पुस्तक समीक्षाfutured

कौन सा है पहला छत्तीसगढ़ी उपन्यास, जिसका है यह शताब्दी वर्ष

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य का इतिहास बहुत पुराना है। अनेक प्रसिद्ध और भूले-बिसरे साहित्यकारों ने अपनी मूल्यवान कृतियों से छत्तीसगढ़ के साहित्य भंडार को समृद्ध बनाया है। माँ सरस्वती के पुजारी ऐसे तपस्वी रचनाकारों में पाण्डेय बंशीधर शर्मा भी थे, जिन्होंने ‘हीरू के कहिनी’ शीर्षक से छत्तीसगढ़ी भाषा में एक उपन्यास की रचना की। आंचलिक साहित्य के शोधकर्ताओं की मानें तो ‘हीरू के कहिनी’ छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला उपन्यास है।

आज हम वर्ष 2026 में हैं। पहली बार इस उपन्यास का प्रथम प्रकाशन सन् 1926 में हुआ था। यानी ‘हीरू के कहिनी’ के प्रकाशन का यह शताब्दी वर्ष है। कथानक की दृष्टि से यह एक लघु उपन्यास है। इसकी रचना स्वतंत्रता संग्राम के दौर में की गई थी। यही वह समय था, जब देश भर में विभिन्न राज्यों की आंचलिक भाषाओं में राष्ट्रीय जागरण की रचनाएँ लिखी और छापी जा रही थीं, और हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं का भी उत्थान हो रहा था।

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इतिहास के ऐसे निर्णायक दौर में प्रथम छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘हीरू के कहिनी’ का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण घटना थी। अपने इस उपन्यास के माध्यम से बंशीधर जी ने छत्तीसगढ़ के तत्कालीन ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण किया है। उपन्यासकार ने गरीबों के जीवन-संघर्ष को अभिव्यक्ति दी है और यह भी बताने का प्रयास किया है कि राजा (शासक) और जनता के बीच कैसे रिश्ते होने चाहिए।

इस उपन्यास का दूसरा संस्करण 74 साल बाद सन् 2000 में छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय रायगढ़ में प्रकाशित हुआ। यह दूसरे संस्करण का मुखपृष्ठ है। उपन्यासकार बंशीधर पाण्डेय के पारिवारिक सदस्य और वरिष्ठ साहित्यकार श्री ईश्वर शरण पाण्डेय ने इसका संपादन किया है। वे भी अब इस भौतिक संसार में नहीं हैं। पाण्डेय बंशीधर शर्मा, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इतिहासकार स्वर्गीय श्री लोचन प्रसाद पाण्डेय और प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय श्री मुकुटधर पाण्डेय के मंझले भाई थे।

पाण्डेय परिवार के लोग महानदी के तटवर्ती ग्राम बालपुर के निवासी थे। बंशीधर जी के उपन्यास के प्रकाशक डॉ. राजू पाण्डेय (अब दिवंगत) ने अपने प्रकाशकीय वक्तव्य में लिखा है—

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“उपन्यास के नायक हीरू का चरित्र छत्तीसगढ़ अंचल के निवासियों का प्रतिनिधि चरित्र है। धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, परम्परावादी और प्रगतिशील, सभी प्रकार के पात्र उपन्यास में मौजूद हैं। उपन्यास का कथानक हीरू की कष्टपूर्ण और दुःखमय बाल्यावस्था से उसके सफल और प्रतिष्ठापूर्ण यौवन तक फैला हुआ है। उपन्यास बहुरंगी ग्रामीण जीवन की समग्रता को समेटे है। अंग्रेजों द्वारा किया जा रहा शोषण, आम जनता में व्याप्त असंतोष, जन-जागरण के प्रयास और स्वाधीनता आंदोलन की ऊहापोह वायु की भांति पूरे उपन्यास में फैली है।”

मेरे विचार से ‘हीरू के कहिनी’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला उपन्यास होने की वजह से यह हमारे लिए और भी ज्यादा मूल्यवान संपत्ति है, जिसे सहेजकर और संजोकर सुरक्षित रखना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। राजू पाण्डेय ने वर्ष 2000 में अपने सीमित संसाधनों से स्थानीय स्तर पर इसे प्रकाशित कर जनता के सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया।

जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर ऐसी दुर्लभ साहित्यिक रचनाओं को संरक्षित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को मालूम हो सके कि देश, दुनिया और समाज को सही दिशा देने के लिए उनके पूर्वज प्रेरक विचारों का कितना अनमोल खजाना उन्हें सौंप गए हैं।

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्याकर हैं।