ऋषि परंपरा में योग और संगीत दो पूरक धाराएँ

विश्व योग दिवस और विश्व संगीत दिवस का एक ही दिन होना कोई तिथियों का संयोग नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की दृष्टि से एक गहरा सांस्कृतिक संकेत है। पहली दृष्टि में योग और संगीत दो पृथक धाराएँ प्रतीत होते हैं। योग को हम मौन, ध्यान, संयम और अंतर्मुखता का मार्ग मानते हैं, जबकि संगीत स्वर, लय, ध्वनि और अभिव्यक्ति का संसार है। एक भीतर ले जाता है, दूसरा बाहर फैलता हुआ दिखता है। परंतु ऋषियों की अंतर्दृष्टि में ये दोनों विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। वे एक ही चेतना यात्रा के दो आयाम हैं। महर्षि पतंजलि ने योग का स्वरूप बताते हुए कहा है
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” अर्थात योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
यह निरोध शून्यता नहीं, बल्कि चित्त की उस स्थिरता की प्राप्ति है जिसमें साधक अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है। दूसरी ओर संगीत, यदि केवल मनोरंजन न होकर साधना बने, तो वह चित्त को भटकाता नहीं, बल्कि एकाग्र करता है। स्वर, लय और नाद के सहारे मन की चंचलता क्रमशः एक केंद्र पर टिकने लगती है। इसीलिए भारतीय परंपरा में संगीत को केवल कला नहीं, उपासना और साधना भी माना गया।
भारतीय मनीषा का मूल सिद्धांत है कि सृष्टि का उद्गम नाद से हुआ है। यह नाद सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि वह आदिध्वनि है जिससे समस्त अस्तित्व प्रकट हुआ। इसीलिए संगीत का संबंध केवल कानों से नहीं, अस्तित्व के मूल से माना गया है। वेदों में विशेषतः सामवेद इस सत्य का सजीव प्रमाण है। सामवेद की ऋचाएँ गाई जाती हैं। उनमें शब्द और स्वर अलग नहीं हैं। इसीलिए भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है
“सामवेदोऽस्मि देवानाम्।” अर्थात देवताओं में मैं सामवेद हूँ।
यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है। कृष्ण यहाँ सामवेद को अपनी विभूति के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि संगीत, जब वह शुद्ध, साधित और ईश्वराभिमुख हो, तब वह केवल श्रव्य अनुभव नहीं रहता, बल्कि दिव्यता का माध्यम बन जाता है। सामगान में श्वास की लय, स्वर की शुद्धता, मन की एकाग्रता और भाव की पवित्रता, ये सब मिलकर उसे योग का ही एक रूप बना देते हैं। योग और संगीत के इस अंतरसंबंध का सबसे गहरा बिंदु है ओंकार। माण्डूक्य उपनिषद् कहता है
“ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म।” अर्थात ओम् यह एकाक्षर ब्रह्म है।
भारतीय दर्शन में ओम् केवल उच्चारण नहीं, बल्कि समस्त नादों का मूल है। ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ के संयोग से बना यह प्रणव जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, चेतना की चार अवस्थाओं का भी द्योतक है। योग में यह ध्यान का आधार है और संगीत में मूल नाद का प्रतीक। इसीलिए ओंकार वह बिंदु है जहाँ ध्वनि और मौन, साधना और अनुभूति, योग और संगीत एकाकार हो जाते हैं। महर्षि पतंजलि ने भी ईश्वर साधना के संदर्भ में प्रणव की महिमा स्पष्ट की है
“तस्य वाचकः प्रणवः।” अर्थात उस ईश्वर का वाचक प्रणव अर्थात ओम् है।
यहाँ पतंजलि संकेत देते हैं कि ईश्वर की ओर जाने वाला मार्ग केवल विचार का नहीं, ध्वनि का भी है। प्रणव का जप मन को एकाग्र करता है, प्राणों को संतुलित करता है और चित्त को सूक्ष्मतर स्तरों की ओर ले जाता है। जब यह जप सही स्वर, लंबी श्वास और अंतर्मुख भाव के साथ किया जाता है, तब वह योग भी है और संगीत भी। यही कारण है कि मंत्र साधना, जप और स्वर साधना भारतीय परंपरा में एक दूसरे से पृथक नहीं हैं।
