तीन पीढ़ियों की कविताओं का जीवंत कोलाज : ‘पूरी रंगत के साथ’

वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर
मुझे लगता है कि हमारी साहित्यिक बिरादरी में साझा कविता-संग्रहों के प्रकाशन की परम्परा धीमी हो गई है। पहले ऐसे संकलन देश के सभी राज्यों से बड़े उत्साह के साथ प्रकाशित होते थे। दूसरी भाषाओं का तो नहीं मालूम, लेकिन इधर हिन्दी जगत में अब वैसा उत्साह काफी कम हो गया है। मुझे लगता है कि आज के दौर में पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की छपाई अत्याधुनिक मशीनों से होने लगी है। कम्प्यूटरों के इस युग में प्रिंटिंग बहुत आसान हो गई है। इसलिए अधिकांश कवि किसी न किसी तरह अकेले ही अपना संकलन छपवा लेते हैं।
बहरहाल, छत्तीसगढ़ के चयनित कवियों का एक साझा संग्रह ‘पूरी रंगत के साथ’ आज से 30 साल पहले प्रकाशित हुआ था। इसमें पुरानी और नई पीढ़ी के 38 कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ शामिल हैं। हर कविता में भावनाओं के अलग-अलग रंग हैं, जो ‘पूरी रंगत के साथ’ खिलते नज़र आते हैं। रंग-बिरंगी कविताओं का यह साझा संकलन वर्ष 1996 में ऑफिसर्स क्लब, कोरबा और पड़ाव प्रकाशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित किया गया था। उन दिनों मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य नहीं बना था।
संग्रह 128 पृष्ठों का है। इसमें तीन खण्ड बनाए गए हैं, क्रमशः आद्या, मध्या और सद्यः, जो छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी की तीन पीढ़ियों की रचनाओं को प्रस्तुत करते हैं। पहले खण्ड ‘आद्या’ में पंडित शेषनाथ शर्मा ‘शील’, लाला जगदलपुरी, श्यामलाल चतुर्वेदी, सुखदेव प्रसाद, नारायणलाल परमार, बहादुर लाल तिवारी, हरि ठाकुर और नरेन्द्र श्रीवास्तव को मिलाकर आठ कवि शामिल हैं। इस खण्ड में पंडित शेषनाथ शर्मा ‘शील’ की दो कविताएँ हैं। इनमें से ‘मिल’ शीर्षक कविता में मिल मज़दूरों की दयनीय दशा का चित्रण है। कुछ पंक्तियाँ देखिए —
दुःखी-दीन जन की हड्डी से,
भूखे श्रमिकों के शोणित से,
पैसों का इतिहास लिखा है —
मिल की ऊँची दीवारों पर।
वह मज़दूर फटी चिन्दी से
कैसे लाज छिपाए अपनी,
तुम हँस लो, हाँ, घृणा करो,
वह जीवित, मृत मरकर जीता है।
लाला जगदलपुरी की अतुकांत कविता ‘डायरी का एक रक्तिम पृष्ठ’ भी बहुत मर्मस्पर्शी है। कुछ पंक्तियाँ —
मैं एक सूर्योदयी रात का
गहन अंधेरा भोग रहा हूँ।
टूटे हुए सन्नाटे में इर्द-गिर्द
आदमकद सायों का एहसास
हो रहा है मुझे।
बेरहम परिस्थितियों की
दबी-दबी आवाजें सुनाई
दे रही हैं।
सहमी-सहमी सी हवाएँ
काँपते पत्तों को कुछ बता रही हैं।
नीड़ों के आस-पास से
फड़फड़ाहट का संदेश मिलता है।
मैं एक सूर्योदयी रात का
गहन अंधेरा भोग रहा हूँ।
इसी खण्ड में ‘हम बनवासी हैं’ शीर्षक से पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी की कविता में वनवासियों का आक्रोश छलकता हुआ सामने आता है। बानगी देखिए —
हम तो बनवासी हैं,
समझ में न आता कि
क्यों इतने तुम्हें भा गए हम?
