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जनसंवाद ही सुशासन की असली पहचान

रूमा सेनगुप्ता

लोकतंत्र में जनता सब कुछ देखती है, सब कुछ समझती है और समय आने पर जवाब भी देती है। यदि कोई जनप्रतिनिधि यह सोचता है कि चुनाव जीतने के बाद पांच वर्षों तक जनता की नाराजगी का कोई असर नहीं पड़ेगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल हो सकती है। हाल के वर्षों में देश के कई राज्यों में देखने को मिला है कि जनता का असंतोष केवल मतदान केंद्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सड़कों पर भी दिखाई देने लगता है।

पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए चुनावों के दौरान और उसके बाद सामने आए कई घटनाक्रम इस बात की ओर संकेत करते हैं कि जब जनता को लगता है कि उसकी समस्याएं नहीं सुनी जा रहीं, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ रहा है या सत्ता लोगों से दूर हो गई है, तब गुस्सा खुलकर सामने आता है। कई स्थानों पर नेताओं और जनप्रतिनिधियों को जनता के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। जो लोग कभी उनके समर्थक थे, वही सवाल पूछते दिखाई दिए। लोकतंत्र में जनता का यही स्वभाव है—वह पहले उम्मीद करती है, फिर शिकायत करती है और अंत में फैसला सुनाती है।

देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर सड़क, पानी, बिजली, रोजगार, भ्रष्टाचार और स्थानीय समस्याओं को लेकर लोगों का आक्रोश भी देखने को मिला है। कहीं लोग सड़क जाम करते हैं, कहीं सरकारी कार्यालयों का घेराव करते हैं, तो कहीं जनप्रतिनिधियों के खिलाफ खुलकर विरोध प्रदर्शन करते हैं। यह स्थिति किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए शुभ संकेत नहीं होती। क्योंकि जब जनता सड़क पर उतरती है, तब यह केवल किसी एक समस्या का विरोध नहीं होता, बल्कि यह व्यवस्था के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत होता है।

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इसलिए किसी भी जनप्रतिनिधि, मंत्री, विधायक, सांसद, सरपंच या पार्षद के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक आवश्यकता यह है कि वह जनता के बीच लगातार बना रहे। जनता केवल चुनावी मौसम में दिखाई देने वाले नेताओं को लंबे समय तक स्वीकार नहीं करती। लोग चाहते हैं कि उनका प्रतिनिधि उनकी खुशी और परेशानी दोनों में उनके साथ खड़ा रहे।

यहीं पर छत्तीसगढ़ का सुशासन तिहार एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है। इस पहल ने यह संदेश दिया है कि शासन केवल राजधानी के दफ्तरों से नहीं चल सकता। वास्तविक शासन वहीं है, जहां अधिकारी और जनप्रतिनिधि लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनें और समाधान सुनिश्चित करें।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की समस्याएं अक्सर बहुत साधारण लेकिन जीवन से जुड़ी होती हैं। किसी गांव में पेयजल की समस्या है, कहीं सड़क वर्षों से खराब है, कहीं पेंशन के लिए बुजुर्ग भटक रहे हैं, तो कहीं किसानों को राजस्व संबंधी मामलों में परेशानी होती है। इन समस्याओं का समाधान यदि समय पर हो जाए तो लोगों के भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ता है। लेकिन यदि उन्हें बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यही परेशानी धीरे-धीरे असंतोष में बदल जाती है।

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लोकतंत्र में जनता का विश्वास किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी होता है। यह विश्वास भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से बनता है। जब कोई अधिकारी गांव में पहुंचकर लोगों की बात सुनता है, जब कोई विधायक बिना पूर्व सूचना के अपने क्षेत्र का दौरा करता है, जब कोई मंत्री सीधे हितग्राहियों से संवाद करता है, तब लोगों को लगता है कि शासन वास्तव में उनके लिए काम कर रहा है।

इतिहास भी बताता है कि जनता से दूर हुई सरकारों और नेताओं को अंततः राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है। जनता कभी तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देती, लेकिन वह अपने अनुभवों को याद रखती है। चुनाव आने पर वही अनुभव वोट में बदल जाते हैं। इसलिए यह मान लेना कि जनता सब कुछ भूल जाएगी, राजनीति की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जनप्रतिनिधि अपने कार्यालयों की सीमाओं से बाहर निकलें। वे गांवों, कस्बों और शहरों की गलियों तक पहुंचें। लोगों से सीधे संवाद करें। शिकायतों को सुनें और उनके समाधान की प्रगति पर निगरानी रखें। जनता केवल आश्वासन नहीं, परिणाम देखना चाहती है।

यदि किसी क्षेत्र में पानी की समस्या है, तो लोग यह नहीं सुनना चाहते कि योजना स्वीकृत हो गई है; वे अपने घरों तक पानी पहुंचता हुआ देखना चाहते हैं। यदि सड़क निर्माण की घोषणा हुई है, तो वे सड़क बनती हुई देखना चाहते हैं। यदि रोजगार का वादा किया गया है, तो वे अपने परिवार के युवाओं को अवसर मिलता हुआ देखना चाहते हैं। विकास की वास्तविक परिभाषा यही है।

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सुशासन तिहार जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि जनता से संवाद केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि सुशासन की बुनियादी शर्त है। जब सरकार जनता के बीच जाती है, तब समस्याएं भी सामने आती हैं और समाधान भी निकलते हैं। इससे जनता का भरोसा मजबूत होता है और शासन की विश्वसनीयता बढ़ती है।

अंततः हर जनप्रतिनिधि को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी शक्ति है। जनता का विश्वास जीतना कठिन है, लेकिन उसे खोना बहुत आसान। इसलिए सत्ता का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि लोगों के बीच रहिए, उनकी बातें सुनिए, उनकी समस्याओं को समझिए और समाधान के लिए संवेदनशीलता के साथ काम कीजिए।

क्योंकि लोकतंत्र में जनता की सुनवाई से विश्वास बढ़ता है, लेकिन जनता से दूरी बढ़ते ही असंतोष जन्म लेने लगता है। और जब असंतोष बढ़ता है, तो वह केवल सड़कों पर ही नहीं, बल्कि मतदान केंद्रों तक भी पहुंचता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी सच्चाई है।

 

( लेखिका पत्रकार हैं )