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सूरदास के पदों में प्रकृति और पर्यावरण चेतना

आचार्य ललित मुनि

ब्रज की धरती, जहाँ यमुना का जल बहता है और वृंदावन के वन फूलों से लदे रहते हैं, वहाँ एक प्रज्ञाचक्षु कवि खड़े हैं, जिनकी आँखें भले ही बंद हों, परंतु हृदय प्रकृति की हर झलक को जीवंत रूप से देखता है। यह कवि हैं सूरदास। उनकी कविता केवल भक्ति की ही नहीं, बल्कि प्रकृति की भी महान गाथा है। सूरदास के पदों में प्रकृति कोई साधारण पृष्ठभूमि नहीं है, वह एक जीवंत साथी है, जो कृष्ण की लीलाओं के साथ नाचती-गाती और मनुष्य को पर्यावरण के प्रति जागरूक करती है। आज जब हम पर्यावरण संकट की बात करते हैं, तब सूरदास के पद हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति से अलग होकर हम कभी सुखी नहीं रह सकते। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि पर्यावरण चेतना भक्ति का ही एक अंग है।

सूरदास का जन्म संवत् 1535 विक्रमी की वैशाख शुक्ल पंचमी राजस्थान के रुनकता गाँव में हुआ था। कुछ विद्वान उन्हें जन्म से दृष्टिहीन मानते हैं, जबकि कुछ कहते हैं कि बाद में उनकी दृष्टि चली गई। परंतु उनकी कविता इतनी सजीव है कि लगता है, उन्होंने प्रकृति को आँखों से नहीं, बल्कि हृदय से देखा। वे वल्लभाचार्य के शिष्य थे और पुष्टिमार्ग संप्रदाय से जुड़े। उनका मुख्य ग्रंथ ‘सूरसागर’ है, जिसमें एक लाख से अधिक पद बताए जाते हैं, परंतु वर्तमान में लगभग आठ-दस हजार पद ही उपलब्ध हैं।

इन पदों में कृष्ण की बाल लीला, श्रृंगार और वात्सल्य के साथ प्रकृति का चित्रण इतना गहरा है कि वह अलग से अध्ययन का विषय बन जाता है। सूरदास ने ब्रज की धरती को अपनी कविता का केंद्र बनाया। यहाँ की यमुना, वन, पहाड़ियाँ, पशु-पक्षी और ऋतुएँ—सभी उनके पदों में जीवित हो उठती हैं। वे प्रकृति को कृष्ण की लीला का मंच मानते हैं, परंतु साथ ही उसकी रक्षा का संदेश भी देते हैं।

सूरदास के पदों में प्रकृति चित्रण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भाव और कल्पना दोनों को जोड़ता है। यहाँ प्रकृति केवल सुंदर दृश्य नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। वे बताते हैं कि मनुष्य प्रकृति से जुड़ा रहे तो सुख मिलता है और उससे अलग हो जाए तो दुख। यह पर्यावरण चेतना का प्रारंभिक रूप है। उदाहरण के लिए बसंत ऋतु का वर्णन देखिए—

सदा बसंत रहत जहाँ बास।
सदा हर्ष जहाँ नहीं उदास।।
कोकिल कीर सदा तंह रोर।
सदा रूप मन्मथ चित चोर।।
विविध सुमन बन फूले डार।
उन्मत मधुकर भ्रमत अपार।।

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इस पद का आशय है कि बसंत ऋतु में कोकिल का स्वर, भ्रमरों का गुंजन और फूलों से लदी डालियाँ ब्रज की खुशहाली दर्शाती हैं। सूरदास यहाँ प्रकृति को स्थायी आनंद का स्रोत बताते हैं। कोई उदास नहीं होता, क्योंकि प्रकृति हर मौसम में नया जीवन देती है। यह वर्णन पर्यावरण चेतना को बढ़ावा देता है, क्योंकि वे हमें याद दिलाते हैं कि वनों की रक्षा करें, ताकि फूल खिलते रहें और पक्षी गाते रहें। यदि हम वृक्ष काटेंगे, तो यह बसंत भी उदास हो जाएगा। सूरदास की दृष्टि में प्रकृति दिव्य है, परंतु वह मनुष्य के आचरण पर निर्भर है।

