महाराणा प्रताप के शौर्य ने जीता हल्दीघाटी युद्ध

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के सर्वकालिक महानायक हैं। प्रताप एक आदर्श महापुरुष थे, जिनमें आश्चर्यजनक रूप से कई गुण समाहित थे। वे योग्य व आज्ञाकारी पुत्र, प्रजापालक राजा, जन-जन के चहेते, कुशल योद्धा, विलक्षण रणनीतिकार, अद्भुत कूटनीतिज्ञ, दृढ़प्रतिज्ञ, संघर्षशील नायक, प्रेरणादाई नेतृत्वकर्ता, सत्-चरित्र पुरुष, सत्यनिष्ठ मित्र, क्षमाशील पिता तथा बेहद कठोर प्रशासक थे। अपने जीवन काल में ही प्रताप की कीर्ति पताका समस्त आर्यावर्त में फहराने लगी थी। आज पूरे विश्व में प्रताप के शौर्य, त्याग, संघर्ष व स्वातंत्र्य प्रेम का यशस्वी शंखनाद गुंजायमान है।
आज से 450 वर्ष पूर्व 18 जून, 1576 को हल्दीघाटी में अकबर की साम्राज्यवादी सेना और महाराणा प्रताप का आमना-सामना हुआ था। इस युद्ध में मुगल सेना बुरी तरह पराजित हुई। युद्ध में प्रताप और मानसिंह का भी आमना-सामना हुआ था, पर प्रताप के भाले के वार से वह बच गया। इसके बाद मान सिंह व मुगल सेना भाग खड़ी हुई और गोगुंदा के किले में छिप गई। इस पराजय पर क्रोधित अकबर ने अपने प्रधान सेनापति मानसिंह व उसके सहयोगी आसफ खान की ड्योढ़ी माफ कर 6 माह के लिए दरबार से निष्कासित कर दिया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि अकबर की सेना में मान सिंह के अलावा कई सेनापति थे।
हल्दीघाटी का युद्ध तीन चरणों में लड़ा गया, जो लगभग 5 घंटे चला। प्रथम चरण प्रातः 8 बजे के बाद आरंभ हुआ, जिसमें हल्दीघाटी के मुहाने से प्रताप की सेना ने आक्रमण किया। इसमें हरावल के बाईं ओर से हकीम खां सूर सैनिकों के साथ आगे बढ़ा और मुगल सेना के दाईं ओर टूट पड़ा। इससे मुगल सेना पहले ही धक्के में बिखर गई और लगभग 5-7 कोस दूर बनास नदी के पार भाग गई।
दूसरे चरण का युद्ध हल्दी घाटी के मुहाने से लगभग सवा कोस दूर हुआ। वहां अकबर की ओर से कछवाहों के राजपूत सैनिकों ने मेवाड़ की सेना से मोर्चा लिया। मेवाड़ की सेना के दबाव से मुगलों की राजपूत टुकड़ी लगभग पौन कोस पीछे भाग कर बनास के दक्षिणी किनारे पर पहुंच गई, जहां तीसरे चरण का युद्ध हुआ। मुगल सेना की मदद के लिए मिहतर खां ने भागी हुई सेना को वापस बुलाया और सुरक्षित सेना लेकर आया।
यहां भीषण युद्ध हुआ, जिसमें झाल बीदा (मान सिंह) और हकीम खां सूर वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के दौरान तेज बारिश के बीच दोपहर के बाद युद्ध समाप्त हो गया। युद्ध में इतना खून बहा कि युद्ध मैदान में बनास नदी का पानी जो पानी भर गया था, वह लाल हो गया, जिससे इसका नाम ‘रक्त तलाई’ पड़ा।
हल्दीघाटी युद्ध विजय के कुछ प्रमाण यहां प्रस्तुत हैं —
1. ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी, वि.सं. 1630 (जून 1573 ई.) को महाराणा प्रताप द्वारा एक ब्राह्मण को भूमिदान का उल्लेख।
2. प्रताप ने अपने पुरोहित राम को ओड़ा गांव की जागीर दी। पंचोली जेता ने ओड़ा से मुगलों का थाना हटाया था। यह पुरोहित राम की जागीर का गांव था, जो पुनः उन्हें दिया गया। (कृष्ण पक्ष तृतीया, वि.सं. 1634 (1577 ई.))
