धरती के पर्यावरण विनाश में विकसित देश कितने अपराधी?

धरती आज एक गहरे संकट से गुजर रही है। मौसम का संतुलन डगमगा गया है। कहीं असामान्य गर्मी जीवन को कठिन बना रही है तो कहीं अचानक आई बाढ़ गांव और शहरों को तबाह कर देती है। समुद्रों का तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जंगलों का क्षेत्र लगातार कम हो रहा है और नदियों का स्वाभाविक प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि पिछले लगभग ढाई सौ वर्षों की आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों का परिणाम है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन की चर्चा करते हैं तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि इस संकट के लिए जिम्मेदारी किसकी है, कौन है पर्यावरण विनाश का अपराधी और इसका समाधान कैसे संभव है। यह विषय केवल विज्ञान का नहीं बल्कि इतिहास, अर्थशास्त्र, नैतिकता और वैश्विक न्याय का विषय भी बन चुका है।
अठारहवीं शताब्दी के अंत में जब ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मशीनों से उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया एक दिन पूरी पृथ्वी के पर्यावरण को प्रभावित कर देगी। भाप के इंजन चलाने के लिए कोयले का उपयोग बड़े पैमाने पर किया गया। इसके बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अनेक देशों ने भी इसी विकास मॉडल को अपनाया। उद्योगों के विस्तार के साथ ऊर्जा की मांग बढ़ती गई और जीवाश्म ईंधनों जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का अत्यधिक उपयोग होने लगा। इन ईंधनों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में जमा होने लगीं, जिससे पृथ्वी का तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक वैश्विक तापमान में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है, जो भविष्य के लिए गंभीर संकेत है।
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिकीकरण से सबसे अधिक लाभ उठाने वाले देश आज के विकसित देश हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय संघ के अन्य देशों ने लंबे समय तक बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधनों का उपयोग किया। इससे उनके उद्योगों का विकास हुआ, आर्थिक समृद्धि बढ़ी और जीवन स्तर में सुधार हुआ। लेकिन इसके साथ ही वातावरण में कार्बन की मात्रा भी लगातार बढ़ती गई। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि वैश्विक संचयी कार्बन उत्सर्जन में विकसित देशों का योगदान बहुत अधिक रहा है, जबकि उनकी जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है। इसके विपरीत, भारत, अफ्रीका और एशिया के अनेक देशों ने ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना उन्हें भी करना पड़ रहा है।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई स्थिति भी देखने को मिलती है। कई विकसित देशों ने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को विकासशील देशों में स्थानांतरित कर दिया है। परिणामस्वरूप उत्पादन से उत्पन्न प्रदूषण विकासशील देशों के खाते में दर्ज होता है, जबकि उन वस्तुओं का उपभोग विकसित देशों में होता है। इस प्रकार वास्तविक उत्सर्जन की जिम्मेदारी को समझना और भी जटिल हो जाता है। जलवायु परिवर्तन के विषय में यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर “साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी” का सिद्धांत स्वीकार किया गया है। इसका अर्थ यह है कि सभी देशों को पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन उनकी जिम्मेदारी उनकी क्षमता और ऐतिहासिक योगदान के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन के परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों में सूखे की समस्या गंभीर हो चुकी है। छोटे द्वीपीय देशों को समुद्र स्तर बढ़ने से अस्तित्व का संकट दिखाई दे रहा है। दक्षिण एशिया में चक्रवात और बाढ़ की घटनाएं अधिक तीव्र होती जा रही हैं। भारत में भी मौसम के स्वरूप में परिवर्तन देखा जा रहा है। कभी मानसून सामान्य से कम होता है तो कभी अत्यधिक वर्षा हो जाती है। कई क्षेत्रों में जल संकट बढ़ रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हुई है। इन परिवर्तनों का प्रभाव कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
यह भी स्पष्ट है कि पर्यावरण संकट का संबंध केवल प्रकृति से नहीं बल्कि सामाजिक न्याय से भी है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अधिक झेलते हैं क्योंकि उनके पास संसाधनों की कमी होती है। एक किसान के लिए अनियमित वर्षा उसकी आजीविका को प्रभावित कर सकती है, जबकि एक गरीब परिवार के लिए अत्यधिक गर्मी स्वास्थ्य संकट बन सकती है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन सामाजिक असमानता को और बढ़ा सकता है।
इन चुनौतियों के बीच भारत ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया है और सौर ऊर्जा उत्पादन में तेजी से वृद्धि की है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की पहल भारत ने ही की, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा को वैश्विक स्तर पर प्रोत्साहित करना है। भारत ने पवन ऊर्जा और जैव ऊर्जा के क्षेत्र में भी प्रगति की है। आज भारत दुनिया के प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल हो चुका है।
ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए एलईडी बल्बों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है। उजाला योजना के माध्यम से करोड़ों एलईडी बल्ब वितरित किए गए, जिससे बिजली की खपत कम हुई और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई। स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए उज्ज्वला योजना के माध्यम से गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन प्रदान किए गए, जिससे पारंपरिक ईंधनों के उपयोग में कमी आई और वायु प्रदूषण कम हुआ।
भारत सरकार ने वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए भी अनेक कार्यक्रम चलाए हैं। ग्रीन इंडिया मिशन और वृक्षारोपण अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत गंगा नदी की सफाई और संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए एकल उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए नीतियां बनाई गई हैं ताकि पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम हो सके।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाई है। पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत ने उत्सर्जन तीव्रता कम करने और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है जो दर्शाता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल नीतियों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज की भागीदारी भी आवश्यक है। लोगों को अपने जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन करने होंगे, जैसे ऊर्जा की बचत करना, जल का संरक्षण करना, वृक्षारोपण करना और अनावश्यक उपभोग से बचना। टिकाऊ जीवन शैली अपनाकर भी पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है।
नैतिक दृष्टि से देखें तो धरती केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी इस पर समान अधिकार है। यदि आज हम पर्यावरण को सुरक्षित नहीं रखेंगे तो भविष्य में जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन का प्रश्न हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि विकास का सही अर्थ क्या है। क्या केवल आर्थिक वृद्धि ही विकास है या प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ना ही वास्तविक प्रगति है।
विश्व समुदाय को यह समझना होगा कि पर्यावरण संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी मानवता की साझा चुनौती है। विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है, इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे तकनीक और संसाधनों के माध्यम से समाधान में अग्रणी भूमिका निभाएं। वहीं विकासशील देशों को भी स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ विकास की दिशा में प्रयास करना होगा।
यदि सभी देश सहयोग की भावना से कार्य करें तो स्थिति को सुधारा जा सकता है। विज्ञान और तकनीक के माध्यम से ऊर्जा के स्वच्छ विकल्प विकसित किए जा सकते हैं। जंगलों और जैव विविधता का संरक्षण किया जा सकता है। जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है। यह तभी संभव है जब विकास और पर्यावरण को विरोधी नहीं बल्कि पूरक माना जाए।
धरती का संतुलन बनाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यह केवल सरकारों का कार्य नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी है। यदि हम आज सजग होकर कदम उठाएं तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है। यही मानवता के प्रति हमारा सबसे बड़ा दायित्व है।
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
