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भारत में नागरिकता का प्रमाण आखिर है क्या ?

आचार्य ललित मुनि

भारत के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का यह कथन कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, केवल एक प्रशासनिक स्पष्टीकरण नहीं है। इसने करोड़ों भारतीयों के मन में एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिसका उत्तर सरकार को वर्षों पहले स्पष्ट कर देना चाहिए था। यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, आधार नहीं है, मतदाता पहचान पत्र नहीं है, पैन कार्ड नहीं है, तो फिर भारत का एक सामान्य नागरिक किस दस्तावेज के आधार पर स्वयं को भारतीय नागरिक सिद्ध करेगा

कानून की दृष्टि से सरकार का तर्क नया नहीं है। भारत का नागरिकता कानून नागरिकता को किसी एक दस्तावेज से नहीं, बल्कि नागरिकता अधिनियम 1955 और संविधान के प्रावधानों के आधार पर निर्धारित करता है। विदेश मंत्रालय ने भी यही कहा है कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं। सरकार का कहना है कि यह दशकों से चली आ रही कानूनी स्थिति है और विभिन्न न्यायिक निर्णयों में भी यही बात कही गई है।

लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न कानून का नहीं, शासन की स्पष्टता का है।

यदि किसी नागरिक से आज पूछा जाए कि वह भारतीय नागरिक होने का प्रमाण क्या प्रस्तुत करे, तो उसके पास सबसे पहले पासपोर्ट ही होगा। विदेश जाने के लिए यही दस्तावेज सरकार जारी करती है। इसे प्राप्त करने से पहले पुलिस सत्यापन होता है, पहचान और पते की जांच होती है, अनेक सरकारी अभिलेखों का परीक्षण किया जाता है। ऐसे में दशकों तक जनता ने यह स्वाभाविक रूप से माना कि सरकार द्वारा जारी पासपोर्ट नागरिकता का सबसे विश्वसनीय प्रमाण है।

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अब यदि सरकार स्वयं कह रही है कि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो सरकार पर यह दायित्व भी बनता है कि वह स्पष्ट करे कि आखिर प्रमाण है क्या।

यहीं सबसे बड़ी प्रशासनिक विसंगति दिखाई देती है।

सरकार कहती है कि भारत में ऐसा कोई एक सार्वभौमिक नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं है, जो प्रत्येक भारतीय नागरिक को जारी किया जाता हो। नागरिकता प्रमाण पत्र केवल विशेष परिस्थितियों में पंजीकरण अथवा प्राकृतिककरण से नागरिकता प्राप्त करने वालों को जारी होता है। जन्म से भारतीय बने अधिकांश नागरिकों के पास ऐसा कोई अलग नागरिकता प्रमाण पत्र होता ही नहीं।

यदि यही वास्तविक स्थिति है, तो यह समस्या केवल कानूनी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक भी है।

एक ओर सरकार नागरिक से कहती है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। दूसरी ओर कोई वैकल्पिक सार्वभौमिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराती। ऐसे में यदि भविष्य में किसी नागरिक से उसकी नागरिकता सिद्ध करने को कहा जाए, तो वह किन दस्तावेजों के सहारे स्वयं को भारतीय सिद्ध करेगा

यह प्रश्न केवल सीमा पार से आए अवैध प्रवासियों का नहीं है। यह उस किसान का भी है जिसके पास दशकों पुराने राजस्व अभिलेख हैं। यह उस मजदूर का भी है जिसका जन्म कभी पंजीकृत नहीं हुआ। यह उस आदिवासी का भी है जिसकी पीढ़ियां भारत में रहती आई हैं लेकिन जिनके पास व्यवस्थित अभिलेख नहीं हैं। यह उस शहरी नागरिक का भी प्रश्न है जिसने आज तक पासपोर्ट को ही अंतिम सरकारी प्रमाण माना था।

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लोकतंत्र में कानून जितना महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण उसकी स्पष्टता होती है।

सरकार यह कह सकती है कि नागरिकता कई तथ्यों के संयुक्त परीक्षण से निर्धारित होती है। यह भी सही है कि जन्म प्रमाण पत्र, माता पिता की नागरिकता, नागरिकता अधिनियम के प्रावधान और अन्य अभिलेखों को मिलाकर स्थिति तय की जाती है। लेकिन क्या यह जानकारी देश के सामान्य नागरिक तक कभी व्यवस्थित रूप से पहुंचाई गई

उत्तर स्पष्ट है, नहीं। यही कारण है कि विदेश मंत्रालय के इस कथन ने पूरे देश में भ्रम पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर न्यायविदों तक यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि पासपोर्ट भी अंतिम प्रमाण नहीं है तो नागरिक आखिर किस पर भरोसा करे।

सरकार को इस विवाद को केवल कानूनी व्याख्या बताकर समाप्त नहीं करना चाहिए। उसे स्पष्ट रूप से एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए जिसमें सरल भाषा में बताया जाए कि विभिन्न परिस्थितियों में नागरिकता किस प्रकार सिद्ध होगी। कौन से दस्तावेज निर्णायक होंगे। किन दस्तावेजों का सहायक महत्व होगा। यदि किसी नागरिक के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है तो उसके लिए क्या व्यवस्था होगी। यदि किसी के अभिलेख अपूर्ण हैं तो उसकी नागरिकता किस प्रक्रिया से निर्धारित होगी।

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आज भारत डिजिटल शासन की ओर बढ़ चुका है। करोड़ों लोगों के आधार बने, करोड़ों मतदाता पहचान पत्र जारी हुए, करोड़ों पासपोर्ट वितरित हुए। यदि सरकार चाहती है कि नागरिकता को लेकर भ्रम समाप्त हो, तो उसे प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए एक स्पष्ट और विधिक रूप से मान्य नागरिकता प्रमाण व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

यह मांग किसी राजनीतिक दल की नहीं है। यह सामान्य भारतीय नागरिक की मांग है। एक लोकतांत्रिक राज्य में नागरिक को अपने ही देश में अपनी नागरिकता को लेकर असमंजस में नहीं रहना चाहिए। यदि सरकार कहती है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो उसी स्पष्टता के साथ उसे यह भी बताना चाहिए कि भारत के प्रत्येक नागरिक के हाथ में ऐसा कौन सा दस्तावेज होना चाहिए, जिसे किसी भी सरकारी कार्यालय, न्यायालय अथवा प्रशासनिक प्रक्रिया में अंतिम रूप से स्वीकार किया जाए।

सरकार का यह दायित्व केवल कानून समझाना नहीं है। उसका दायित्व नागरिक का विश्वास भी बनाए रखना है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि पासपोर्ट नहीं, तो फिर क्या? इस प्रश्न का उत्तर जितनी शीघ्रता से सरकार देगी, उतनी ही शीघ्रता से भ्रम समाप्त होगा और नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। लोकतंत्र में नागरिक से प्रमाण मांगना अनुचित नहीं है, लेकिन उससे पहले यह बताना अनिवार्य है कि वह प्रमाण आखिर है क्या?