्गों में इसे रोमांटिक क्रांतिकारी आंदोलन की तरह प्रस्तुत किया गया। किंतु शीघ्र ही इसका हिंसक चेहरा सामने आने लगा। पुलिसकर्मियों की हत्याएँ, सरकारी संस्थानों पर हमले, ग्रामीणों को “वर्ग शत्रु” घोषित कर उनकी हत्या, और भय के वातावरण के माध्यम से नियंत्रण स्थापित करना, यह सब आंदोलन का हिस्सा बन गया।

1970 के दशक में पश्चिम बंगाल हिंसक राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन गया। उस दौर में कोलकाता की सड़कों पर राजनीतिक हत्याएँ सामान्य घटना बन गई थीं। अनेक शिक्षण संस्थानों में उग्र वामपंथी गुटों का प्रभाव बढ़ा। विश्वविद्यालय परिसर वैचारिक बहस के स्थान पर कई बार हिंसक टकराव के अखाड़े में बदलते दिखाई दिए। यह विडंबना थी कि जो विचारधारा समानता और स्वतंत्रता की बात करती थी, वही असहमति के प्रति असहिष्णु होती जा रही थी।

बाद के दशकों में भारतीय वामपंथ दो धाराओं में विभाजित दिखाई दिया। एक धारा संसदीय राजनीति में सक्रिय रही, जिसने केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में सरकारें भी चलाईं। दूसरी धारा माओवादी हिंसा की ओर बढ़ती गई। किंतु बुद्धिजीवियों का आरोप रहा कि संसदीय वामपंथ ने भी कई बार उग्र वामपंथी हिंसा के प्रति वैचारिक नरमी दिखाई।

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पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक वाम मोर्चा सरकार का लंबा शासन रहा। इस दौरान राजनीतिक हिंसा और पार्टी आधारित नियंत्रण की संस्कृति भी विकसित हुई। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं की हत्याओं, चुनावी हिंसा और प्रशासनिक तंत्र के राजनीतिकरण के आरोप लगातार लगते रहे। 1979 का मारिचझापी कांड आज भी स्मृतियों में है्। इसी प्रकार 2007 का नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलन भी उल्लेखनीय।

केरल में भी राजनीतिक हिंसा को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। विशेषकर कन्नूर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक संघर्षों का इतिहास बार बार सामने आता रहा। अनेको स्वयंसेवकों एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याओं का उल्लेख हुआ।

भारत में माओवादी हिंसा ने 1990 के दशक के बाद अधिक संगठित रूप लिया। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में माओवादी संगठनों ने अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने स्वयं को “जल, जंगल और जमीन” की लड़ाई लड़ने वाला बताया, किंतु उनके तरीकों में हिंसा प्रमुख रही। सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमले, स्कूल भवनों को उड़ाना, सड़कों और विकास परियोजनाओं को निशाना बनाना, तथा ग्रामीणों को जन अदालतों में मार देना, यह सब माओवादी रणनीति का हिस्सा बन गया।

2010 में दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या और 2013 में झीरम घाटी हमला, जिसमें वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं सहित अनेक लोग मारे गए, भारतीय लोकतंत्र पर सीधे हमले थे। लोकतांत्रिक राजनीति में असहमति व्यक्त करने के अनेक संवैधानिक मार्ग उपलब्ध हैं, किंतु हथियार के बल पर राज्य को चुनौती देना अंततः हिंसा और भय को ही जन्म देता है। यही कारण है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई अवसरों पर नक्सली हिंसा को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया।

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इसी के साथ “अर्बन नक्सल” शब्द सामने आया। इस शब्द का उपयोग उन बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं या नेटवर्कों के लिए किया गया जो शहरों में रहकर माओवादी विचारधारा को वैचारिक समर्थन देते हैं। महत्वपूर्ण है कि माओवादी दस्तावेजों में शहरी नेटवर्क को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया था। इससे यह बहस भी तेज हुई कि क्या वैचारिक स्वतंत्रता और हिंसक उग्रवाद के समर्थन के बीच स्पष्ट रेखा खींची जानी चाहिए।

भारतीय वामपंथ की आलोचना केवल राजनीतिक हिंसा तक सीमित नहीं रही।  इन्होंने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों में वैचारिक वर्चस्व स्थापित करने प्रयास किया। इतिहास लेखन, साहित्य, विश्वविद्यालयी विमर्श और सांस्कृतिक मंचों पर लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता रहा। विवाद तब गहरा गया जब कुछ विश्वविद्यालय परिसरों में राष्ट्रविरोधी नारों और अलगाववादी प्रवृत्तियों को लेकर बहसें सामने आईं। इससे यह प्रश्न खड़ा हुआ कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रविरोधी उकसावे के बीच सीमा कहाँ निर्धारित होनी चाहिए।

आज भारत एक नए दौर में खड़ा है। देश आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रभाव के नए अध्याय लिख रहा है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह आलोचना को स्थान देता है, असहमति को स्वीकार करता है और परिवर्तन के शांतिपूर्ण मार्ग उपलब्ध कराता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।