हमारी तरक्की के तोपचंद,
सर्वप्रथम बंद करो बारूदी बकवास,
हवा को ख़राब मत करो यहाँ,
तुम बन के बर्बादी, हम
आदिम अविनाशी हैं।
हम बनवासी हैं।
दूसरे खण्ड ‘मध्या’ में 11 कवियों की रचनाएँ हैं। इस खण्ड में विनोद कुमार शुक्ल, राजीव कुमार, तिलक पटेल, परितोष चक्रवर्ती, स्वराज्य करुण, जीवन यदु, मदन आचार्य, राजेन्द्र सोनी, ईश्वरी यादव, रवि श्रीवास्तव और विजय गुप्त की कविताओं को शामिल किया गया है।
इसमें विनोद कुमार शुक्ल की एक बहुत प्रसिद्ध और मार्मिक कविता का एक अंश देखिए —
जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे,
मैं उनसे मिलने उनके
पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं
आयेगी मेरे घर,
नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊँगा।
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा।
पहाड़, टीले, चट्टानें,
असंख्य पेड़, खेत
कभी नहीं आयेंगे मेरे घर।
खेत-खलिहानों जैसे
लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
संग्रह के ‘सद्यः’ शीर्षक तीसरे खण्ड में 19 कवियों की रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं। इस खण्ड में विजय राठौर, नवल शुक्ल, विद्या गुप्ता, एकांत श्रीवास्तव, विजय सिंह, नासिर अहमद सिकंदर, त्रिजुगी कौशिक, माझी अनंत, अशोक शाह, संजीव बख्शी, पंकज राग, बसंत त्रिपाठी, सीमा सोनी, रजत कृष्ण, गेंदलाल शुक्ल ‘मोती’, महेश शर्मा, लाल मोहन पटेल, मूलचन्द तिवारी और सतीश कुमार सिंह की रचनाएँ पढ़ी जा सकती हैं। संग्रह के सम्पादक मण्डल में विजय सिंह, नरेन्द्र श्रीवास्तव, विजय दुबे, ईश्वरी यादव और महेश शर्मा शामिल थे।
पुस्तक में ‘अपनी बात’ शीर्षक से प्रकाशित वक्तव्य में ऑफिसर्स क्लब, कोरबा के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक शाह ने लिखा है —
“संग्रह आपको सौंपते हुए हम यह दावा नहीं कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ की कविता सिर्फ़ इस संग्रह तक सीमित है। यहाँ की कविता तो इस अंचल के कण-कण में व्याप्त है। यह तो एक साथ मंच पर आकर शेष दुनिया से जुड़ने का छोटा-सा प्रयास भर है। हो सकता है कि इस प्रयास में कुछ महत्वपूर्ण लोग छूट गए होंगे। उनके कोप के हम अधिकारी हैं।”
यह लिखते हुए अशोक शाह ने संग्रह में शामिल नहीं हो पाए रचनाकारों से क्षमा-याचना भी की है।
पुस्तक के फ्लैप पर हिन्दी भवन, भोपाल की साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षरा’ के सम्पादक विजय कुमार देव ने संग्रह पर अपनी मूल्यवान टिप्पणी दी है। आवरण पृष्ठ कुँवर रवीन्द्र ने बनाया है।
संग्रह में ‘कविता : संदर्भ छत्तीसगढ़’ शीर्षक से अपने लगभग 11 पृष्ठ के आलेख में सुखदेव प्रसाद (तत्कालीन आयुक्त, बिलासपुर संभाग) ने छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास की चर्चा की है। उन्होंने मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ क्षेत्र को साहित्य-लेखन के स्तर पर देश में अग्रणी बताते हुए लिखा है —
