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संसद से सड़क तक, आखिर विपक्ष की विश्वसनीयता क्यों घट रही है?

आचार्य ललित मुनि

“संसद से सड़क तक, आखिर विपक्ष की विश्वसनीयता क्यों घट रही है?” यह प्रश्न आज केवल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ी एक गंभीर चिंता बन चुका है। लोकतंत्र में सत्ता जितनी आवश्यक होती है, उतना ही आवश्यक एक मजबूत, सजग और उत्तरदायी विपक्ष भी होता है। विपक्ष केवल सरकार की आलोचना करने के लिए नहीं होता, बल्कि वह जनता की आवाज, नीतियों का वैकल्पिक दृष्टिकोण और सत्ता पर लोकतांत्रिक नियंत्रण का सबसे बड़ा माध्यम होता है।

किंतु वर्तमान भारतीय राजनीति में यह अनुभव लगातार गहरा रहा है कि विपक्ष अपनी पारंपरिक भूमिका से दूर होता जा रहा है। संसद में बहस की जगह शोर, सड़क पर जनांदोलन की जगह प्रतीकात्मक प्रदर्शन और नीतिगत विमर्श की जगह केवल व्यक्तिकेंद्रित विरोध अधिक दिखाई देने लगा है। यही कारण है कि जनता के भीतर विपक्ष की विश्वसनीयता को लेकर प्रश्न खड़े होने लगे हैं।

स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक दशकों में विपक्ष का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। 1950 और 1960-70 के दशकों में डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, पीलू मोदी और चंद्रशेखर, जार्ज फ़र्नांडीज नेता विपक्ष में बैठकर भी राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज बनते थे। लोहिया जब कहते थे कि “तीन आना बनाम पंद्रह आना” तो वे नेहरू सरकार की उस नीतिगत विफलता को उजागर कर रहे थे जिसमें गरीब की थाली सूनी थी और नेता की दावत शाही। यह विरोध व्यक्तिगत नहीं, नीतिगत था।

1960 के दशक में जब चीन से 1962 का युद्ध हुआ और भारत को अपमानजनक पराजय का सामना करना पड़ा, तब भी विपक्ष ने सरकार को जवाबदेह बनाया। अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में नेहरू की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा था कि “हिंदी चीनी भाई भाई” की नीति भारत के लिए घातक सिद्ध हुई। किंतु इसी के साथ उन्होंने राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर सरकार के साथ खड़े होने की परंपरा भी कायम रखी।

1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, तब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्ष ने जो संघर्ष किया, वह लोकतंत्र की रक्षा की सबसे बड़ी लड़ाई थी। जेल गए, यातनाएँ सहीं, किंतु सत्ता से समझौता नहीं किया। यह था विपक्ष का धर्म। नीतिगत असहमति, संवैधानिक विरोध और जनता के पक्ष में खड़े होना।

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। विचारधाराओं में जमीन आसमान का अंतर रखने वाले नेता एक मंच पर आए, किंतु उनका ध्येय था लोकतंत्र की पुनर्स्थापना। यह गठबंधन की राजनीति का एक स्वस्थ उदाहरण था।

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1989 के बाद भारतीय राजनीति में गठबंधन युग का आरंभ हुआ। मंडल आयोग, बाबरी मस्जिद विवाद और आर्थिक उदारीकरण ने राजनीति का पूरा खाका बदल दिया। इसी दौर में विपक्षी राजनीति में एक सूक्ष्म किंतु खतरनाक बदलाव आने लगा। नीति से ज्यादा जाति, नीति से ज्यादा धर्म और नीति से ज्यादा व्यक्ति केंद्रित विरोध की राजनीति प्रारंभ हुई।

1996 से 2004 के बीच जब अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में थे, तब कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने पोखरण परमाणु परीक्षण को लेकर, कारगिल युद्ध के दौरान और आर्थिक नीतियों पर अर्थपूर्ण विरोध भी किया। सोनिया गांधी के “विदेशी मूल” का प्रश्न जरूर उठाया गया, किंतु संसदीय कामकाज बाधित करने की परंपरा उस दौर में अभी उतनी सघन नहीं थी।

