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अक्षय तृतीया का धार्मिक, पौराणिक एवं सांस्कृतिक महत्व : भगवान परशुराम अवतरण दिवस

उमेश चौरसिया

भारतीय सनातन परंपरा में चार तिथियों को अबूझ मुहूर्त माना गया है, जिनमें वसंत पंचमी, देव उठनी ग्यारस, भड़ली नवमी के अलावा वैशाख शुक्ल तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया भी है, जिसे भविष्य पुराण, पद्म पुराण और अन्य ग्रंथों में विलक्षण माना गया है। महाभारत के अनुसार, इसी दिन श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अक्षय पात्र भेंट किया, जिसमें अन्न कभी समाप्त नहीं होता था। अक्षय का अर्थ भी है – कभी समाप्त न होने वाला।

ग्रंथों के अनुसार, यह दिवस त्रेतायुग में विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस अन्नपूर्णा देवी और भागीरथ के प्रयत्नों से गंगा के अवतरण, साथ ही महर्षि वेदव्यास और गणपति द्वारा महाभारत रचना के शुभारंभ की तिथि के रूप में भी जाना जाता है। तीर्थंकर ऋषभदेव के 40 दिवसीय उपवास की पूर्णता के दिवस के रूप में भी इसका विशेष महत्व है। श्रीजगन्नाथ पुरी में रथ यात्रा की तैयारियां भी अक्षय तृतीया से आरंभ होती हैं।

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महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र के रूप में अवतरित परशुराम को ऋचीक ने सारंग धनुष प्रदान किया, ब्रह्मर्षि कश्यप ने वैष्णव मंत्र दिए। कैलाश पर्वत पर महादेव से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत महादेव ने उन्हें विद्युदभि नामक फरसा अर्थात परशु प्रदान किया, इसी कारण उनका नाम परशुराम पड़ा। शिव ने उन्हें विजया धनुष भी दिया।

आज्ञाकारी पुत्र के रूप में प्रख्यात परशुराम ने कर्म के सिद्धांत पर चलते हुए समाज के सभी वर्गों को शिक्षित कर यज्ञोपवीत संस्कार से जोड़ा। अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक-युवतियों का परिणय करवाने की परंपरा भी बताई जाती है, इसी कारण इस दिवस को विवाह का अबूझ मुहूर्त माना जाता है।

धर्म और प्रबुद्धजनों की रक्षा के लिए परशु उठाने वाले परशुराम ने विनयशीलता, शौर्य, मर्यादा और धर्मनिष्ठा के आदर्श श्रीराम से साक्षात्कार होने पर परशु त्याग दिया और वर्तमान में उड़ीसा के गजपति जिले में स्थित महेंद्रगिरी पर्वत पर चले गए।

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भगवान परशुराम को दक्षिण भारत में सामाजिक समरसता, भूमि सुधार अभियान के पुरोधा तथा जल संरक्षण के प्रणेता के रूप में भी पूजा जाता है। पौराणिक संदर्भों में जिन सात विभूतियों को अजर-अमर माना गया है, उनमें परशुराम का भी महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि आज भी महेंद्रगिरी पर्वत पर उनकी उपस्थिति अनुभव की जाती है।

– उमेश कुमार चैरसिया, साहित्यकार