जब लोकतंत्र को आधी रात बेड़ियों में जकड़ा गया

उस दिन को भारत कभी नहीं भूल सकता जब लोकतंत्र का गला घोंटकर आपातकाल लगाया था। कांग्रेस के माथे पर यह वह कलंक है, जिसे पीढियों धोया नहीं जा सकता। 25 जून 1975 की इस तारीख को भारतीय लोकतंत्र कभी नहीं भूल सकता। उस रात जब देश सो रहा था, तब सत्ता के शिखर पर बैठी कांग्रेसी सरकार ने एक ऐसे निर्णय पर मुहर लगाई जिसने संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित कर दिया, असहमति को अपराध बना दिया और लोकतंत्र की संस्थाओं को अभूतपूर्व दबाव के अधीन कर दिया।
12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। उन्होंने इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा चुनाव को भ्रष्ट आचरण के आधार पर अवैध घोषित कर दिया। राजनारायण ने यह मुकदमा दायर किया था और अदालत ने पाया कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग अपने चुनाव प्रचार के लिए किया था। इस निर्णय से इंदिरा गांधी की सत्ता की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग गया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण उर्फ जेपी ने इस निर्णय को जनक्रांति का आह्वान माना। दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों लोगों की भीड़ के बीच उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग की। देश भर में आंदोलन की लहर थी। गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन पहले से ही सत्ता को हिला चुका था। ऐसे में इंदिरा गांधी के सलाहकारों ने उन्हें एक रास्ता सुझाया जो संवैधानिक तो था, पर लोकतांत्रिक आत्मा के विरुद्ध था।
25 जून की आधी रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आंतरिक अशांति का हवाला देकर आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। उस रात ही विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं को उनके घरों से उठा लिया गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर जैसे नेता जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए। समाचार पत्रों की बिजली काट दी गई ताकि सुबह कोई खबर न छप सके। 26 जून की सुबह भारत एक अलग देश में जाग उठा।
भारत का संविधान आपातकाल की व्यवस्था बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह जैसी स्थितियों के लिए करता है। परंतु 1975 में “आंतरिक अशांति” के आधार पर लगाया गया आपातकाल न केवल तथ्यों से परे था, बल्कि यह व्यक्तिगत सत्ता बचाने का एक उपकरण मात्र था। विद्वान और पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक “इमर्जेंसी रिटोल्ड” में लिखा है कि इंदिरा गांधी ने अनुच्छेद 352 को एक ऐसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया जो संविधान निर्माताओं ने कभी इस उद्देश्य के लिए नहीं बनाया था।
संसद को किनारे करते हुए अध्यादेशों की झड़ी लगा दी गई। 42वां संविधान संशोधन लाया गया जिसे अनेक विधिशास्त्री आज भी संविधान के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ मानते हैं। मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। अदालतों को नागरिकों की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं सुनने से रोक दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने उस दौर में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला के मामले में बहुमत से वह निर्णय दिया जिसे बाद के न्यायाधीशों ने न्यायपालिका के इतिहास का सबसे शर्मनाक अध्याय कहा। उस निर्णय में कहा गया कि आपातकाल में सरकार किसी को भी बिना किसी कारण के जेल में रख सकती है और अदालतें कुछ नहीं कर सकतीं।
जब सत्ता तानाशाह हो जाती है तो वह सबसे पहले पत्रकारों का दमन करती है। 1975 के आपातकाल में भारतीय प्रेस के साथ ठीक यही हुआ। सेंसरशिप इतनी कठोर थी कि अखबारों को प्रकाशन से पहले सरकारी अधिकारियों को सामग्री दिखानी पड़ती थी। जो अखबार सरकारी निर्देशों का पालन नहीं करते थे, उनकी बिजली काट दी जाती थी, विज्ञापन बंद कर दिए जाते थे।