2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह की सरकार के दौर में विपक्षी भाजपा ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मजबूत नैतिक स्थिति ली। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने जनता को जागरूक किया। यह विरोध काफी हद तक नीतिगत और नैतिक था।

2014 के बाद से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय खुला। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने भारी बहुमत के साथ सत्ता संभाली। किंतु इसके साथ ही विपक्ष की भूमिका एक ऐसे मोड़ पर आ गई जहाँ उसने धीरे धीरे अपना परंपरागत चरित्र खो दिया।

पहली बड़ी घटना थी 2016 का नोटबंदी का निर्णय। यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक नीतिगत फैसला था जिस पर विस्तृत बहस होनी चाहिए थी। किंतु विपक्ष ने नोटबंदी को केवल “तानाशाही” और “जनता को बर्बाद करने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया। अर्थशास्त्री भले कह सकते हैं कि नोटबंदी के दीर्घकालिक परिणाम मिश्रित रहे, किंतु विपक्ष ने उसका वैकल्पिक आर्थिक एजेंडा कभी नहीं रखा।

इसी क्रम में 2017 के जीएसटी लागू होने के समय भी विपक्ष ने संसदीय बहस में भाग लेने के बजाय मीडिया में शोर मचाने को प्राथमिकता दी। जबकि जीएसटी का मूल ढाँचा कांग्रेस के शासनकाल में ही तैयार हुआ था। इस विडंबना को विपक्ष ने कभी स्वीकार नहीं किया। पाकिस्तान पर जब जब आक्रमण हुए, सरकार से सबूत मांगे गये।

आज भारतीय राजनीति में एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह भी दिखाई दे रही है कि विपक्ष की भाषा लगातार असंयत, आक्रामक और असंस्कारी होती जा रही है। लोकतंत्र में तीखा विरोध स्वाभाविक है, किंतु विरोध और वैमनस्य में अंतर होता है। संसद, चुनावी मंचों और सोशल मीडिया पर कई विपक्षी नेताओं द्वारा प्रयुक्त भाषा अब वैचारिक असहमति से अधिक व्यक्तिगत कटाक्ष, उपहास और अपमान की राजनीति में बदलती दिखाई देती है। प्रधानमंत्री से लेकर संवैधानिक संस्थाओं तक के लिए जिस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता है, वह लोकतांत्रिक मर्यादा को कमजोर करता है।

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विशेषकर राहुल गांधी और कांग्रेस की हालिया राजनीतिक भाषा को लेकर यह आलोचना लगातार सामने आती रही है कि वह कई बार संयमित लोकतांत्रिक संवाद की सीमा लाँघती दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए “चौकीदार चोर है” जैसे नारे, संसद और चुनावी मंचों पर बार बार व्यक्तिगत टिप्पणियाँ, तथा कई मुद्दों पर बिना पर्याप्त प्रमाण के गंभीर आरोप लगाने की शैली ने कांग्रेस की पारंपरिक राजनीतिक गरिमा को प्रभावित किया है। कांग्रेस कभी भारत की वह पार्टी मानी जाती थी जिसके नेताओं की भाषा में वैचारिक दृढ़ता के साथ संस्थागत मर्यादा भी दिखाई देती थी। जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और यहां तक कि नरसिंह राव के दौर में भी राजनीतिक संघर्ष तीखे थे, किंतु शब्दों की एक सीमा बनी रहती थी।

राहुल गांधी ने अडाणी समूह के विरुद्ध संसद में जो आरोप लगाए, उनमें से कई बिना पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य के थे। 2023 में उन्होंने लंदन में जाकर भारतीय लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाए। एक विपक्षी नेता का विदेश में जाकर अपने देश की आलोचना करना, वह भी बिना ठोस तथ्यों के, लोकतांत्रिक विपक्ष की परंपरा नहीं है। जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल में भी विदेशी मंचों से भारत को बदनाम नहीं किया था।