3. फाल्गुन शुक्ल पंचमी, वि.सं. 1639 (मार्च 1583 ई.) को महाराणा प्रताप ने मृगेश्वर गांव (मीरघेसर) प्रदान किया।
4. ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी, वि.सं. 1642 रणछोड़ राय मंदिर प्रशस्ति, सुरखंड का खेड़ा, सराड़ा:- महाराणाधिराज प्रताप सींघजी ने राठड़ का रा, ज पराजित कर सिसोदीय, ण का राज संवत 1642, में राज प्रताप की, आ सुरखंड नगरे पर, राज काद उस समे, मुगल अकबर, के विषात सेनापती रा, मानसेह को सात जुद, था महाराणाजी अस वज, पइ ऊ खुसी में रनसड़, जी का मदीरा डोरी थ 3, स का प्रसद की आलु, बी हल 4 पुजारी कुव, र को दा जेठ सुकल-11। अर्थात् महाराणाधिराज प्रताप सिंह ने राठौड़ का राज्य पराजित कर सिसोदियों का राज संवत् 1642 में राज का प्रताप (प्रताव) किया। उस समय अकबर के विख्यात सेनापति मान सिंह के साथ युद्ध किया। महाराणा जी इस युद्ध में विजयी हुए। इसी प्रसन्नता में रणछोड़जी का मंदिर की डोहली का प्रसाद किया। लुबी (भूमि) 4 हल पुजारी के पुत्र को दी। ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी।
5. जगन्नाथराय मंदिर, उदयपुर की प्रशस्ति (वैशाख पूर्णिमा, वि.सं. 1708 (13 मई, 1652 ई.)- कृत्वा करे खड्ङ्गलतां स्ववल्लभां, प्रतापसिंहे समुपागते प्रगे। सा खण्डिता मानवती द्विषच्चम्ः, संकोचयन्ती चरणं पराङ्मुखी। (श्लोक सं. 41)। अर्थ – अपनी प्रियतमा खड्गलता (तलवार रूपी वल्लरी) को हाथ में लेकर प्रतापसिंह के रण भूमि में आ जाने पर खण्डिता नायिका के समान मानिनी (रुठी हुई) मान सिंह से मुक्त शत्रु सेना अपने पैर को सिकोड़ते हुए पराङ्मुखी (पीछे मुंह कर भागने वाली) हो गई।
6. वैद्यनाथ मंदिर प्रशस्ति, सीसारमा (वि.सं. 1772 माघ सुदी 12) : –प्रतापसिंह होऽथ व भूव तस्माद्धनुर्धरो धैर्यधरो धरिण्याम्।म्लेच्छाधिपात् क्षत्रिकुलेन मुक्तोधर्मोप्यथैनं शरणं जगाम्।। 34।।प्रतापसिंहेन सुरक्षितोऽसौ पुष्ठः परं तुदिलतामगछत्।अकब्बर म्लेच्छगणधिपस्य परं मनः शल्यमिवाभवद्यः ।। 35।। (26 जनवरी, 1716 ई.)। अर्थ – उदय सिंह से प्रताप सिंह हुए। यह पृथ्वी पर धनुर्धारी तथा धैर्यवान के रूप में (प्रसिद्ध) हुए। क्षत्रिय कुल के द्वारा म्लेच्छ शासक से धर्म को मुक्त कराया। इस धर्म ने इसकी (प्रताप की) शरण ली।। 34।। प्रताप सिंह के द्वारा धर्म को सुरक्षित रखा गया। पुष्ट किया गया, जिससे वह तोंद वाला (बड़ा) हो गया। म्लेच्छाधिपति अकब्बर के लिए प्रताप मन में घुसा हुआ कांटा हो गया।। 35।।
7. रणछोड़ भट्ट प्रणत अमरकाव्यम् (सर्ग- 16, श्लोक सं. 35) : –रणभुवि समुपेतं धन्य सेना समेतं,वरागत यवनेशं भूपतिर्मानसिंहम्। पवन बल निदानं म्लेच्छनाथैकतानं,दलित समरमानं शौर्यशाणं ततान।। 35।। अर्थ – प्रताप सिंह ने युद्धभूमि में सेना सहित आए यवनपति को वश में करने वाले, यवन सेना के निदान (पहचान), यवनपति को एकमात्र तान (मुखिया) मान सिंह का युद्ध में अभिमान चूर्ण कर वीरता रूपी शान का विस्तार किया।
8. ‘राज रत्नाकर’, महाकवि सदशिव (वि.सं. 1735) सप्तम सर्ग श्लोक 42 : –अरिपट भवनाद् गृहीतवितः, पुनखलोकित सम्पराय भूमिः। स समर विजयी यर्यो महीश, उदयपुरणभिमुखः प्रतापसिंहः।। 42।।अर्थ- शत्रुओं के तंबुओं से धन लेकर व युद्धभूमि का पुनः अवलोकन कर पृथ्वीपति प्रताप सिंह युद्ध में विजयी होकर उदयपुर चल पड़ा।
— उमेश कुमार चौरसिया, साहित्यकार एवं संस्कृति चिंतक

