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भ्रामक नैरेटिव का सच: मूर्ति स्थापना से लेकर विसर्जन तक, सब आदिवासी समाज का ही निर्णय

बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम विवाद में बाहरी संगठनों और स्वयंभू नेताओं द्वारा सबसे ज्यादा भावुक कार्ड ‘देवस्थल और मूर्तियों के अपमान’ को लेकर खेला जा रहा है। कलेक्ट्रेट के घेराव से लेकर सोशल मीडिया तक यह नैरेटिव (विमर्श) बड़ी चालाकी से फैलाया गया कि किसी बाहरी व्यक्ति या ट्रस्ट ने आदिवासियों के प्राचीन देवस्थल पर कब्ज़ा कर के उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।

लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा विरोधाभास और सच यह है कि जिस मूर्ति को हटाने या स्थापित करने को लेकर इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा किया गया, उस पूरी प्रक्रिया में कोई बाहरी तत्व शामिल ही नहीं था। मूर्ति को श्रद्धापूर्वक स्थापित करने वाले भी इसी क्षेत्र के आदिवासी थे, और वह मूर्ति भी उनके अपने ही आराध्य देव की थी। ऐसे में इसे ‘बाहरी ताकतों द्वारा आदिवासी संस्कृति को कुचलने का प्रयास’ बताना न सिर्फ झूठ है, बल्कि पूरी तरह से भ्रामक और प्रायोजित है।

आस्था के नाम पर फैलाए जा रहे भ्रम का पर्दाफाश

इस बिंदु की गहराई और इसके पीछे छिपी सच्चाई को इन मुख्य पहलुओं के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:

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1. अपनों के बीच ही टकराव पैदा करने की साजिश
इस विवाद की सबसे बुनियादी बात जो छुपा ली गई, वो यह है कि पाटेश्वर धाम के इस जामड़ीपाठ क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय आदिवासियों ने ही अपनी परंपरा और अगाध श्रद्धा के तहत वहां अपने आराध्य देव की मूर्ति स्थापित की थी। स्थानीय ग्रामीण पीढ़ियों से वहां पूजा-पाठ करते आ रहे हैं। लेकिन बाहरी संगठनों (जैसे गोंडवाना और सर्व आदिवासी समाज के कुछ धड़े) ने वहां पहुंचकर स्थानीय आदिवासियों के इस निर्णय को ही चुनौती दे दी। यानी, मूर्ति रखने वाले भी आदिवासी और उस पर राजनीति कर के विवाद खड़ा करने वाले भी खुद को आदिवासियों का हितैषी कहते हैं। यह सीधे तौर पर एक ही समाज के लोगों को आपस में लड़ाने और उनके बीच वैचारिक दीवार खड़ी करने की कोशिश है।

2. ‘बाहरी हमले’ का झूठा डर (फॉल्स नैरेटिव)
आंदोलनकारी नेताओं द्वारा जानबूझकर यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि पाटेश्वर धाम के बाबा या किसी बाहरी धार्मिक ट्रस्ट ने आदिवासियों की आस्था को नुकसान पहुंचाया है। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि आम आदिवासियों के भीतर ‘पहचान के खतरे’ का डर पैदा किया जा सके और उन्हें बड़ी संख्या में उग्र आंदोलन के लिए इकट्ठा किया जा सके। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि मूर्ति आदिवासियों के आराध्य की ही है और वहां होने वाले धार्मिक कार्यों से स्थानीय आदिवासियों की आस्था और मजबूत हो रही थी, न कि कमजोर।

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3. पारंपरिक रीति-रिवाजों और आपसी सहमति की अनदेखी
आदिवासी संस्कृति में यदि किसी देवस्थल या मूर्ति को लेकर कोई असहमति होती भी है, तो उसका फैसला गांव के सियान (बुजुर्ग), बैगा (पुजारी) और पारंपरिक मुखिया आपस में बैठकर, शांतिपूर्वक और धार्मिक नियमों के अनुसार करते हैं।
• परंपरा का अपमान: बाहर से आए अलगाववादी नेताओं ने इस पारंपरिक व्यवस्था को पूरी तरह दरकिनार कर दिया।
• राजनीतिक हथकंडा: उन्होंने आपसी सहमति से सुलझ सकने वाले इस धार्मिक विषय को सड़कों पर लाकर, नारेबाजी और घेराव का जरिया बना दिया। मूर्ति और देवस्थल उनके लिए आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्रशासन को झुकाने और अपनी नेतागिरी चमकाने का एक राजनीतिक हथकंडा बन चुके हैं।

4. वास्तविक आस्था बनाम राजनैतिक एजेंडा
स्थानीय 11-12 गांवों के आदिवासियों का एक बड़ा वर्ग इस बात से आहत है कि उनके अपने देवी-देवताओं को राजनीति के चौराहे पर घसीटा जा रहा है। उनका कहना है कि जो मूर्तियां या प्रतीक वहां स्थापित थे, वे उनकी आत्मा का हिस्सा हैं। बाहरी नेता जो खुद को समाज का रक्षक बता रहे हैं, वे दरअसल आदिवासियों की इसी मासूम धार्मिक भावना का शिकार कर रहे हैं।

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बालोद का यह विवाद ‘संस्कृति की रक्षा’ का नहीं, बल्कि ‘संस्कृति के नाम पर राजनीति’ का है। जब मूर्ति स्थापित करने वाले और आराध्य देव दोनों ही इसी आदिवासी समाज के हैं, तो इसे किसी बाहरी आक्रमण या अतिक्रमण का रूप देना पूरी तरह तर्कहीन है। यह केवल और केवल समाज के भीतर फूट डालकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने का एक सुनियोजित एजेंडा है।