इसी प्रकार वर्षा ऋतु के पदों में सूरदास पर्यावरण के संतुलन को उजागर करते हैं। एक प्रसिद्ध पद में वे कहते हैं—

नये कुंज अति पुंज, नये द्रुम सुभग, यमुन जल पवन हिलौरी।
सूरदास प्रभु नव रस विलसत, नवल राधिकाजीवन भौरी।।

इस पद का आशय है कि नये कुंजों में नये वृक्षों पर यमुना का जल और पवन का हिलोर नया रस भर देता है। राधा और कृष्ण की लीला यहाँ प्रकृति के नवजीवन से जुड़ी है। सूरदास पर्यावरण चेतना का संदेश देते हुए बताते हैं कि वर्षा प्रकृति को पुनर्जीवित करती है। यदि हम नदियों को प्रदूषित करेंगे या वनों को नष्ट करेंगे, तो यह नव रस कहाँ से आएगा। यह पद हमें सिखाता है कि पानी, वन और हवा का संरक्षण ही जीवन का आधार है।

सूरदास के पदों में यमुना का वर्णन बार-बार आता है। यमुना यहाँ केवल नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माँ है। एक पद में विरह की स्थिति में वे लिखते हैं—

बिना गोपाल बैरिन भई कुंजैं।
तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं।
बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं अलि गुंजैं।
पवन, पानी, धनसार, संजीवनि, दधिसुत किरण भानु भई भुंजैं।।

सूरदास बताते हैं कि कृष्ण के बिना कुंज विरान हो जाती है। लताएँ, जो पहले शीतल लगती थीं, अब जलती हुई प्रतीत होती हैं। यमुना व्यर्थ बहती है, पक्षी व्यर्थ बोलते हैं और कमल भी व्यर्थ खिलते हैं। यहाँ पर्यावरण चेतना स्पष्ट है। सूरदास कहते हैं कि दिव्य उपस्थिति के बिना प्रकृति भी सूनी हो जाती है। आज के संदर्भ में यह पद हमें चेतावनी देता है कि यदि हम नदियों को गंदा करेंगे या वनों को काटेंगे, तो प्रकृति हमारी शत्रु बन जाएगी। यमुना की पवित्रता बनाए रखना ही सच्ची भक्ति है।

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वृंदावन के वनों का चित्रण सूरदास की कविता का अत्यंत सुंदर पक्ष है। वे वनों को लीला-स्थली मानते हैं, जहाँ कृष्ण गाय चराते हैं। एक पद में वे गोचारण संस्कृति का चित्रण करते हैं—

आजु मैं गाई चरावन जैहौं,
वृंदावन के भाँति-भाँति फल अपने कर मैं खैहौं।

यह पद ब्रज की गोचारण परंपरा को दर्शाता है। गायें वनों में चरती हैं, विविध फल खाती हैं और प्रकृति से सीधा संबंध बनाती हैं। सूरदास पर्यावरण चेतना का प्रतीक प्रस्तुत करते हुए बताते हैं कि पशुपालन और वन संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि हम चारागाहों की रक्षा करेंगे, तो गायें स्वस्थ रहेंगी और पर्यावरण संतुलित रहेगा। ब्रज की यह संस्कृति आज भी प्रासंगिक है।

सूरदास के पदों में पशु-पक्षी भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मोर, भ्रमर, कोकिल, हिरन और गायें—सभी लीला के सहभागी हैं। वे संकेत देते हैं कि प्रकृति में प्रत्येक जीव का अपना स्थान है। सूरदास पर्यावरण चेतना को बढ़ावा देते हुए मनुष्य को सिखाते हैं कि पशुओं का शोषण न करें, बल्कि उनके साथ सहजीवन स्थापित करें। गोचारण की परंपरा पर्यावरण संरक्षण का प्राचीन मॉडल है, जो आज के ऑर्गेनिक फार्मिंग और वाइल्डलाइफ संरक्षण से जुड़ता है।