राहुल गांधी ने कई अवसरों पर सरकार की आलोचना करते हुए ऐसे वक्तव्य दिए जिनसे राजनीतिक बहस नीति से हटकर व्यक्तिगत टकराव की दिशा में जाती दिखाई दी। 2023 में लंदन जाकर भारतीय लोकतंत्र पर की गई टिप्पणियाँ हों या संसद के भीतर आक्रामक प्रतीकात्मक व्यवहार, इन सबने उनके समर्थकों को भले उत्साहित किया हो, किंतु व्यापक वर्ग में यह प्रश्न भी खड़ा किया कि क्या विपक्ष अपनी बात तथ्यों और वैकल्पिक नीतियों के आधार पर रखने के बजाय केवल भावनात्मक और टकरावपूर्ण भाषा पर निर्भर होता जा रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस का विरोध कई बार वैचारिक चुनौती के बजाय केवल प्रतिक्रियात्मक राजनीति के रूप में देखा जाने लगा है, जिससे उसकी विश्वसनीयता और गंभीरता दोनों प्रभावित हुई हैं।

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2023 में बने “इंडिया” गठबंधन को विपक्षी एकता का प्रयास माना गया। 26 से अधिक दल एक मंच पर आए। किंतु 2024 के आम चुनाव में इस गठबंधन की असली तस्वीर सामने आई। सीट बँटवारे को लेकर कांग्रेस और आप में टकराव, ममता का असहयोग, नीतीश कुमार का पुनः भाजपा के साथ जाना और चंद्रशेखर राव का गठबंधन छोड़ना, ये सब दिखाते हैं कि “इंडिया” गठबंधन एक विचारधारात्मक और नीतिगत मंच नहीं था, बल्कि केवल मोदी विरोध की धुरी पर टिका एक अस्थायी राजनीतिक गठजोड़ था।

विपक्ष का धर्म केवल किसी के विरोध में एकजुट होना नहीं है। विपक्ष का धर्म है कि वह जनता को बताए कि वह सत्ता में आने पर क्या करेगा, और वह वादा नीतियों के ठोस खाके के साथ हो।

वर्तमान विपक्षी राजनीति में एक सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है, हर घटना को षड्यंत्र के चश्मे से देखना। कोरोना महामारी के दौरान जब लाखों लोग मर रहे थे, कुछ विपक्षी नेताओं ने उसे भी “सरकार की साजिश” कहा। पुलवामा हमले को, जिसमें 40 केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान शहीद हुए, कुछ विपक्षी नेताओं ने “चुनावी साजिश” करार दिया। यह न केवल तथ्यहीन था, बल्कि शहीदों के परिवारों के साथ एक क्रूर अपमान भी था।

राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर जो राजनीति हुई, उसमें विपक्ष ने एक बड़ी भूल की। करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं से जुड़े एक ऐतिहासिक अवसर पर विपक्षी दलों का बहिष्कार, चाहे संवैधानिक कारण कोई भी रहे हों, राजनीतिक रूप से यह एक गंभीर असंतुलन था।

लोहिया ने कहा था कि “जिंदा कौमें पाँच साल इंतजार नहीं करतीं।” विपक्ष का काम पाँच साल में एक बार वोट माँगना नहीं है। विपक्ष का काम है हर रोज जनता के साथ खड़े रहना, सत्ता को हर रोज जवाबदेह बनाना और यह सुनिश्चित करना कि लोकतंत्र केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी जीवित रहे और विपक्ष यहीं पर विफ़ल हो रहा है। जिन्हें राजनीति की समझ और बोलने का शऊर नहीं है वे विपक्ष की राजनीति कर रहे हैं, सदन में हल्ला करना और बाहर आकर प्रधानमंत्री को कोसना ही विपक्ष राजनीति हो गई है, देखते हैं कब सदबुद्धि आती है।