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सभ्यता की दौड़ में खोती मानवीय संवेदनाएँ

डॉ. नितिन सहारिया

देश में ‘ दूर के ढोल सुहावने ‘ वाली कहावत बहुत करके सही सिद्ध होती है। चंद्रमा रात्रि के समय कितना सुंदर लगता है, कवि उसका बखान करते नहीं थकते, पर वास्तविकता कुछ और ही है। सर्प कितना सुंदर लगता है! धूप में उसकी चाल, चमक और आकृति देखते ही बनती है! जिन्हें उनकी असलियत मालूम नहीं वह बच्चे उसे पकड़ने दौड़ते हैं यदि गलती से उनमें से कोई पकड़ बैठे तो वह खिलौना क्षण भर में जीवन समाप्त कर देगा। प्राचीनकाल में ऐसी विषकन्या होती थी जिनका रूप, यौवन देखते ही बनता था, किंतु उनके सत्संग में आते ही प्राण घातक रोगों में फंस जाता था। ऐसी ही विषकन्या आजकल पाश्चात्त्य सभ्यता के रूप में देखी जा सकती है।

अमेरिका ,अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड जैसे देशों की खाली भूमि पर कब्जा कर लेने के उपरांत गोरे लोगों को वहां प्रकृति संपदा पर आधिपत्य करने का अवसर मिला और देखते-देखते थोड़े ही दिनों में वे मालामाल हो गए। विज्ञान के विकास का भी यही युग था। अधिक कमाई करने वाले यंत्रों का निर्माण उसी पैसे से हुआ। उपनिवेशों में माल खपाने का अवसर मिला। इस प्रकार कुछ ही शताब्दियों में छप्पर फाड़ कर दौलत उन पर बरसी।

इस उपलब्ध संपन्नता का उपयोग कहां हो इसके लिए संकीर्ण मनोवृत्ति एवं सुविधा- संपादन और विलासिता के बढ़ते हुए साधन, यह दो ही काम दृष्टिगोचर हुए। वे भारत के अनुयाई थोड़े ही थे, जो अपनी बुद्धि- वैभव से संसार के कोने-कोने में बिखर कर वहां के निवासियों को सुविकसित और सुसंस्कृत बनाने का प्रयास करते और इसके लिए स्वयं कष्ट सहते।

पाश्चात्य देशों के हाथों में पहुंची विपुल संपदा ने जहां शिक्षा, चिकित्सा जैसे उपयोगी साधन बढ़ाए, वहां विलासिता की सामग्री जुटाने में भी कमी न रखी। यह लंबे समय का इतिहास नहीं है, अभी दो शताब्दियों मुश्किल से बीती हैं कि वे क्षेत्र विलासिता की चरम सीमा को छूने लगे। उनकी रुचि के व्यंजन, पकवान और स्वच्छंद यौनाचार ,आकर्षक सज- धज उन क्षेत्रों के सर्वसाधारण को उपलब्ध हो गए। वाहन के लिए मोटर ,परस्पर वार्ता के लिए टेलीफोन, घर बैठे सिनेमा देखने के लिए टेलीविजन जैसे अनेकानेक उपकरण हर किसी को उपलब्ध हुए। अंधाधुंध आमदनी का आखिर उपयोग भी और किन कामों में होता!

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यह उमंग भरी लहर थोड़े ही दिनों में अपना प्रभाव दिखाने लगी। परिवार टूटे विलास की स्वछंदता में पति-पत्नी का साथ रहना ही पर्याप्त था। न अभिभावकों को संतान से कुछ आशा और न संतान के लिए अभीभावको का कोई बड़ा त्याग। बूढ़ो के लिए संपन्न देशों में मवेशीखाने बन गए और बच्चों के लिए अनाथालय। संतान और अभिभावक के बीच रहने वाली आत्मियता ही एक प्रकार से समाप्त हो गई।

यौन- स्वेच्छाचार में हर किसी को नवीनता की ललक रहने लगी। फलतः तलाकों का एक खिलवाड़ जैसा प्रचलन हो गया। विवाह एक चिन्ह पूजा है, जिसे करने के उपरांत दोनों साझेदारों में से कोई नहीं जानता कि यह समझौता कितने दिन चल सकता है और कितने दिन बाद वह टूट जाएगा। उठती उम्र की लड़कियों को पुरानी मित्रता छोड़कर उनके साथ नए संबंध जोड़ने के लिए फुसलाने वाले अनेकों होते हैं और भी लड़कियां भी देखती हैं कि अधिक लाभदायक सौदा कौन- सा है।

स्त्री की भांति पुरुष भी इसी फिराक में रहते हैं ‘नया सो सुहावना’ के फेर में आज विवाह, कल तलाक का मखौल बनता रहता है। कुछ ही साल में स्थिति उलट जाती है। स्त्रियों की ढलती आयु आते ही उन्हें अपने लिए घोंसला ढूंढना पड़ता है। उन्हें कोई मुश्किल से ही कुछ दिन अपनी डाल पर बैठने देता है। दोनों ओर से जब मजबूरियां सामने आ जाती हैं, तभी कुछ ऐसा भरोसा बनता है कि शायद टिकाऊ पन बना रहे। दांपत्य जीवन में हर घड़ी इस तरह चौकन्ना रहना पड़ता है, मानो किसी ठग -जालसाज के साथ दिन गुजरने पड़ रहे हो। संतान और अभिभावकों का रिश्ता तभी तक है, जब तक पंख नहीं उगते। लड़के हो या लड़कियां, जब कुछ कमाने लायक हो जाते हैं, अपना अलग घोंसला बनाते हैं।

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ऐसी दशा में मुसीबत के समय कोई किसी से आशा अपेक्षा नहीं करता । अजीविका कोई ही सब कुछ मानकर चलना पड़ता है। ऐसी दशा में अनिश्चितता और उदिग्न्ता की मन: स्थिति बनी रहती है। इस तनाव को हल्का करने के लिए नशेबाजी ही एकमात्र अवलंबन रह जाता है। सिगरेट, शराब और मादक औषधीयाँ ही जीवन की आवश्यकता बन जाती हैं। आधी रात नाटक ,कैब्रे देखने में बीत जाती है, शेष आधा समय नींद की नशीली गोलियां लेकर झपकियां लेते हुए बिताना पड़ता है। भोजन के लिए आधी पारियां होटल में बितानी पड़ती हैं। घर पर खाने वाले या तो बहुत गरीब या बहुत अमीर होते हैं।

अब नौजवानों का एक नया शौक बना है- किसी की भी जान लेना, पिस्तौल तानकर जेब खाली करा लेना या दो-तीन का गिरोह बनाकर किसी अकेले या दुकेले की गर्दन मरोड़ देना। यह धंधा अच्छी आमदानी का भी है और अपनी चतुरता का रौब दिखाने का भी। नई पीढ़ी के आवारा लोगों के लिए दादागिरी सुलभ- सी बनती जा रही है और अच्छे खासे नफे की भी। जो लड़के मां-बाप से पटरी नहीं बैठाते और पढ़ाई में मन न लगने के कारण अधकचरा रह जाते हैं, उन्हें बड़े लोगों जैसा काम तो मिलता नहीं। हल्की नौकरी में शानदार ढंग से गुजारा कैसे चले, इस समस्या का हल उन्हीं की बिरादरी के आवारा लोग आसानी से सिखा देते हैं। गिरोह बनते देर नहीं लगती है। पहले कमजोर लोगों पर हाथ साफ करते हैं, बाद में जिनकी भारी जेब देखते हैं, उनका पीछा करते हैं।

वे भले आदमी, जिनका पैसों से वास्ता है और लफंगों की करतूतें सुनते रहते हैं, उन्हें हर समय भयभीत और चौक्न्न्ना रहना पड़ता है। आगे-पीछे, दाएं- बाएं देखकर चलते हैं, कहीं कोई दादा तो पीछे नहीं लग रहा है! इन गिरोहों में लड़कियां आसानी से साझेदार हो जाती हैं। वे सेक्स प्रलोभन से किसी को इधर से उधार ले जाती हैं और गिरोह के दूसरे लोग मौका देखते ही शिकार दबोच लेते हैं। ऐसी घटनाएं जिन्होंने सुन रखी हैं वे फूँक- फूककर पैर रखते हैं। उन्हें हर घड़ी खैर मनाते ,जान बचाते हुए जहां जाना है, वहां पहुंचते हैं। घर पहुंचते ही भीतर से ताला बंद कर लेते हैं और किसी के आवाज देने पर तब तक नहीं खोलते जब तक की आवाज पहचानी हुई और उसके विश्वस्त होने की संभावना न हो जाए।

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अखबार में चोरी- डकैती की घटनाएं बड़े अक्षरों में छपती रहती हैं। तीसरे युद्ध के लिए बने हथियारों और अंतरिक्ष में टूट पड़ने वाले कहर के संबंध में सुविस्तरित लेखो को पढ़कर कमजोर तबीयत के लोग सोचने लगते हैं कि मानो वह सभी मुसीबत उन्हीं के लिए रची गई है और कल नहीं तो परसों, उन्हीं के सिर पर गिरेगी। यह स्थिति अपने देश के बड़े शहरों में भी देखी जा सकती है।

ऐसी स्थिति में प्रगति भौतिक दृष्टि से कितनी ही क्यों न हो गई हो, ये व्यक्ति आदिमयुग में जीते हुए कहे जाएंगे। जहां गति वह मति का समुचित समन्वय नहीं होता, वहां यही स्थिति होती है। अच्छा हो, सभ्यता के विकास के साथ संस्कृति का भी विकास हो, अंत में सुसंस्कारिता पनपे। तब ही वास्तविक प्रगति मानी जा सकती है। आज की खोखली पाश्चात्य सभ्यता हम सबके लिए एक सबक है।

भारत में कुछ अज्ञानी , उथले, मृगमरीचिका में भटके हुए लोग पश्चिम की ओर ललायित हैं व भोगवाद को बहुत अच्छा मानते हैं; जो की बुद्धिमत्ता का पर्याय तो नहीं है, जो व्यक्ति अपनी भारतीय संस्कृति -देव संस्कृति को छोड़कर गटर में ही सुख देखने लगे तो भला उससे निरा मूर्ख कौन होगा?