हठयोग परंपरा ने इस संबंध को और भी सूक्ष्म रूप में समझाया है। वहाँ नादयोग का उल्लेख मिलता है, जिसमें साधक बाह्य ध्वनियों से आगे बढ़कर आंतरिक नाद का अनुभव करता है। संगीतशास्त्र में आहत और अनाहत नाद का भेद बताया गया है। आहत नाद वह है जो किसी आघात से उत्पन्न होता है, जैसे वीणा, तबला, बांसुरी या कंठ से निकलने वाली ध्वनि। परंतु अनाहत नाद वह है जो बिना किसी बाहरी टकराव के भीतर प्रकट होता है। योगी जब ध्यान में स्थिर होता है, इंद्रियों को भीतर समेटता है, तब वह इस सूक्ष्म नाद का अनुभव करता है।
यहीं योग का प्रत्याहार और संगीत की तन्मयता एक दूसरे से जुड़ते हैं। प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ना। जब कोई संगीत साधक किसी राग में इतना डूब जाता है कि उसे बाहरी संसार का भान कम होने लगता है, तब वह स्वाभाविक रूप से प्रत्याहार की स्थिति में प्रवेश करता है। इस अवस्था में संगीत केवल सुनने या गाने की वस्तु नहीं रहता, वह ध्यान का माध्यम बन जाता है। ध्रुपद, सामगान, मंत्रोच्चार और भजन कीर्तन की परंपराओं में यह अनुभूति आज भी देखी जा सकती है।
भारतीय परंपरा में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ योग और संगीत एक साथ विकसित हुए। नारद मुनि इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतीक हैं। वे केवल वीणावादक नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान से संपन्न ऋषि माने गए हैं। उनकी वीणा से निकलने वाला स्वर भक्ति, ज्ञान और नाद, तीनों का संगम है। इसी प्रकार सामवेदीय उद्गाता केवल गायक नहीं होता था, वह श्वास, स्वर, लय और ध्यान का साधक भी होता था। उसका गायन यज्ञ का कर्म मात्र नहीं, बल्कि चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने की प्रक्रिया था। कबीर कहते हैं –
कबीर सबद शरीर में, बिनि गुणा बाजै तंति।
बाहरी भीतरी भरि रह्या, ताथैं छुटि भरंति॥
अर्थात: जब शरीर के भीतर अनहद नाद बजता है, तो बिना तारों के भी अनूठी वीणा बजने लगती है। जब यह ध्वनि भीतर और बाहर चारों ओर व्याप्त हो जाती है, तो मनुष्य के सारे भ्रम दूर हो जाते हैं।
मध्यकालीन संत परंपरा में भी यह एकता और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। स्वामी हरिदास, मीराबाई, सूरदास, तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु के यहाँ संगीत भक्ति का साधन है, और भक्ति अंततः योग का ही सहज रूप है। कीर्तन में सामूहिकता है, पर उसका लक्ष्य अंतर्मन को पवित्र करना है। भजन में स्वर है, पर उसकी परिणति मौन में होती है। राग की सच्ची साधना कलाकार को अहंकार से मुक्त करती है। वह गायक को माध्यम बना देती है। यही योग का भी उद्देश्य है, कर्ता भाव का लय।
योग और संगीत का संबंध शरीर और प्राण के स्तर पर भी है। दोनों में श्वास का अत्यंत महत्व है। प्राणायाम जहाँ श्वास को नियंत्रित कर मन को स्थिर करता है, वहीं गायन भी श्वास के सूक्ष्म संतुलन पर आधारित है। एक अच्छा गायक अनजाने में ही लंबी, संतुलित और सजग श्वास का अभ्यास करता है। इसी प्रकार स्वर साधना का प्रभाव नाड़ियों, भावों और मानसिक अवस्था पर पड़ता है। यही कारण है कि संगीत को उपचारात्मक शक्ति दी गई और योग को भी।
आज की स्थिति में योग को प्रायः केवल शारीरिक व्यायाम और संगीत को केवल मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया है। लेकिन योग और संगीत का संबंध वही है जो दीप और ज्योति का है। दीप अलग दिख सकता है, ज्योति अलग अनुभव हो सकती है, पर दोनों का अस्तित्व एक दूसरे में निहित है। योग भीतर के मौन को जगाता है, संगीत उस मौन को नाद का रूप देता है। योग साधक को केंद्रित करता है, संगीत उसे तन्मय करता है। योग में समाधि है, संगीत में लय; और दोनों की अंतिम परिणति आत्मा के विस्तार में है।
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

