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बदलता भारत और टूटती सामाजिक मर्यादाएं

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

भारत के भीतर आज जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, उसे केवल आधुनिकता कहकर समझना बहुत बड़ी भूल होगी। यह केवल कपड़ों, मोबाइल और तकनीक का परिवर्तन नहीं है। यह समाज की आत्मा, परिवार व्यवस्था, संबंधों की मर्यादा और आने वाली पीढ़ियों की मानसिक संरचना को बदलने की प्रक्रिया है। सबसे भयावह बात यह है कि यह सब धीरे-धीरे इतना सामान्य बना दिया गया कि लोगों को समझ ही नहीं आया कि उनके आसपास क्या बदल चुका है।

यदि कोई व्यक्ति 1990 के दशक का भारत और आज का भारत एक साथ रखकर देखे, तो उसे समझ में आएगा कि समाज केवल आगे नहीं बढ़ा, बल्कि उसकी दिशा ही बदल दी गई।

आज से तीस वर्ष पहले छोटे शहरों और गांवों में लड़का और लड़की का संबंध भाई-बहन की दृष्टि से देखा जाता था। विद्यालयों और महाविद्यालयों में यदि कोई लड़का किसी लड़की से अधिक बात कर लेता था, तो पूरा मोहल्ला चर्चा करने लगता था। परिवारों में मर्यादा थी। रिश्तों में सीमाएं थीं। भाभी को मां समान माना जाता था। पड़ोस की स्त्री को “आंटी” कहने का अर्थ सम्मान होता था।

लेकिन आज सोशल मीडिया, वेब सीरीज़, ओटीटी और डिजिटल संस्कृति ने रिश्तों की पूरी परिभाषा बदल दी है।

आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो मंचों पर ऐसे हजारों वीडियो मिल जाएंगे जिनमें “भाभी”, “आंटी”, “क्रश”, “सीक्रेट रिलेशन”, “हुकअप”, “एक्स”, “सिचुएशनशिप” जैसे शब्द सामान्य मनोरंजन की तरह प्रस्तुत किए जाते हैं। जो संबंध भारतीय समाज में सम्मान और मर्यादा के प्रतीक थे, उन्हें धीरे-धीरे कामुक हास्य और आकर्षण का विषय बना दिया गया।

सोचिए, यह परिवर्तन कितना गहरा है।

पहले किसी लड़के को अपने मित्र की भाभी के सामने बैठने में भी संकोच होता था। आज सोशल मीडिया पर “भाभी कंटेंट” करोड़ों व्यू प्राप्त कर रहा है। “आंटी रोमांस” और “नेबर क्रश” जैसे विषय सामान्य मनोरंजन की तरह प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

यह केवल मनोरंजन नहीं है। यह समाज की मानसिक संरचना को बदलने का काम है।

बॉयफ्रेंड” और “गर्लफ्रेंड” जैसे शब्द इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। आज से 25-30 वर्ष पहले गांवों और छोटे कस्बों में इन शब्दों का कोई अस्तित्व नहीं था। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लड़का और लड़की के संबंध को भाई-बहन की दृष्टि से देखा जाता था।

मैं स्वयं छोटे शहर और कस्बे के वातावरण से आया हूं। आज से दस वर्ष पहले तक रीवा जैसे शहरों में विद्यालय की आयु के बच्चों के बीच “रिलेशनशिप” की चर्चा सामान्य नहीं थी। लेकिन आज गली, चौराहे, कोचिंग और आटो तक में आठवीं-नौवीं के बच्चे “क्रश”, “ब्रेकअप” और “बॉयफ्रेंड” की बातें करते मिल जाते हैं।

एक बार मैं आटो में बैठा था। मेरे बगल में बैठी आठवीं कक्षा की लड़की मोबाइल पर अपने “बॉयफ्रेंड” से जिस प्रकार बात कर रही थी, उसे सुनकर मुझे स्वयं शर्म महसूस हुई। लेकिन उसे नहीं हुई। यही सबसे बड़ा परिवर्तन है। पहले समाज के भीतर मर्यादा थी। आज मर्यादा को “ओल्ड फैशन” कहकर तोड़ा जा रहा है।

धीरे-धीरे बच्चों और किशोरों के मन में यह स्थापित किया गया कि हर संबंध संभावित “रिलेशन” है। कोई रिश्ता केवल सम्मान का नहीं रह गया।

यही कारण है कि आज आठवीं-नौवीं के बच्चे “क्रश”, “ब्रेकअप”, “बॉयफ्रेंड”, “गर्लफ्रेंड” और “डेट” जैसे शब्द सामान्य बातचीत में प्रयोग करते हैं। यहीं सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ है।

पहले समाज के भीतर मर्यादा भीतर से आती थी। आज मर्यादा को “ओल्ड फैशन” और “टॉक्सिक कल्चर” कहा जा रहा है।

लोग सोचते हैं कि यह सब अचानक हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। पिछले तीस वर्षों में फिल्मों, धारावाहिकों, विज्ञापनों, वेब सीरीज़, सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने लगातार एक नई जीवनशैली को सामान्य बनाया।

1990 के दशक के पहले भारतीय फिल्मों में प्रेम भी मर्यादा के भीतर दिखाया जाता था। उसके बाद “डेटिंग संस्कृति” को आधुनिकता के रूप में प्रस्तुत किया गया। फिर लिव-इन रिलेशनशिप को “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” कहा गया। आज ओटीटी मंचों पर विवाहोत्तर संबंध, परिवार विरोध, माता-पिता के विरुद्ध विद्रोह और कामुकता को सामान्य जीवनशैली की तरह दिखाया जाता है।

नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने पूरी पीढ़ी की मानसिक संरचना बदल दी।

DataReportal 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। औसत भारतीय प्रतिदिन लगभग 3 से 4 घंटे सोशल मीडिया पर व्यतीत कर रहा है। किशोर आयु वर्ग का सबसे बड़ा समय इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो मंचों पर बीत रहा है।

अब सोचिए, जिस बच्चे का बचपन दादा-दादी की कहानियों, रामायण, खेल के मैदान और परिवार के बीच बीतना चाहिए था, उसका बचपन एल्गोरिद्म चला रहे हैं। यहीं “जेन-ज़ेड संघर्ष” शुरू होता है।

कुछ वर्ष पहले तक भारत में “जेन-ज़ेड” शब्द कोई नहीं जानता था। लेकिन 2024-25 के बाद अचानक यह शब्द मीडिया, विश्वविद्यालयों और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। नेपाल में सितंबर 2025 में हुए हिंसक आंदोलनों के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने उसे “Gen-Z Revolution” कहना शुरू किया।

यहीं समझने की आवश्यकता है कि यह केवल छात्रों का आंदोलन नहीं था। इसे “नई पीढ़ी बनाम पुरानी व्यवस्था” के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया।

फिर यही मानसिकता भारत में भी फैलाई गई। सोशल मीडिया पर लगातार यह बताया जाने लगा कि माता-पिता पुरानी सोच वाले हैं। परिवार स्वतंत्रता में बाधा है। धर्म दमनकारी है। विवाह पुरानी व्यवस्था है।

धीरे-धीरे बच्चों के मन में यह डाला गया कि परिवार मार्गदर्शक नहीं, बल्कि “कंट्रोलिंग सिस्टम” है।

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यही सबसे खतरनाक स्थिति है। जिस दिन बच्चा अपने पिता को शत्रु की दृष्टि से देखने लगेगा, उस दिन परिवार समाप्त हो जाएगा। और जिस समाज का परिवार समाप्त हो जाता है, वह समाज धीरे-धीरे भीतर से मरने लगता है।

यहीं ग्लोबल मार्केट फोर्सेज की भूमिका को ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक हो जाता है। यह मान लेना कि दुनिया पर आर्थिक और वैचारिक प्रभाव डालने वाली शक्तियां अचानक 21वीं सदी में पैदा हुईं, इतिहास को बहुत छोटे दायरे में देखना होगा। आधुनिक वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की जड़ें लगभग तीन सौ वर्षों पुराने औपनिवेशिक ढांचे, यूरोपीय साम्राज्यवाद, चर्च आधारित विस्तारवाद, समुद्री व्यापारिक कंपनियों और वैश्विक बैंकिंग नेटवर्क तक जाती हैं।

1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई। प्रारंभ में वह केवल व्यापारिक कंपनी के रूप में आई, लेकिन धीरे-धीरे उसने भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सामाजिक संरचना तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया। इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने अपनी पुस्तक The Case for India में लिखा था कि ब्रिटिश शासन केवल राजनीतिक शासन नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को बदलने वाली प्रक्रिया भी था।

औपनिवेशिक शासन केवल सेनाओं के माध्यम से नहीं चलता था। उसके साथ चर्च, मिशनरी नेटवर्क, शिक्षा व्यवस्था और व्यापारिक हित भी जुड़े रहते थे। थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने 1835 की अपनी प्रसिद्ध “मैकॉले मिनट” में स्पष्ट लिखा था कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था तैयार की जाए जो “रक्त और रंग से भारतीय लेकिन विचार और मानसिकता से अंग्रेज” वर्ग तैयार करे। यही वह दौर था जब भारतीय समाज की पारंपरिक शिक्षा, गुरुकुल व्यवस्था और सांस्कृतिक आत्मविश्वास पर सबसे बड़ा आघात हुआ।

इतिहासकार कैरोल क्विगली ने अपनी पुस्तक Tragedy and Hope में वैश्विक वित्तीय नेटवर्कों और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव संरचनाओं की चर्चा की थी। वहीं इमैनुएल वालरस्टीन ने World-Systems Theory के माध्यम से बताया कि आधुनिक विश्व व्यवस्था आर्थिक केंद्रों और परिधियों में विभाजित होकर काम करती है, जहां कुछ शक्तिशाली आर्थिक केंद्र दुनिया की बड़ी नीतियों को प्रभावित करते हैं।

अमेरिकी समाजशास्त्री डैनियल बेल ने The Cultural Contradictions of Capitalism में लिखा था कि आधुनिक उपभोक्तावादी व्यवस्था अंततः उन्हीं नैतिक मूल्यों को कमजोर करने लगती है जिन पर समाज की स्थिरता आधारित होती है। यही कारण है कि आज आर्थिक प्रगति के साथ परिवार व्यवस्था, सामुदायिक जीवन और सामाजिक स्थिरता कई देशों में कमजोर होती दिखाई दे रही है।

पहले भारतीय समाज में परिवार केवल भावनात्मक संस्था नहीं था, बल्कि आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का भी केंद्र था। संयुक्त परिवार में संसाधन साझा होते थे। एक व्यक्ति कमाता था, लेकिन उसका लाभ पूरे परिवार को मिलता था। गांवों और कस्बों में सामूहिक जीवन था। विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों और कई पीढ़ियों का संबंध माना जाता था।

लेकिन जैसे-जैसे उपभोक्तावादी मॉडल बढ़ा, परिवार छोटे होते गए। अलग घर, अलग वाहन, अलग मोबाइल, अलग डिजिटल जीवन — यह सब आधुनिक बाजार के विस्तार का हिस्सा बन गया। पहले एक घर में एक रेडियो या एक टीवी होता था, आज परिवार के हर सदस्य के हाथ में अलग स्क्रीन है। पहले परिवार साथ बैठकर भोजन करता था, आज एक ही घर में लोग अलग-अलग कमरों में मोबाइल देखते हुए भोजन कर रहे हैं।

यही कारण है कि आधुनिक बाजार को सबसे अधिक लाभ अकेले व्यक्ति से होता है। मजबूत परिवार सीमित उपभोग करता है, जबकि अकेला व्यक्ति अधिक उपभोग करता है। उसे अधिक मनोरंजन चाहिए, अधिक डिजिटल सामग्री चाहिए, अधिक ऑनलाइन खरीदारी चाहिए और लगातार मानसिक संतुष्टि के नए साधन चाहिए।

अमेरिकी लेखक रॉबर्ट पुटनम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Bowling Alone में लिखा कि आधुनिक समाज में सामूहिक सामाजिक जीवन कमजोर होने से लोग अधिक अकेले और सामाजिक रूप से कटे हुए होते जा रहे हैं। उन्होंने अपने शोध में दिखाया कि जैसे-जैसे सामुदायिक और पारिवारिक संबंध कमजोर हुए, वैसे-वैसे मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव बढ़ा।

आज सोशल मीडिया मंच केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गए हैं। वे व्यवहार निर्माण का तंत्र बन चुके हैं। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू और MIT Sloan के शोधों में यह चर्चा हुई है कि एल्गोरिद्म आधारित डिजिटल मॉडल लोगों का अधिक समय स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए उत्तेजक और भावनात्मक सामग्री को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि “भाभी रोमांस”, “आंटी क्रश”, “हुकअप”, “सीक्रेट रिलेशन”, “कैजुअल डेटिंग” और “क्षणिक सुख” जैसी सामग्री सबसे तेजी से फैलती है।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जोनाथन हैइट ने 2024 में प्रकाशित अपनी पुस्तक The Anxious Generation में लिखा कि मोबाइल आधारित डिजिटल संस्कृति ने बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार और संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है। उनके अनुसार स्क्रीन आधारित जीवन ने वास्तविक सामाजिक संबंधों को कमजोर किया और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ाई।

यह केवल सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक संरचना से जुड़ा परिवर्तन भी है। ब्लैकरॉक, वैनगार्ड और स्टेट स्ट्रीट जैसे निवेश समूह आज दुनिया की हजारों कंपनियों में हिस्सेदारी रखते हैं। 2024 की वित्तीय रिपोर्टों के अनुसार केवल ब्लैकरॉक लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक संपत्ति प्रबंधन कर रहा था। तकनीक कंपनियां, मनोरंजन उद्योग, समाचार नेटवर्क, डिजिटल मंच और दवा कंपनियां — सब कहीं न कहीं वैश्विक निवेश संरचनाओं से जुड़े हुए हैं।

जेम्स बर्नहैम ने The Managerial Revolution में लिखा था कि आधुनिक दुनिया में सत्ता केवल निर्वाचित सरकारों के हाथ में नहीं रहती, बल्कि बड़े आर्थिक और संस्थागत नेटवर्कों के हाथ में केंद्रित होने लगती है। यही कारण है कि विश्व आर्थिक मंच (WEF), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन (WTO), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की नीतियों का प्रभाव दुनिया भर की सरकारों पर दिखाई देता है। कोविड काल में लगभग पूरी दुनिया द्वारा समान प्रकार की नीतियां अपनाना इस वैश्विक समन्वय का उदाहरण माना गया है ।

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इसी संदर्भ में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा 1848 में लिखी गई The Communist Manifesto तथा बाद में फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों हर्बर्ट मार्क्यूज़, थियोडोर अडोर्नो और मैक्स होर्खाइमर के सिद्धांतों को समझना आवश्यक हो जाता है। प्रारंभिक मार्क्सवाद मुख्य रूप से आर्थिक वर्ग संघर्ष पर आधारित था, लेकिन 20वीं सदी में यह विचार विकसित हुआ कि केवल आर्थिक संघर्ष से समाज की मूल संरचना नहीं बदली जा सकती। इसलिए संस्कृति, परिवार, धर्म, शिक्षा और मीडिया को वैचारिक संघर्ष का केंद्र बनाया गया।

हर्बर्ट मार्क्यूज़ की पुस्तक One-Dimensional Man और थियोडोर अडोर्नो के सांस्कृतिक अध्ययन यह संकेत देते हैं कि आधुनिक संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। यही कारण है कि आज मीडिया, विश्वविद्यालय, फिल्म उद्योग, ओटीटी और सोशल मीडिया समाज की सोच को प्रभावित करने के सबसे बड़े माध्यम बन चुके हैं।

यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। यदि मार्क्सवाद मूल रूप से पूंजीवाद के विरोध का विचार था, तो फिर पश्चिमी पूंजीवादी देशों के विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों और सांस्कृतिक उद्योगों में मार्क्सवादी और उत्तर-मार्क्सवादी विचारों को इतना व्यापक स्थान क्यों मिला?

फ्रैंकफर्ट स्कूल के अधिकांश विचारकों को जर्मनी छोड़ने के बाद अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में स्थान मिला। पश्चिमी फाउंडेशन, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक संस्थान इन विचारों के बड़े मंच बने। इतिहासकार कैरोल क्विगली ने अपनी पुस्तक Tragedy and Hope में वैश्विक वित्तीय नेटवर्कों और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव तंत्रों की चर्चा की है। वहीं जेम्स बर्नहैम ने The Managerial Revolution में लिखा कि आधुनिक दुनिया में सत्ता केवल निर्वाचित सरकारों के हाथ में नहीं रहती, बल्कि बड़े आर्थिक और संस्थागत नेटवर्कों के हाथ में केंद्रित होने लगती है।

आज ब्लैकरॉक, वैनगार्ड और स्टेट स्ट्रीट जैसे वैश्विक निवेश समूह दुनिया की हजारों बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी रखते हैं। 2024 की वित्तीय रिपोर्टों के अनुसार केवल ब्लैकरॉक लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक संपत्ति प्रबंधन कर रहा था। तकनीक कंपनियां, मनोरंजन उद्योग, समाचार नेटवर्क, दवा कंपनियां और डिजिटल मंच सब कहीं न कहीं वैश्विक निवेश संरचनाओं से जुड़े हुए हैं।

यहीं ग्लोबल मार्केट फोर्सेज और आधुनिक सांस्कृतिक मार्क्सवाद के बीच संबंध की चर्चा होती है। पहली दृष्टि में यह विरोधाभास लगता है कि पूंजीवादी आर्थिक शक्तियां और चरम वामपंथी सांस्कृतिक विचार एक साथ कैसे चल सकते हैं। लेकिन व्यवहार में दोनों कई बार एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं।

चरम वामपंथी विचार परिवार, धर्म, परंपरा और सांस्कृतिक संरचनाओं को “दमनकारी व्यवस्था” बताकर कमजोर करते हैं। दूसरी ओर ग्लोबल मार्केट फोर्सेज उस टूटे हुए समाज को उपभोक्ता बाजार में बदल देती हैं।

यदि परिवार मजबूत रहेगा, तो बाजार सीमित रहेगा। संयुक्त परिवार कम उपभोग करता है। साझा संसाधनों का उपयोग करता है। लेकिन अकेला व्यक्ति सबसे बड़ा उपभोक्ता बनता है अलग घर, अलग वाहन, अलग मनोरंजन, अलग सदस्यता, अलग डिजिटल जीवन। यही कारण है कि आधुनिक उपभोक्तावादी मॉडल में “व्यक्ति सर्वोपरि” की मानसिकता को लगातार बढ़ाया गया।

आज यदि कोई सामान्य व्यक्ति अपने आसपास के समाज को ध्यान से देखे, तो उसे समझ में आने लगेगा कि बदलाव केवल कपड़ों, मोबाइल और तकनीक में नहीं आया है। बदलाव लोगों की सोच, रिश्तों और परिवार को देखने के तरीके में आया है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह परिवर्तन धीरे-धीरे इतना सामान्य बना दिया गया कि लोगों को पता ही नहीं चला कि समाज कब बदल गया।

पहले गांवों और छोटे शहरों में रिश्तों के भीतर एक मर्यादा होती थी। “भाभी” शब्द सुनते ही मन में सम्मान आता था। “आंटी” कहने का अर्थ परिवार जैसा अपनापन होता था। लड़का और लड़की साथ पढ़ते थे, लेकिन संबंधों के बीच एक दूरी और संकोच बना रहता था।

आज मोबाइल खोलते ही क्या दिखाई देता है? “भाभी रोमांस”, “आंटी क्रश”, “सीक्रेट रिलेशन”, “हुकअप”, “एक्स को वापस कैसे लाएं”, “पति को धोखा कैसे दें”, “पत्नी की जासूसी”, “कैजुअल रिलेशनशिप” — यह सब आज सामान्य मनोरंजन बन चुका है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब का एल्गोरिद्म वही सामग्री सबसे अधिक आगे बढ़ाता है जिससे लोग अधिक देर तक स्क्रीन से चिपके रहें।

धीरे-धीरे यह सब नई पीढ़ी के लिए सामान्य भाषा बन गई। आज आठवीं-नौवीं के बच्चे “क्रश”, “ब्रेकअप”, “बॉयफ्रेंड”, “गर्लफ्रेंड” और “डेट” जैसे शब्द वैसे बोलते हैं जैसे पहले बच्चे खेल और पढ़ाई की बात करते थे।

मैं स्वयं छोटे शहर के वातावरण से आता हूं। कुछ वर्ष पहले तक रीवा जैसे शहरों में विद्यालय की आयु के बच्चों के बीच “रिलेशनशिप” की खुली चर्चा सामान्य नहीं थी। लेकिन आज कोचिंग, चौराहों और आटो तक में यह सब सहज रूप से सुनाई देता है।

समस्या केवल शब्दों की नहीं है। समस्या यह है कि समाज संबंधों को देखने का तरीका बदल रहा है। आज समाचारों में ऐसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं जिन्हें कुछ दशक पहले लोग असाधारण मानते थे। कहीं विवाह के अगले दिन पति को पता चलता है कि पत्नी पहले से गर्भवती थी। कहीं पति ने वर्षों तक मेहनत करके पत्नी को पढ़ाया, नौकरी लगवाई, और बाद में पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ चली गई। कहीं विवाहोत्तर संबंधों के कारण परिवार टूट रहे हैं। कहीं पति-पत्नी के बीच अविश्वास इतना बढ़ जाता है कि मामला हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाता है।

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यह बातें अब केवल फिल्मों की कहानी नहीं रहीं। छोटे शहरों और कस्बों तक में लोग ऐसे उदाहरण अपने आसपास देखने लगे हैं। समाज में एक और असंतुलन दिखाई देता है। यदि दहेज उत्पीड़न या महिलाओं के साथ हिंसा की घटना होती है, तो उस पर व्यापक चर्चा होती है, जो आवश्यक भी है। लेकिन दूसरी ओर यदि पति मानसिक तनाव, वैवाहिक विवाद, झूठे मुकदमों या पारिवारिक दबाव में आकर आत्महत्या कर ले, तो उस पर उतनी गंभीर चर्चा नहीं होती।

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) की 2024 रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1.7 लाख से अधिक आत्महत्याएं दर्ज की गईं। इनमें सबसे बड़ा कारण “पारिवारिक समस्याएं” बताया गया। विवाहित पुरुषों की आत्महत्या संख्या विवाहित महिलाओं से अधिक दर्ज की गई। लेकिन सामाजिक विमर्श किस दिशा में चलता है, यह भी देखने योग्य है। यदि किसी स्त्री के साथ दहेज या उत्पीड़न की घटना होती है, तो उस पर व्यापक विमर्श होता है, जो होना भी चाहिए। लेकिन पत्नी प्रताड़ना से परेशान होकर पुरुष आत्महत्या कर ले, पत्नी द्वारा पति की हत्या हो जाए, विवाहोत्तर अवैध संबंधों के कारण परिवार टूट जाए इन विषयों पर सार्वजनिक विमर्श लगभग नहीं होता।

इसी प्रकार LGBTQ+ के लिए प्राइड परेड निकाली जाती है, लेकिन भारत की घुमंतू जातियां, जिनकी संख्या विभिन्न सामाजिक अध्ययनों के अनुसार लगभग 10 से 11 करोड़ मानी जाती है, उनके जीवन, शिक्षा और अस्तित्व पर कोई वैश्विक अभियान नहीं चलता। क्योंकि वहां बाजार नहीं है। वहां वैचारिक लाभ नहीं है।।

आज परिवार न्यायालयों में तलाक और वैवाहिक विवादों के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पहले विवाह को जीवन भर निभाने का संस्कार माना जाता था। आज कई बार कुछ महीनों के भीतर ही संबंध टूटने की नौबत आ जाती है।

इस परिवर्तन के पीछे केवल व्यक्तिगत स्वभाव जिम्मेदार नहीं है। पिछले तीस वर्षों में फिल्मों, वेब सीरीज़, सोशल मीडिया और डिजिटल संस्कृति ने “क्षणिक सुख” और “अपने लिए जीने” की मानसिकता को बहुत तेजी से बढ़ाया है।

विश्व के दूसरे देशों के अनुभव भी चेतावनी देते हैं। दक्षिण कोरिया की जन्मदर 2024 में 0.72 तक पहुंच गई, जो विश्व में सबसे कम मानी जाती है। जापान में लाखों लोग अकेले जीवन जी रहे हैं। वहां “कोडोकुशी” यानी अकेले मर जाने की घटनाएं सामाजिक समस्या बन चुकी हैं। अमेरिका और यूरोप में विवाह दर घट रही है और तलाक बढ़ रहे हैं।

जब परिवार कमजोर होता है, तब समाज में अकेलापन बढ़ता है। मानसिक तनाव बढ़ता है। लोग भावनात्मक रूप से अस्थिर होते हैं। और फिर वही व्यक्ति सबसे बड़ा उपभोक्ता बन जाता है अलग घर, अलग जीवन, अलग मनोरंजन, अलग दुनिया।

भारत अभी भी इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि यहां परिवार पूरी तरह टूटा नहीं है। यहां आज भी माता-पिता बच्चों के लिए त्याग करते हैं। यहां आज भी त्योहार परिवार को जोड़ते हैं। यहां आज भी गांवों और कस्बों में लोग एक-दूसरे के दुःख-सुख में खड़े होते हैं।

लेकिन यदि आने वाली पीढ़ियां केवल मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल संस्कृति से सीखेंगी, परिवार और संस्कार से नहीं, तो आने वाले वर्षों में समाज का स्वरूप और तेजी से बदल सकता है।

सैमुअल हंटिंगटन ने 1996 में अपनी पुस्तक The Clash of Civilizations में लिखा था कि भविष्य का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यताओं का संघर्ष होगा। आज विश्व की परिस्थितियों को देखकर यह बात और स्पष्ट दिखाई देती है कि संघर्ष केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि संस्कृतियों, जीवन मूल्यों, परिवार व्यवस्था और सामाजिक संरचनाओं का भी है।

महर्षि अरविंद ने 1909 के उत्तरपाड़ा भाषण में कहा था कि भारत की आत्मा सनातन धर्म में निहित है। यदि सनातन समाप्त हुआ, तो भारत का वास्तविक स्वरूप भी समाप्त हो जाएगा। आज सौ वर्ष बाद उनके शब्द केवल आध्यात्मिक वाक्य नहीं लगते, बल्कि सामाजिक सत्य की तरह दिखाई देते हैं। क्योंकि संघर्ष अब केवल राजनीति या सत्ता का नहीं रहा, बल्कि परिवार, संस्कृति, परंपरा और आने वाली पीढ़ियों की सोच का संघर्ष बन चुका है।

भारत अभी भी इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि यहां परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन की आधारशिला है। यहां आज भी त्योहार लोगों को जोड़ते हैं। यहां आज भी घरों में रामायण का पाठ होता है। यहां आज भी मां अपने बच्चों को केवल भोजन नहीं, संस्कार देती है। यहां आज भी गांवों और कस्बों में लोग एक-दूसरे के दुःख-सुख में खड़े दिखाई देते हैं।

लेकिन यदि आने वाली पीढ़ियां परिवार, धर्म, संस्कार और सांस्कृतिक स्मृति से कट गईं, तो भविष्य का भारत केवल आर्थिक रूप से बड़ा देश बनकर रह जाएगा, भीतर से कमजोर और अकेला समाज बन जाएगा। दुनिया के कई देशों का अनुभव सामने है जहां परिवार कमजोर हुआ, वहां अकेलापन बढ़ा, जन्मदर गिरी, मानसिक तनाव बढ़ा और समाज धीरे-धीरे उपभोग केंद्रित होकर संबंधों से दूर होता गया।

भारत की वास्तविक शक्ति उसकी संसद, उसकी सेना या उसकी अर्थव्यवस्था से पहले उसका परिवार है। क्योंकि भारत की आत्मा आज भी उसके परिवारों, उसके संस्कारों और उसकी सनातन सांस्कृतिक स्मृति में बसती है।