पत्रकार और लेखक कोरा वेनर ने अपनी पुस्तक में उस दौर की भयावहता को दर्ज किया है। इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक रामनाथ गोयनका ने सरकारी दबाव के आगे झुकने से इनकार किया। उन्होंने अपने अखबार में खाली संपादकीय कॉलम छोड़ दिया, जो शब्दों से अधिक मुखर था। द स्टेट्समैन ने सेंसरशिप के विरोध में संपादकीय खाली रखा। लेकिन अधिकांश मीडिया संस्थानों ने आत्मसमर्पण कर दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने बाद में कहा था कि जब मीडिया को केवल झुकने को कहा गया था, उसने रेंगना शुरू कर दिया।
रेडियो और दूरदर्शन तो पहले से ही सरकारी प्रचार के माध्यम थे। आकाशवाणी पर “इंदिरा गांधी जिंदाबाद” के नारे गूंजते थे। विदेशी पत्रकारों को देश से निकाला गया। ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन और वॉयस ऑफ अमेरिका के संवाददाताओं को वीज़ा रद्द कर बाहर भेज दिया गया। भारत की वास्तविक स्थिति दुनिया से छिपाई जा रही थी।
आपातकाल की सबसे बड़ी भयावहता थी मीसा (Maintenance of Internal Security Act) और दीसा (Defence of India Act) के तहत होने वाली गिरफ्तारियां। इन कानूनों के अंतर्गत किसी को भी बिना कारण बताए, बिना मुकदमा चलाए, अनिश्चितकाल के लिए जेल में डाला जा सकता था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, हालांकि स्वतंत्र अनुमान यह संख्या डेढ़ लाख से ऊपर बताते हैं।
पत्रकार और इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक “इंडिया आफ्टर गांधी” में आपातकाल की पुलिस ज्यादतियों का विस्तार से वर्णन किया है। जेलों में बंद कैदियों को यातनाएं दी गईं। कई स्थानों पर पुलिस हिरासत में मौतें हुईं। परिजनों को यह भी नहीं बताया जाता था कि उनके प्रियजन कहां बंद हैं। वकीलों को मुवक्किलों से नहीं मिलने दिया जाता था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। राष्ट्रावादी विचारधारा वाले के संगठन को कुचलने का प्रयास किया गया। राजनीतिक विरोध करने वाले समाजवादी, गांधीवादी, वामपंथी, दक्षिणपंथी सभी एक ही जेल की चारदीवारी में एक साथ बंद थे। इस विडंबना पर खुद जेपी ने कहा था कि शायद यह कैद उन सभी को एक मंच पर लाने का काम करेगी।
आपातकाल में एक समांतर सत्ता भी चल रही थी। इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी, जो न तो किसी सरकारी पद पर थे और न किसी संवैधानिक जिम्मेदारी में, एक अनिर्वाचित सर्वशक्तिमान की तरह व्यवहार कर रहे थे। उनका पांच सूत्री कार्यक्रम था जिसमें परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, दहेज विरोध, साक्षरता और जाति भेद उन्मूलन शामिल थे। परंतु इन्हें लागू करने का तरीका इतना क्रूर था कि लक्ष्य और साधन का अंतर ही समाप्त हो गया।
जबरन नसबंदी अभियान आपातकाल का सबसे काला अध्याय है। लक्ष्य पूरे करने के दबाव में सरकारी कर्मचारियों ने जबरन पुरुषों की नसबंदी कराई। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में यह अभियान क्रूरतम रूप में चला। रोलां रेनां के शब्दों में जिसे हम “राज्य का आतंक” कहते हैं, वह इस अभियान में स्पष्ट दिखता है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 1975 से 1977 के बीच 83 लाख से अधिक नसबंदियां हुईं, जिनमें बड़ी संख्या अनैच्छिक थीं।
दिल्ली के तुर्कमान गेट क्षेत्र में हुई घटना को इतिहास कभी नहीं भूल सकता। अप्रैल 1976 में वहां की बस्तियों को तोड़ा गया और जब लोगों ने विरोध किया तो पुलिस ने गोलियां चलाईं। कितने लोग मरे, यह आज भी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।
परंतु यह मानना गलत होगा कि आपातकाल के दौर में पूरा देश निष्क्रिय रहा। भूमिगत होकर प्रतिरोध की लड़ाई लड़ी गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने, छात्र संगठनों ने जेल की यातनाएं सहीं पर आत्मसमर्पण नहीं किया। जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता भूमिगत रहकर आंदोलन जारी रखते रहे। उन्होंने बड़ौदा डायनामाइट षडयंत्र केस में गिरफ्तारी दी और मुस्कुराते हुए जेल गए।