उनके पदों में मानव और प्रकृति का संबंध अत्यंत गहरा है। वे बताते हैं कि प्रकृति मनुष्य की सहचरी है। यदि मनुष्य पर्यावरण का ध्यान रखे, तो प्रकृति उसे आनंद देती है। वृक्षों की कटाई से लताएँ विषम ज्वाला बन जाती हैं—यह स्पष्ट चेतावनी है। सूरदास की दृष्टि में पर्यावरण चेतना भक्ति का हिस्सा है, क्योंकि कृष्ण स्वयं प्रकृति के रक्षक हैं।

सूरदास के काव्य में ऋतुओं का चक्र पर्यावरण चेतना का महत्वपूर्ण माध्यम है। शरद ऋतु में वे फूलों और फलों का वर्णन करते हैं, वर्षा में जल की महिमा गाते हैं और हेमंत में शीतल हवाओं का उल्लेख करते हैं। प्रत्येक ऋतु में वे बताते हैं कि प्रकृति का चक्र निरंतर चलता है, परंतु मनुष्य के हस्तक्षेप से यह बिगड़ सकता है। यह आधुनिक जलवायु परिवर्तन की चेतावनी जैसा है।

ब्रज की चारागाही संस्कृति सूरदास के पदों का विशेष अंग है। गोपालन, पशुपालन और वन संरक्षण यहाँ एक साथ चलते हैं। सूरदास हमें सिखाते हैं कि कृषि, पशुपालन और प्रकृति का सामंजस्य ही सच्चा विकास है। आज जब हम जंगलों की कटाई और पशु संकट की चर्चा करते हैं, तब उनके पद हमें प्रेरणा देते हैं।

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सूरदास की कविता में पर्यावरण चेतना केवल वर्णन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह नैतिक संदेश भी देती है। वे प्रकृति को देवत्व प्रदान करते हैं और उसके शोषण को पाप मानते हैं। यदि यमुना सूख गई, तो हमारी भी गति वही होगी—यह स्पष्ट पर्यावरण संरक्षण का आह्वान है।

आज के समय में सूरदास के पद अत्यंत प्रासंगिक हैं। जब नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, वन कट रहे हैं और पशु विलुप्त हो रहे हैं, तब उनके पद हमें याद दिलाते हैं कि भक्ति और पर्यावरण एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। यदि हम सूरदास की तरह प्रकृति को कृष्ण की लीला-स्थली मानें, तो हम उसकी रक्षा अवश्य करेंगे।

सूरदास ने प्रकृति को इतनी गहराई से चित्रित किया कि वह हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर बन गई। उनके पदों में पर्यावरण चेतना की जड़ें भक्ति में हैं। वे संदेश देते हैं कि प्रकृति से प्रेम करो, तो ईश्वर से प्रेम मिलेगा। वृंदावन का वन उनके लिए ज्ञान का केंद्र है, यमुना का जल शुद्धता का प्रतीक है और गायें धरती माता का रूप हैं। इन सभी में पर्यावरण संरक्षण का संदेश छिपा है।

उनकी रचनाओं में सामाजिक पक्ष भी जुड़ा है। ब्रज का किसान जीवन और पशुपालन पर्यावरण संतुलन का पाठ पढ़ाता है। निराई-गुड़ाई और जल की आवश्यकता से पौधों का विकास होता है—यह आधुनिक सस्टेनेबल एग्रीकल्चर से मेल खाता है। गोपियाँ यमुना किनारे गीत गाती हैं और प्रकृति उनके गीत में शामिल हो जाती है। यह पर्यावरण चेतना का सामूहिक रूप है।

अंततः, सूरदास के पद प्रकृति और पर्यावरण चेतना के प्राचीन खजाने हैं। वे केवल कवि नहीं, बल्कि पर्यावरण दूत भी थे। उनकी विरासत हमें सिखाती है कि भक्ति का मार्ग प्रकृति संरक्षण से होकर गुजरता है। यदि हम उनके पदों को जीवन में उतारें, तो वर्तमान पर्यावरण संकट से बाहर निकल सकते हैं। सूरदास की ज्योति आज भी ब्रज की धरती पर प्रकाशित है और हमें मार्ग दिखाती है—प्रकृति से प्रेम करो, पर्यावरण की रक्षा करो और सच्ची भक्ति प्राप्त करो। यही उनका अमर संदेश है।

लेखक – वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता