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जनरल बोगी : आम इंसानों की रेल यात्रा का आँखों देखा हाल

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

सुप्रसिद्ध लेखक और ब्लॉगर ललित शर्मा  का उपन्यास ‘जनरल बोगी ए ट्रेवल लव स्टोरी ‘ हमारे देश की यात्री ट्रेनों के सामान्य अनारक्षित डिब्बों की तकलीफ़देह लेकिन एक रोचक यात्रा कथा है। लम्बी दूरी की यात्रा के लिए ट्रेनों में रिजर्वेशन नहीं मिलने पर जनरल बोगियों में सफ़र करना आम नागरिकों की मज़बूरी होती है। उन्हें कई तरह की मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है।

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ लेखक भाई ललित शर्मा ने जनरल बोगी में होने वाली किचकिच, सीटों को लेकर होने वाली मारामारी और यात्रियों की नोक झोंक का दिलचस्प वर्णन किया है। कुछ इस तरह जैसे सब कुछ पाठकों की आँखों के सामने हो रहा हो। एक तरह से यह उपन्यास भारत के आम इंसानों की रेलयात्रा का आँखों देखा हाल है। इसमें एक भुक्तभोगी का दर्द भी है और इतिहास और पर्यटन की दृष्टि से रोचक तथ्य भी ।

इसमें लेखक ने एक यात्री के रूप में जनरल बोगी में अपने भोगे हुए यथार्थ का सजीव वर्णन किया है। एक तरह से हम इसे रेल यात्रा पर आधारित उनकी आत्म कथा भी कह सकते हैं। ऐसा लगता है कि इसे और भी अधिक रोचक बनाने के लिए उन्होंने कुछ प्रसंगों में कल्पनाओं का भी तड़का लगाया है।

घुमक्कड़ स्वभाव के लेखक ललित भाई अपने इस उपन्यास के जरिए हमें मारवाड़ (राजस्थान) से लौटते हुए अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ तक ले आते हैं।  अपनी यात्रा कथा में लेखक अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस में घर लौट रहे होते हैं। वे इस ट्रेन में सूरत से चढ़ते हैं और अपनी राजस्थान यात्रा में रेलगाड़ी में और अन्य स्थानों पर हुए अनुभवों खट्टे -मीठे अनुभवों को साझा करते चलते हैं। जनरल बोगी में हुए कसैले अनुभवों पर उपन्यास में उनकी ये पंक्तियाँ पाठकों को सोचने के लिए विवश करती हैं – ” जनरल बोगी की अपनी ही व्यथा है. रेल विभाग जनरल बोगी की सवारी को कूड़ा -कचरा समझता है, जिनका अपना कोई मानवाधिकार नहीं है. एक्सप्रेस, सुपर फास्ट गाड़ियों में जनरल बोगी नहीं लगानी चाहिए. अगर लगाते भी हैं तो जन सुविधाएँ उपलब्ध करवानी चाहिए. जनरल बोगी की सवारी के साथ रेल्वे सौतेला व्यवहार करती है.”

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बड़े -छोटे सात अध्यायों की और 136 पेज की इस यात्रा -कथा के पहले अध्याय में जनरल बोगी के जद्दो -जहद से भरे माहौल को उपन्यासकार के शब्दों में महसूस कीजिए – “सफ़र लम्बा था, चौबीस घंटे से अधिक काटने थे. हावड़ा रूट की गाड़ियों की जनरल बोगी में बारहों महीने, आठों काल पैर रखने की जगह मिलना मुश्किल है…. बोगी में फर्श पर पैर रखने की जगह तक नहीं थी। किसी को टायलेट तक जाना होता था तो वह ऊपर ही ऊपर बंदर जैसे कलाबाजियाँ खाता हुआ सीधे टायलेट के पास कूदता था, जहाँ उसे टायलेट में भी दो -चार लोग घुसे हुए मिलते थे। हमारी यात्रा को तो लगभग पांच घंटे हो रहे थे तथा मुझे भी बहुत देर से मूत्र विसर्जन का दबाव सता रहा था। सीमा से बाहर होने पर मुझे भी उनके जैसे ही टायलेट तक पहुँचना था, हिम्मत करके ऊपर ही ऊपर हाथ -पैर टिकाते हुए टायलेट तक पहुंचा। फर्श पर कूदने के लिए नीचे देखा तो वहाँ भी जगह नहीं थी।

किसी का चमचमाता हुआ नया ट्रंक रखा था। अगर उसे हटाने कहूं तो हटाने की भी जगह नहीं थी। मजबूरन मुझे ट्रंक पर ही लैंड करना पड़ा। जैसे ही ट्रंक पर एक पैर रखा, वह ट्रंक में ही घुस गया। ट्रंक में पैर घुसते ही वह पिचक गया। नया चमचमाता ट्रंक था पर गनीमत थी कि मेरा पैर चोटिल नहीं हुआ। एक पैर ट्रंक पर था और दूसरा हवा में। इतनी भी जगह नहीं थी कि दूसरा पैर रख सकूं। किसी तरह झटके से भीड़ में पैर घुसाया और जोर से चिल्लाया -“साले! रास्ते में भी सामान रख देते हैं। हगने -मूतने भी जाना हराम कर रखा है। हटाओ सब सामान यहाँ से वरना अभी दरवाजे के बाहर फेंकता हूँ। किसका है ये ट्रंक? ”

मेरे सवाल दागते ही वातावरण में एकदम सन्नाटा छा गया। कोई बताने को तैयार नहीं कि ट्रंक किसका है। जबकि एक व्यक्ति पिचके हुए ट्रंक को दुःखी मन से देख रहा था, समझ तो आ गया कि ट्रंक उसी का है, मारो भभकी तो फटे सबकी, धौंस काम कर गई, वरना झगड़ा तय था।  धक्का -मुक्की करके संडास के दरवाजे तक पहुंचा, दरवाजा खोला तो देखा कि संडास में पेटी, बोरी आदि भरे हुए हैं , बिलकुल भी जगह नहीं थी। मन मार कर दूसरे संडास की तरफ मुड़ा, उसका दरवाजा खोला तो तीन आदमी गत्ता बिछाए बैठे थे। देखते ही दिमाग ने जगह छोड़ दी । गुस्सा सातवें आसमान पर था और दबाव सीमा से बाहर।

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असहनीय होते जा रहे मूत्रावेग से गुस्साए लेखक का आक्रोश इन शब्दों में फूट पड़ता है – “निकलो बाहर, सालों हगने -मूतने की जगह में भी कब्जा कर रखा है. कोई पानी पेशाब भी जाए तो कहाँ जाए?” इतना सुनने के बाद भी कोई टस से मस नहीं हुआ. ” निकलो बाहर, नहीं तो यहीं से तुम्हारे ऊपर ही धार मार दूंगा । ” मुझे उपक्रम करते देख कर उनको लगा कि ये तो सही में धार मार देगा. बड़ी मुश्किल से बाहर निकले. मैंने आराम से कार्य सम्पन्न किया. अब समस्या बाहर निकलने की थी। जेब में पैसे और हाथ में घड़ी, इतने धक्के -मुक्के और आगे बढ़ने के संघर्ष के बीच कोई निकाल भी ले तो पता न चले।”

आगे उनके अनुभव और भी दिलचस्प हैं – “इस रेल यात्रा ने मुझे नट बना दिया, जो संतुलन साधकर अपनी सीट तक पहुंचने का प्रयास कर रहा था। नट तो रस्सी पर करतब दिखाते हैं और मैं ट्रेन की बोगी में अर्श और फर्श के बीच लटका हुआ उछल -कूद कर रहा था. अगर आज का जमाना होता तो लोग मोबाइल निकालकर वीडियो फ़िल्म बना रहे होते और सोशल मीडिया में वायरल हो गया होता।”

उपन्यास के लेखक पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में स्थित गांव राणावास में अपने दोस्त मांगीलाल के मेहमान बनते हैं। उपन्यास में जहाँ इस गांव के परिवेश में राजस्थानी (मारवाड़ी ) भाषा के लोकगीतों की मिठास है, वहीं इस आंचलिक भाषा में लोगों के संवाद भी अपनी रोचकता लिए हुए हैं।उपन्यासकार के साथ उनके पाठक फ्लैशबैक में राजस्थान के उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों की भी सैर करते चलते हैं।

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उपन्यास में लेखक की मुलाकात एक अमेरिकन पर्यटक ग्रेसिया से भी होती है।वे उसे उदयपुर के सिटी पैलेस सहित मेवाड़ के राजाओं की प्राचीन राजधानी चित्तौड़गढ़ की सैर करवाते हुए इन ऐतिहासिक स्थलों और वहाँ की प्राचीन धरोहरों के बारे में बताते हैं।बीच में एक गाइड भी आता है ।

लेखक और ग्रेसिया भीलवाड़ा का भी भ्रमण करते हैं। चित्तौड़गढ़ की यात्रा में लेखक उन्हें महारानी पद्मिनी और महारानी कर्णावती के साथ हज़ारों क्षत्राणियों के जौहर के प्रसंग भी याद दिलाते हैं। साथ ही मीराबाई की भक्ति और महाराणा कुंभा, महाराणा प्रताप, महाराणा संग्राम सिंह जैसे नरेशों की गाथाओं का भी उल्लेख होता है।

यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली द्वारा वर्ष 2019 में प्रकाशित इस उपन्यास का यह पहला संस्करण है ।  कीमत है 199 रूपए। मुख्य रूप से पर्यटन ब्लॉगर ललित शर्मा छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के अंतर्गत अभनपुर के निवासी हैं। उन्होंने पत्रकारिता से अपना कैरियर शुरु किया था और आगे चलकर वर्ष 2009 में इंटरनेट आधारित ब्लॉग जगत से जुड़ गए।

अपने ब्लॉग ललित डॉट कॉम में इन्होंने छत्तीसगढ़ और भारत के इतिहास, पुरातत्व, हस्त शिल्प और आम जन जीवन की सामाजिक, सांस्कृतिक विशेषताओं पर सैकड़ों लेख लिखे। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक स्थल सिरपुर पर उनकी पुस्तक ‘सिरपुर :सैलानी की नज़र से ‘ काफी चर्चित हुई।  उनकी एक अन्य पुस्तक ‘सरगुजा का रामगढ़ ‘ भी है, जो छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित रामगढ़ पर्वत के इतिहास और पुरातत्व पर आधारित है। इसके अलावा उनका व्यंग्य संग्रह ‘चमचा साधै सब सधै ‘ भी ख़ूब चर्चित हुआ है. इसके साथ ही घुमक्कड़ जंक्शन सालाना पत्रिका का भी प्रकाशन करते हैं। इन दिनों वे ‘न्यूज एक्सप्रेस डॉट कॉम ‘के सम्पादक हैं. वे अब ललित शर्मा और आचार्य ललित मुनि के नाम से भी जाने जाते हैं.

आलेख -स्वराज्य करुण