जेल में बंद नेताओं ने पढ़ा, लिखा और एकजुट हुए। नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने जेल की कोठरियों में विभिन्न विचारधाराओं को समझा और एक भावी राष्ट्रीय विकल्प की नींव रखी। जनता पार्टी के गठन की परिकल्पना इन्हीं जेल की दीवारों के बीच पकी थी।
जेपी ने जेल में रहते हुए भी अपने विचारों को जीवित रखा। उनके द्वारा जेल में लिखे गए पत्र और टिप्पणियां बाद में प्रकाशित हुईं। उन्होंने “संपूर्ण क्रांति” की अवधारणा को महात्मा गांधी के सत्याग्रह से जोड़ा और कहा कि जो सत्ता अपने ही नागरिकों पर अत्याचार करती है, वह नैतिक रूप से शासन का अधिकार खो देती है।
इतिहासकार बिपन चंद्र ने “इन द नेम ऑफ डेमोक्रेसी” में लिखा है कि इंदिरा गांधी का चुनाव घोषित करने का निर्णय आज भी एक रहस्य है। कुछ मानते हैं कि उन्हें अपनी लोकप्रियता का अति आत्मविश्वास था। कुछ मानते हैं कि सत्ता का मद इतना था कि वास्तविकता दिखना बंद हो गई थी। जो भी हो, जनवरी 1977 में चुनाव की घोषणा हुई और मार्च 1977 में भारत की जनता ने वह उत्तर दिया जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
इंदिरा गांधी खुद अपनी रायबरेली सीट से हार गईं। संजय गांधी अमेठी से हारे। उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया। जनता पार्टी को 295 सीटें मिलीं। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। यह लोकतंत्र की आत्मा की विजय थी। उस निरक्षर, गरीब, पीड़ित जनता की विजय थी जिसने मतपेटी को अपना सबसे शक्तिशाली हथियार बनाया।
आपातकाल पर लिखे गए साहित्य ने उस दौर की स्मृति को जीवित रखा है। कुलदीप नैयर की “इमर्जेंसी रिटोल्ड” केवल घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं है, यह एक पत्रकार की उस भीतरी बेचैनी की कहानी भी है जो सच छुपाने के लिए मजबूर था। नैयर स्वयं उस दौर में जेल गए और उन्होंने लिखा कि जब आप अंधेरी कोठरी में बंद होते हैं तो समझ आता है कि स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं, मानवीय गरिमा का मूल आधार है। जबकि वे कांग्रेस के करीबी पत्रकार थे।
पुपुल जयकर ने अपनी पुस्तक “इंदिरा गांधी” में इंदिरा के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास किया है। एक करीबी मित्र होने के बावजूद उन्होंने स्वीकार किया कि आपातकाल के दिनों में इंदिरा गांधी एक अलग ही व्यक्तित्व में बदल गई थीं जहां सत्ता टिकाए रखना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया था। पी.एन. धर, जो इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव थे, ने अपनी पुस्तक “इंदिरा गांधी, द इमर्जेंसी एंड इंडिया” में उन घटनाओं का भीतरी विवरण दिया है। भारतीय जनसंघ के नेताओं ने जेल में रहते हुए जो डायरियां और संस्मरण लिखे, वे आज भी उस दौर की भयावहता के जीवंत दस्तावेज़ हैं।
25 जून 1975 से आज के बीच पचास वर्ष बीत गए हैं। यह तारीख हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र को बार-बार अर्जित करना पड़ता है। यह हमें बताती है कि जब एक व्यक्ति या एक परिवार खुद को देश से बड़ा समझने लगे, तो संविधान कागज़ का एक टुकड़ा बन जाता है। यह हमें चेताती है कि सत्ता का नशा किस तरह विवेक को नष्ट करता है और इतिहास में नाम को कलंकित करता है।
और सबसे बड़ा सबक यह है कि अत्याचार चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, जनता की सामूहिक चेतना के सामने वह टिक नहीं सकता। वह निरक्षर किसान, वह मज़दूर, वह महिला जो पहली बार मतदान केंद्र गई और उसने इंदिरा के खिलाफ मतदान किया, यही भारतीय लोकतंत्र का असली नायक है। लोकतंत्र में मतदान ही हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा है। इसलिए आपातकाल के क्रूर कालखंड को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