“इस बात की प्रामाणिकता उपलब्ध है कि बिलासपुर जिले के रतनपुर के पंडित गोपाल चन्द्र मिश्र (सन 1634-1702) ने ‘खूब तमाशा’, ‘जैमिनी अश्वमेध’, ‘भक्ति चिंतामणि’, ‘सुदामा चरित’ और ‘राम प्रताप’ जैसे पाँच महाकाव्यों की रचना की। इन्हें मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) का प्रथम महाकवि माना गया है।”
सुखदेव प्रसाद जी ने अपने इस आलेख में छत्तीसगढ़ के भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों में जांजगीर तहसील के शिवरीनारायण निवासी ठाकुर जगमोहन सिंह (1857-1899) के प्रसिद्ध उपन्यास ‘श्यामा स्वप्न’ का भी उल्लेख किया है। वे लिखते हैं —
“ठाकुर साहब मधुर स्वभाव के भावुक कवि थे। प्रेम सम्पत्ति लता, श्यामालता, श्यामा सरोजनी, देवयानी, सज्जनाष्टक, प्रलय आदि आपकी प्रकाशित काव्य-कृतियाँ हैं।”
सुखदेव प्रसाद जी ने ठाकुर जगमोहन सिंह के अलावा भारतेन्दु युगीन छत्तीसगढ़ के और भी कई कवियों और उनकी काव्य-कृतियों का उल्लेख किया है, जिनमें शिवरीनारायण के पंडित मालिकराम द्विवेदी, रायगढ़ के पंडित अनंतराम पाण्डेय, धमतरी के बाबू हीरालाल, बिलासपुर के जगन्नाथ प्रसाद भानु, धमतरी के बाबू बिसाहूराम आदि शामिल हैं।
आलेख में सुखदेव प्रसाद जी ने लिखा है कि धमतरी के बाबू हीरालाल को उनके ‘दुर्गायन’ काव्य पर बंगाल की विद्व समिति ने ‘काव्योपाध्याय’ की उपाधि से विभूषित किया था। छत्तीसगढ़ी व्याकरण रचनाकार के रूप में उनकी विशेष ख्याति है। धमतरी के बाबू बिसाहूराम (1869-1933) का ब्रजभाषा में रचित महाकाव्य ‘कृष्णायन’ प्रसिद्ध है, जो 1903 में सरस्वती विलास प्रेस, नरसिंहपुर से प्रकाशित हुआ।
सुखदेव प्रसाद जी ने अपने इस आलेख में छत्तीसगढ़ के द्विवेदी युगीन (सन 1900 से 1925) साहित्यकारों पंडित माधवराव सप्रे, पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय, पंडित मुकुटधर पाण्डेय, पंडित सुन्दरलाल शर्मा, पंडित सुकलाल पाण्डेय, सैय्यद मीर अली ‘मीर’ और लाल प्रद्युम्न सिंह आदि के साहित्य-सृजन की भी जानकारी दी है।
देश की आज़ादी के बाद छत्तीसगढ़ में जो साहित्यकार हुए, उनका उल्लेख भी सुखदेव प्रसाद जी के आलेख में विस्तार से किया गया है।
कविता-पुस्तक ‘पूरी रंगत के साथ’ में शामिल कई वरिष्ठ और कनिष्ठ कवि अब इस दुनिया में नहीं हैं। पंडित शेषनाथ शर्मा ‘शील’, लाला जगदलपुरी, श्यामलाल चतुर्वेदी, नारायणलाल परमार, हरि ठाकुर, विनोद कुमार शुक्ल, तिलक पटेल, परितोष चक्रवर्ती, राजेन्द्र सोनी, त्रिजुगी कौशिक और नासिर अहमद सिकंदर हमसे बहुत दूर चले गए हैं। उनसे जुड़ी स्मृतियाँ ही हमारे साथ रह गई हैं।
पड़ाव प्रकाशन के संचालक रहे कवि राजुरकर राज भी कुछ साल पहले संसार से जा चुके हैं। यह महत्वपूर्ण संकलन आज भी हमें इन सभी दिवंगत रचनाकारों की याद दिलाता रहता है। उन्हें विनम्र नमन।

