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अमुआ तले डोला रख दे मुसाफिर

आचार्य ललित मुनि

भारतीय जीवन में यदि किसी फल को सबसे अधिक लोकप्रियता, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और भावनात्मक जुड़ाव प्राप्त है, तो वह आम है। फलों का राजा कहलाने वाला आम केवल स्वाद का विषय नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य, लोकजीवन, इतिहास और परंपराओं का अभिन्न अंग भी है। इसकी छाया में लोकगीत जन्म लेते हैं, इसकी मंजरी पर कवियों की कल्पना खिलती है और इसकी मिठास पीढ़ियों की स्मृतियों में घुली रहती है। आम का मौसम आते ही बचपन की यादें, ग्रामीण जीवन की सादगी और प्रकृति का अनुपम सौंदर्य एक साथ मन में उमड़ पड़ते हैं।

आम लोगों का आम, खास लोगों का आम, आम तो आम ही है, पर आम खाने वाले लोग खास ही होते हैं। अब समय है वृक्षों पर आम के पकने का। इससे पहले तो कृत्रिम रूप से पकाए आम बाजारों में भरे पड़े हैं, पर उनमें वह मज़ा कहाँ जो स्वतः पके हुए आम में है। कृत्रिम रूप से पके हुए आम में छिलका पहले पीला होता है, पर गुठली सफेद ही रहती है। वृक्ष पर पके आम में गुठली नारंगी होती है, चाहे छिलका हरा ही क्यों न हो।

आम के साथ बचपन के दिन भी जुड़े हैं, जब स्कूल से भागकर टिकोरों के चक्कर में मीलों दूर तक की धरती नाप आते थे। ऐसे ही हमारे देश का राष्ट्रीय फल आम को नहीं बनाया गया है। इसमें गुण भरे पड़े हैं, पर आयुर्वेद की दृष्टि से अवगुण भी हैं। माना जाता है कि यह कुदरत का नायाब तोहफ़ा है, जिसका कोई जवाब नहीं।

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आम का विशिष्ट अर्थ भी है, जैसे आम-खास, दीवान-ए-आम, जहाँ बादशाह जनता के बीच बैठते थे। आम दरबार अर्थात खुला दरबार, जिसमें सभी लोग जा सकें। आमफहम अर्थात जो सबकी समझ में आ सके। आम रास्ता, आम राय, आम लोग आदि-आदि। मगर चर्चा यहाँ सिर्फ आम पर है।

कालिदास ने इसका गुणगान किया है तो शतपथ ब्राह्मण में भी इसका उल्लेख मिलता है तथा अमरकोश में प्रशंसा इसकी बौद्धकालीन लोकप्रियता का प्रमाण है। वैशाली की नगरवधू आम्रपाली को कौन नहीं जानता। पौराणिक देवी अम्बिका के शिल्प में उनकी पहचान आम्रवृक्ष के माध्यम से ही दिखाई देती है। वेदों में आम को विलास का प्रतीक कहा गया है।

कालिदास का मेघदूत भी आम्रकूट (अमरकंटक) होकर उज्जयिनी की ओर बढ़ता है। भारतवर्ष में आम से संबंधित अनेक लोकगीत, आख्यायिकाएँ आदि प्रचलित हैं और हमारी रीति, व्यवहार, हवन, यज्ञ, पूजा, कथा, त्योहार तथा सभी मंगल कार्यों में आम की लकड़ी, पत्ती, फूल अथवा उसका कोई न कोई भाग प्रायः काम आता है।

संस्कृत साहित्य में इसका उल्लेख आम्र के नाम से होता है और लगभग चार हजार वर्षों से इसकी खेती की जाती रही है। अंग्रेज़ी भाषा का “मैंगो” शब्द तमिल के “मंगाई” से आया है। पुर्तगालियों ने इसे “मंगा” के रूप में अपनाया, जहाँ से अंग्रेज़ी का शब्द “मैंगो” बना। इस पेड़ की छाया के अलावा इससे अनेक धार्मिक मान्यताएँ भी जुड़ी हुई हैं, जैसे राधा-कृष्ण का पौराणिक नृत्य तथा शिव-पार्वती का विवाह।

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भारतीय साहित्य में इस पेड़ को अत्यंत लोकप्रियता प्राप्त है। अमराइयों में झूले डालकर झूलती नायिकाओं के नयनाभिराम रूप और मनोहारी प्रसंगों से संस्कृत साहित्य समृद्ध है। लोकगीतों में भी इसकी महिमा कम नहीं है।

“अमुआ के डाली पे बैठी कोयलिया” किसी भी व्यक्ति को उसके ग्राम्य जीवन और परिवेश की याद दिलाने के लिए काफी है। जब कोयल मधुर स्वर में कूकती है, तब मन आत्मविभोर हो जाता है। उसे प्रकृति की यह दूती अपनी सखी-सहचरी मालूम पड़ती है। “अमुआ तले डोला रख दे मुसाफिर” विदा होकर ससुराल जाती बेटियों की विरह-वेदना से कितनों की आँखें अश्रुपूरित हो जाती हैं।

सूफ़ी कवि अमीर ख़ुसरो ने फ़ारसी काव्य में आम की खूब प्रशंसा की थी और इसे “फ़ख्र-ए-गुलशन” की संज्ञा दी थी। यही नहीं, आम सभी मुग़ल बादशाहों का प्रिय फल था। इसकी खेती को विकसित करने में उन्होंने विशेष प्रयास किए और भारत की अनेक विकसित किस्मों का श्रेय भी उन्हें जाता है।

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कहते हैं अकबर ने बिहार के दरभंगा में एक लाख आम के पेड़ों का बाग लगवाया था। आईने-अकबरी में भी आम की किस्मों और उनकी विशेषताओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। यहाँ तक कि बहादुर शाह ज़फ़र के पास भी लाल क़िले में “हयात बख़्श” नामक आम का बाग था, जिसमें प्रसिद्ध किस्मों के आम उगाए जाते थे।

माना जाता है कि पूरी दुनिया में आम की 1500 से अधिक किस्में हैं, जिनमें लगभग 1000 किस्में भारत में उगाई जाती हैं। भारत में उगाई जाने वाली कुछ लोकप्रिय किस्में हैं, जैसे हापुस (अल्फ़ांसो), मालदा, राजापुरी, पैरी, सफेदा, फ़ज़ली, दशहरी, तोतापरी और लंगड़ा। अब तो उद्यानिकी वैज्ञानिकों ने और भी नई किस्में विकसित कर दी हैं।

वर्षा का आगमन होने को है और आम की फसल भी पूर्णता की ओर है। फिर एक वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इसलिए चूकिए नहीं, आम का भरपूर आनंद लीजिए। स्वयं भी खाइए और मित्रों तथा परिजनों को भी खिलाइए। हाँ, अगर कहीं सरकारी गलियारे में कोई काम अटका पड़ा है तो साहब तक एकाध पेटी आम पहुँचा दीजिए। मीठा आम जब उदर में जाएगा तो फ़ाइल अपने आप सरक जाएगी। बाकी जो है सो तो हैइए है…